Friday, February 23, 2024

नवजात शिशु का 6 माह से 12 माह का विकास

 छह माह की उम्र का मेरा शिशु क्या कर सकता है?


उन संकेतों पर ध्यान दें, जो यह दर्शातें हैं कि शिशु अब ठोस आहार खाने के लिए तैयार है। शिशु के पहली बार भोजन खाने के पल को आप जरुर कैमरे में कैद करना चाहेंगी, इसलिए अपना फोन या कैमरा साथ ही रखें। खाना खाते हुए शिशु का गंदा होना तय है!

आपके शिशु को अब आराम से पलटना आ गया होगा। पलटना आना,  चलना-फिरना शुरु करने की दिशा में प्रारंभिक कदम होता है। कुछ ही महीनों में आपका शिशु घुटनों के बल चलना भी शुरु कर सकता है।

क्या इस चरण पर पता चल सकता है कि मेरा शिशु दायां या बायां हाथ इस्तेमाल करेगा?

आप अभी यह नहीं बता सकतीं कि आपका शिशु दायां हाथ इस्तेमाल करेगा या बायां। वास्तव में, शिशु के दो या तीन साल का होने से पहले यह बता पाना मुश्किल है कि वह दाएं हाथ का प्रयोग करेगा या बाएं हाथ का।

हालांकि, यदि आपको लगे कि आपका शिशु किसी एक हाथ का इस्तेमाल दूसरे की तुलना में ज्यादा करता है, तो इस बारे में डॉक्टर को बताएं। डॉक्टर जांच करेंगे कि शिशु का विकास ठीक से हो रहा है या नहीं।

शिशु के हाथ का नियंत्रण तेजी से विकसित हो रहा है और अब वह चीजों को अपनी तरफ खींच भी सकता है। शिशु जब खिलौने का आगे बढ़कर पकड़ना सीख जाता है, तो वह चीजों को एक हाथ से दूसरे हाथ में देने का अभ्यास शुरु करता है।

साथ ही, वह यह भी जानेगा कि किसी चीज को हाथ से छोड़ देना भी उतना ही मजेदार होता है, जितना कि उसे उठाना। ऐसे में शायद आपको इन दिनों बहुत बार चीजों को जमीन से उठाना पड़ेगा।

मेरा बच्चा पीठ से पेट के बल पलटना कब शुरु करेगा?

आपका शिशु इस महीने दोनों दिशाओं में पलटना सीख सकता है। यह एक ऐसी उपलब्धि होगी, जिस पर शायद आप दोनों आनंदित होंगे। निस्संदेह, पलटना आपके शिशु को बहुत मजेदार लगता है, मगर, अचानक शिशु की हिलने-डुलने की यह क्षमता आपके लिए सिरदर्दी का सबब हो सकती है।

शिशु की लंगोट (नैपी) बदलते समय अपना एक हाथ शिशु के ऊपर रखें। बिस्तर या किसी अन्य ऊंची सतह पर शिशु को कभी अकेला न छोड़ें। अगर आप शिशु की नैपी, चेंजिंग टेबल पर बदलती हैं, तो बेहतर है कि अब चेंजिंग मैट को आप जमीन पर बिछाना शुरु कर दें।

जब आप खाट में सो रहे शिशु को देखने जाएं, तो शायद पाएं कि वह स्वयं पीठ से पेट के बल लेट गया है। यदि पेट के बले लेटे हुए वह सहज लगा रहा है, तो उसे ऐसे ही रहने दें। हालांकि, बहुत से बच्चे रात में सोते हुए पेट के बल हो जाते हैं, और उन्हें इसमें असहजता महसूस होने लगती है। पेट के बल लेटना उनके लिए नया और अजीब सा अनुभव हो सकता है। अगर, आपके शिशु को पेट के बल लेटना अच्छा नहीं लगता, तो वह अवश्य ही इस बारे में आपको बता देगा।

शिशु को दिन के समय पेट के बल लेटने के लिए प्रोत्साहित करें, ताकि उसे इसकी आदत हो सके। अगर, शिशु खुद से पलट जाए, तो जिस तरफ आमतौर पर वह पलटता है, उस तरफ कोई खिलौना हिलाकर उसे फिर से पलटने के लिए प्रोत्साहित करें। सुनिश्चित करें कि जब शिशु पलटे तो आप उसकी खूब तारीक करें। उसके इस नए कौशल पर आपकी खुशी शिशु को आश्वासन देगी।

छह माह का शिशु अपना संचार कौशल किस तरह विकसित कर रहा है?

छह महीने का हो जाने पर आपका शिशु दुनिया को उतनी ही अच्छी तरह से देख व सुन सकता है, जितना की आप। जैसे-जैसे शिशु बढ़ता और विकसित होता है, वह रोने के साथ-साथ संचार के अन्य तरीके भी सीखेगा ताकि आपकी प्रतिक्रिया हासिल कर सके। इसलिए तैयार रहें कि अब वह कुलबुलाकर, बड़बड़ाकर और अलग-अलग मुखाकृतियों व भावों के जरिये अपनी बात रखने के लिए मेहनत करेगा।

आपके शिशु को शायद "बा", "मा", "गा" जैसे अक्षरों को या अन्य स्वर-व्यंजनों के मेल को बार-बार दोहराना भी अच्छा लग सकता है। वह इनके साथ एक या दो अक्षर जोड़कर और अधिक जटिल आवाजें भी निकाल सकता है।

आप शिशु के संचार के प्रयसों पर जितनी अधिक प्रतिक्रिया देंगी, वह उतना ही अधिक सीखेगा। इसलिए उसे बोलकर या शारीरिक संकेतों के जरिये पर्याप्त प्रतिक्रिया दें। अपना सिर हिलाना, शिशु जिन चीजों को देख रहा है उनकी तरफ इशारा करके उनका नाम बताना और उसकी बड़बड़ाहट का जवाब देना आदि सभी उसका भाषा कौशल विकसित करने में मदद करेंगे।

सातवा महीने का विकास

सात माह की उम्र में शिशु क्या कर सकता है?

आपके शिशु को अब काफी अच्छी तरह अपने हाथों का इस्तेमाल करना आ गया है। यह कौशल खाने के समय उपयोगी साबित होगा, क्योंकि अब वह दो हैंडल वाले कप को खुद पकड़कर पीना सीखेगा।

वह जल्द ही ताली बजाना भी सीख जाएगा और हो सकता है आपके गाना सुनाने पर वह ताली बजाकर आपकी प्रशंसा करे!

इस महीने आपका शिशु ज्यादा लार टपकाएगा। इस उम्र में बहुत से शिशुओं का पहला दांत निकलना शुरु हो जाता है। ठंडा टीथर या ठंडी साबुत कच्ची गाजर शिशु को मसूढ़ों के दर्द से राहत दे सकती है।

शिशु अपने पैरों पर अपना वजन कब संभाल लेगा?

अगर शिशु ने आपको या कुर्सी को पकड़ रखा हो, तो वह अपना कुछ वजन पैरों पर डाल सकता है। शिशु को उछलना भी बहुत अच्छा लगेगा। शिशु को अपने घुटनों पर खड़ा करें और बगल से सहारा देकर पकड़ते हुए उसे ऊपर व नीचे की तरफ हल्के से उछालें।

ऐसा करने से शिशु की टांगे मजबूत होंगी और उसे चलने के लिए तैयार होने में सहायता मिलेगी।हो सकता है आपका शिशु अब बिना सहारे के बैठना शुरु कर दे। इस तरह उसके हाथ नई चीजों को खोजने और खिलौनों तक पहुंचने के लिए आजाद होंगे। वह पेट के बल लेटे हुए खुद ही अपनी बाजुओं के सहारे उठकर बैठ भी सकता है।

मैं शिशु को गतिविधियों में तालमेल बनाने के लिए कैसे प्रोत्साहित कर सकती हूं?

आपका शिशु हाथों और उंगलियों से चीजों को पकड़ने, हिलाने और तोड़ने-मरोड़ने में अब बेहतर होता जा रहा है। इन सभी को बच्चों की फाइन मोटर स्क्ल्सि कहा जाता है। फाइन मोटर स्किल्स का मतलब छोटी-छोटी क्रियाओं जैसे कि अंगूठे और उंगली से चीजों को उठाने या किसी चीज को चखने या महसूस करने के लिए होठों और जीभ के इस्तेमाल से है।

आपका शिशु दोनों तरफ हैंडल वाले सिप्पी कप को पकड़कर उसमें से पीना शुरु कर सकता है। हालांकि, कहीं वह इसे गिरा न दें, इसलिए उसको अभी भी आपकी सहायता की जरुरत होगी। अब शिशु को सिप्पर से पीना सिखाना शुरु कर सकती हैं।

आपका शिशु एक हाथ से खिलौना निकाल कर आसानी से दूसरे हाथ में दे सकता है। वह शायद अब अपने दोनों हाथों को एक साथ जोड़ सकता है और ताली भी बजा सकता है।

जल्द ही आप पाएंगी कि आपके शिशु ने धीरे-धीरे शोरगुल मचाना बढ़ा दिया है। अब ये आवाजें सिर्फ शिशु के बुदबुदाने की ही नहीं होगी, बल्कि आपस में चीजें टकरानें की भी होंगी, जिसमें शिशु को खूब मजा आने लगेगा।

 शिशु अपने इन नए कौशलों में निपुण हो सके, इसके लिए आप कोई खिलौना शिशु की पहुंच से दूर रख दें और देखें कि वह उसे पाने के लिए क्या प्रयास करता है। अगर शिशु खिलौने को न पकड़ पाए और रोने लगे, तो उसे खिलौने को पकड़ने के लिए प्यार से प्रेरित करती रहें।

अगर शिशु के लिए सबकुछ इतनी आसानी से नहीं मिलेगा, तो वह जल्द शारीरिक तौर पर आत्मविश्वासी बन सकेगा।

खिलौने तक पहुंचने के कुछ प्रयासों के बाद आपका शिशु शायद आगे झुककर उसे पकड़ ले और फिर से सीधा बैठ जाए। निस्संदेह, इससे शिशु को नई युक्तियां मिलेंगी और वह पहुंच से दूर रखी अन्य वस्तुओं को भी पकड़ने के तरीके ढूंढ़ना चाहेगा। शिशु किसी चीज को पाने के लिए और अधिक प्रयास करेगा।

शिशु जब पलटकर अपने पेट के बल आना सीख लेता है, तो वह पैराशूट से गिरने वाले मुद्रा में आ सकता है। यानि कि वह अपने सिर और टांगों को जमीन से ऊपर उठा लेता है। इसके बाद वह अपने पेट के बल कमांडों की तरह सरकना (कमांडो क्रॉल) शुरु कर सकता है। यहां से फिर वह अपने हाथों और घुटनों के बल उठकर आगे और पीछे की तरफ हिलने लग सकता है।

मेरे साथ महीने के बच्चे के दांत निकलने कब शुरु होंगे?

अधिकांश शिशुओं के दांत छह महीने के आसपास निकलना शुरु होते हैं। हालांकि, हो सकता है दांत निकलने की प्रक्रिया तीन से चार महीने की उम्र में या फिर 12 महीने या इससे अधिक की उम्र में शुरु हो।

इस समय आप शिशु का पहला दांत निकलने की उम्मीद कर सकती हैं। आमतौर पर सामने नीचे की तरफ के दो दांत सबसे पहले निकलते हैं, जिन्हे अंग्रेजी में लोअर सेंट्रल इनसाइजर कहा जाता है।

जब शिशु के दांत निकलना शुरु हो जाते हैं, तो वह चीजों को अपने मुंह में डालना और उन्हें चबाना शुरु कर सकता है। शिशु काफी लार टपकाना भी शुरु कर सकता है, क्योंकि वह नए दांत निकलने का आदि हो रहा है।

मेरा शिशु अलग-अलग चीजें पहचान सकता है?

आपका शिशु शायद अभी यह नहीं समझ सकता कि कौन सी चीज खिलौना है और कौन सी नहीं। इसलिए वह आसपास पड़े आपके मोबाइल फोन से भी खेलना शुरु कर सकता है।

मगर, अब वह समझना शुरु कर रहा है कि अलग-अलग चीजों से क्या किया जा सकता है। ऐसे में वह उन चीजों में ज्यादा रुचि दिखा सकता है, जो उसे अधिक मजेदार लगती हैं।

अगर ऐसी कुछ चीजें हैं, जिनसे आप शिशु को खेलने नहीं देना चाहतीं, तो बेहतर यही है कि उन्हें शिशु की पहुंच से दूर रख दिया जाए। सात माह के बच्चे से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसे पता होगा कि कौन सी चीजों से खेलना सही है, और किनसे नहीं।

हो सकता है शिशु यह भी समझने लगे कि चीजें एक दूसरे से किस तरह संबंधित होती हैं। इस तरह वह एक जैसे खिलौनों को छांटना, आकार के अनुसार ब्लॉक्स आदि को इकट्ठा कर सकता है।

और यदि शिशु खिड़की के शीशे में अपना प्रतिबिंब देखकर खुश हो रहा है, और अचानक से आप पीछे आकर खड़ी हो जाती हैं, तो वह आपको देखने के लिए पीछे मुड़ सकता है। वह अब समझता है कि आप खिड़की के शीशे में नहीं, बल्कि वास्तव में वहां खड़ी हैं!

लुका-छिपी का साधारण सा खेल शिशु को काफी मजेदार लगता है, क्योंकि अब वह यह समझता है कि चीजों को देख, सुन और छू न पाने के बावजूद भी वे वहां मौजूद होती हैं।

शिशु को ऐसे खेल पसंद आते हैं जिनमें कोई चीज या व्यक्ति सामने आता है और फिर गायब हो जाता है। वह याद रखेगा कि वह चीज कुछ पल के ​बाद फिर से सामने आएगी और ऐसा होने पर वह शायद खूब हंसेगा।आप लुका-छिपी के खेल से शिशु का मनोरंजन कर सकती हैं। अपना चेहरा या कोई चीज कंबल के पीछे छिपाकर, शिशु को उसे ढूंढ़ने दें।

 कौन से खेल सात महीने के शिशु को प्रोत्साहित और प्रेरित करेंगे?

आपके शिशु एक ही खेल बार-बार खेलना या एक ही कविता को बार-बार सुनना अच्छा लग सकता है, क्योंकि उसे पूर्वानुमान पसंद होता है। लुका-छिपी के साथ-साथ अक्कड़-बक्कड़ और बगल में गुदगुदी करने वाला सदाबहार खेल भी खेल सकती हैं। जिन खेलों और कविताओं में शारीरिक क्रियाएं होती हैं जैसे कि शिशु को गुदगुदी करना या उसका पेट मलना आदि वे जल्दी ही शिशु के पसंदीदा बन जाते हैं

आपके शिशु को छोटे और बड़े दोनों ही तरह के स्टफ्ड जानवर जैसे कि टेडी बियर आदि बहुत पसंद आ सकते हैं। संभवतया, इनमें से कोई एक जल्द ही शिशु का पसंदीदा बन जाएगा, जिसके साथ शिशु सुरक्षित महसूस करेगा। यह शिशु का इतना पसंदीदा होगा कि शायद यह आपके साथ हर जगह जाएगा।

जब आप कोई सॉफ्ट टॉय खरीदने जाएं, तो मुलायम, अच्छी तरह सिले हुए और धुल सकने वाले खिलौनें ही लें। शिशु के लिए खिलौनों के अन्य विकल्पों में गेंद, एक के ऊपर एक लगने वाले कप, दबाने पर फिर से उठने वाले खिलौने और बड़ी गुड़िया शामिल हो सकती है।

क्या मेरा शिशु सामान्य ढंग से बढ़ रहा है?

हर शिशु अलग होता है और शारीरिक क्षमताएं अपनी ही गति से विकसित करता है। यहां सिर्फ साधारण मार्गदर्शक दिए गए हैं, जिन्हें करने की क्षमता आपके शिशु में होती है। अभी नहीं, तो कुछ समय बाद शिशु इन्हें जरुर हासिल कर लेगा।

अगर, आपके शिशु का जन्म समय से पहले (गर्भावस्था के 37 सप्ताह से पहले) हुआ है, तो आप देखेंगे कि उसे वे सब चीजें करने में ज्यादा समय लगता है, जो समय से जन्म लेने वाले बच्चे जल्दी करते हैं। यही कारण है कि समय से पहले पैदा होने वाले शिशुओं को उनके डॉक्टरों द्वारा दो उम्र दी जाती हैं:

कालानुक्रमिक (क्रोनोलॉजिकल) उम्र, जिसकी गणना शिशु के जन्म की तारीख से की जाती है

समायोजित उम्र (एडजस्टेड/करेक्टेड ऐज), जिसकी गणना आपके शिशु के पैदा होने की तय तारीख (ड्यू डेट) से की जाती है


आप अपने प्रीमैच्योर शिशु के विकास को उसकी समायोजित उम्र से देखें, उसके जन्म की वास्तविक तिथि से नहीं। अधिकांश डॉक्टर समय से पूर्व जन्म लिए बच्चे का विकास उसकी संभावित जन्म तिथि से आंकलित करते हैं और उसी अनुसार उसकी कुशलता का मूल्यांकन करते हैं।

यदि आपको अपने शिशु के विकास के संबंध में कोई प्रश्न हैं, तो अपनी डॉक्टर से सलाह करें। शिशु के विकास और कौशल के बारे में आप हमारे हिंदी ग्रुप में अपने ही जैसे अन्य माता-पिता से चर्चा कर सकते हैं।

आठवे माह का विकास

आठ माह की उम्र में शिशु क्या कर सकता है?

शिशु के लिए नई-नई चीजों को खोजने व देखने की एक अलग दुनिया का आगाज़ हो रहा है। बहुत से बच्चे इस उम्र में घुटनों के बल चलना सीखते हैं। चलना-फिरना शुरु करने के साथ-साथ शिशु बहुत बार टकराते व गिरते भी हैं।

शिशु घर में सुरक्षित ढंग से घूम-फिर सके, इसके लिए आपको ऐसी सभी चीजें हटाकर रखनी होंगी, जो उसके लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं।

आपका शिशु नए लोगों से शर्माना शुरु कर सकता है या फिर उसे परिवार के किसी सदस्य या आया के पास छोड़कर जाने पर वह रोना शुरु कर सकता है। यह जुदाई की चिंता (सैपरेशन एंग्जायटी) की शुरुआत है। जल्द ही शिशु यह समझ जाएगा, कि आप उसे छोड़ कर जाती हैं, तो दोबारा वापिस भी आएंगी।

क्या मेरा शिशु इस महीने घुटनों के बल चलना शुरु करेगा?

अब जब शिशु आठ महीने का हो गया है, वह आराम से घुटनों के बल चल रहा होगा। या फिर हो सकता है वह नितंबों के बल हिलना-डुलना, पेट के बल सरकना (कमांडो क्रॉलिंग) या पलटना शुरु कर रहा हो।

आपका शिशु फर्नीचर को पकड़कर खुद खड़ा होने का प्रयास भी कर सकता है। अगर आप शिशु को सोफे के साथ खड़ा करती हैं, तो वह शायद खड़े होने के लिए इसका सहारा ले सकता है। शिशु गिर न जाए, इसके लिए आपको उसके पीछे ही रहना होगा।

चलने-फिरने की इस नई क्षमता का मतलब है कि अब आपका शिशु काफी बार गिरेगा व टकराएगा। यह सब बचपन का एक अभिन्न हिस्सा है।

हो सकता है आपकी सांस अटकी हो कि कहीं शिशु चलते-चलते गिर न जाए। मगर शिशु को आसपास की चीजों को देखने-समझने दें और आप भी इसका आनंद लेने का प्रयास करें। इससे शिशु के शारीरिक कौशल का विकास हो रहा है। निस्संदेह, आप शिशु को गिरने से बचाने के लिए सुरक्षा प्रदान करना चाहती हैं, मगर शिशु को खुद प्रयास करने देने से आप उसे सीखने और आगे बढ़ने का अवसर प्रदान कर रही हैं।

आपका शिशु अब घुटनों के बल चलने लगा है, इसलिए अपने घर को उसके लिए सुरक्षित बनाने के हर संभव प्रयास करें। उदाहरण के तौर पर टूटने वाली वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर हटाकर रख दें या जर्जर हालत वाले फर्नीचर को भी हटा दें, ताकि वह शिशु के ऊपर न गिर जाए।

क्या मेरा बच्चा छोटी-छोटी चीजें, जैसे खाने के टुकड़े उठा सकता है?

आपका शिशु शायद पिंसर ग्रैस्प पर अपनी पकड़ बना रहा है। यह एक बारीकी वाला कौशल होता है, जो शिशु को अपने अंगूठे और पहली व दूसरी उंगलियों से छोटी चीजों को उठाने में मदद करता है।

वह अपनी इस पिंसर ग्रैस्प के इस्तेमाल से फिंगर फूड के छोटे टुकड़ों जैसे कि चावल के दानें आदि उठा सकता है, और उन्हें मुंह में भी ले सकता है। मगर, यह ध्यान रखें कि शिशु की पहुंच में इतना छोटा कुछ न हो, जो कि उसके गले में अटक जाए।

शिशु अपने हाथों और उंगलियों को खोलने का नियंत्रण भी सीख गया है, इसलिए चीजों को गिरा या फेंक सकता है, और इसमें उसे काफी मजा आएगा। गिरी हुई चीजों को देखकर आपका शिशु बहुत खुश होगा और अपनी तर्जनी उंगली से उसकी तरफ इशारा भी करेगा।

क्या मेरा शिशु अपनी भावनाएं और अधिक प्रकट करेगा?

इस समय तक शिशु का मिजाज और भावनाएं अब काफी स्पष्ट होने लगी होंगी, क्योंकि अब वह खुद को अच्छे से अभिव्यक्त कर सकता है। उत्साहित होकर वह ताली बजा सकता है या फिर किसी जाने-पहचाने व्यक्ति को देखकर अगर खुश हो, तो दूर से ही चुंबन दे सकता है। हाथ हिलाकर बाय-बाय भी कर सकता है।

आपका शिशु मनोभावों को समझने और उनका अनुकरण करना सीख रहा है। वह पहली बार समानुभूति की भावनाएं भी दिखा सकता है। उदाहरण के तौर पर, अगर वह किसी अन्य बच्चे को रोता हुआ देखे, तो वह खुद भी रुआंसा हो सकता है।

मेरे बच्चे को क्या नई चीजें करने और खोजने में मजा आएगा?

आपके शिशु को एक ही चीज को नए-नए तरीकों से देखने और समझने में मजा आएगा। वह उस चीज को हिलाकर, जोर से मारकर, गिराकर या मसूढ़ों से चबाकर देखेगा। शिशु अब यह समझ रहा है कि किसी चीज के साथ वह कुछ कर सकता है।

आप अपने घर का एक कोना शिशु के खेलने की जगह बना सकती हैं और वहां बहुत से ऐसे खिलौने रखें जिन्हें जोर से टकराना, मारना, मरोड़ना, पिचकाना, हिलाना, गिराना और खोलना सुरक्षित हो। अगर आप हर बार शिशु को खेलने के लिए उस जगह लेकर आएंगे, तो आप भी निश्चिंत हो सकेंगी कि आपका शिशु सुरक्षित जगह पर खेल रहा है और आपका घर भी साफ रहेगा।

शिशु को किसी चीज को गिराना और फिर आपके द्वारा उसे उठाते हुए देखना बहुत पसंद आएगा। आपका शिशु आपको चिढ़ाने का प्रयास नहीं कर रहा है, मगर उसको ऐसा करने में बड़ा मजा आता है, और स्वाभाविक है कि वह बार-बार ऐसा देखना चाहता है!

आपका शिशु अब यह भी समझता है कि चीजें एक-दूसरे से किस तरह संबंधित होती हैं। जैसे कि वह यह समझता है कि छोटी चीजें बड़ी चीज के अंदर आ सकती हैं। वह आसानी से आपके द्वारा छिपाई गई चीज ढूंढ़ लेगा और आपके द्वारा नाम लेने पर वह सही चीजों की तरफ देखेगा या उनकी तरफ इशारा कर सकता है।

आपके शिशु की तेज होती नजर भी उसके देखने और खोजने के कौशल में मदद कर रही है। वह कमरे में दूर से ही जाने-पहचाने लोगों और चीजों को पहचान सकता है। इसलिए, अगर वह अपनी पसंद की कोई चीज देखता है, तो वह अपनी खुशी जाहिर करने के लए उसकी तरफ इशारा या प्यार भरी आवाज निकालना शुरु कर सकता है। या फिर अगर शिशु घुटनों के बल चलना सीख गया है, तो उस चीज की तरफ चलना शुरु कर सकता है।


नवा माह का विकास 

नौ माह का मेरा शिशु क्या कर सकता है?

शिशु के साथ खेलने में अब बहुत मजा आने लगा होगा। शिशु को डिब्बे या कंटेनर में से खिलौने या अन्य सामान निकालना और उनमें फिर से सामान भरना अच्छा लगेगा। या फिर कप या रिंग को एक के ऊपर एक क्रमबद्ध ढंग से लगाने में मजा आएगा। इस उम्र में आप, आपके पति और परिवार के अन्य सदस्य उसके खेल के सबसे अच्छे साथी होंगे।

उसकी नई चीजों की खोज-बीन अब खिलौनों तक ही सीमित नहीं रहेगी, और ऐसे में आप "नहीं" शब्द का इस्तेमाल ज्यादा बार करती नजर आएंगी। शिशु शायद आपके शब्दों की तुलना में आपकी आवाज के लहजे से ज्यादा समझता है।

अपने घर को शिशु के लिए सुरक्षित बनाने (चाइल्डप्रूफ) से आप उसे संभावित खतरों से बचा सकती हैं।

मेरा शिशु चलना शुरु कब करेगा?

आपका शिशु जल्द ही चलना शुरु कर देगा, वैसे अधिकांश शिशु एक साल का होने से पहले चलना शुरु नहीं करते। आप पाएंगी कि आपका शिशु सीधा खड़ा होकर फर्नीचर को पकड़कर चलने लगा है।

नौ महीने के कुछ बच्चे कुछेक कदम चल भी सकते हैं। यदि आपका शिशु भी ऐसा करता है, तो उसे आपके सहारे की जरुरत होगी। आपका शिशु घुटनों को मोड़ना और खड़े होने के बाद बैठना भी सीख रहा है। हालांकि, इसमें महारथ हासिल करना जितना आसान लगता है, उतना है नहीं!

आप शिशु के सामने खड़े होकर या घुटनों के बल बैठकर उसके दोनों हाथों को पकड़कर अपनी तरफ चलाने का प्रयास करें। आप शिशु के लिए ऐसे खिलौने खरीद सकती हैं, जिन्हें आगे की ओर खिसकाते समय वह भी साथ-साथ चल सकता है। पकड़कर चलने के लिए ऐसे खिलौनों का चयन करें, जो स्थिर हों और जिनका आधार चौड़ा हो।

अपने घर को शिशु के लिए सुरक्षित बनाना (चाइल्डप्रूफिंग) अब जरुरी है। इसकी शुरुआत आप उन अलमारियों पर चिटकनी लगाने से कर सकती हैं, जहां आप शिशु को पहुंचने नहीं देना चाहती हैं।

चाहे कोई टूटने वाली चीज हो या फिर कोई कीमती सामान हो, बेहतर है कि उन्हें शिशु की पहुंच से दूर सुरक्षित जगह पर रखा जाए। घर की साफ-सफाई के उत्पाद भी ऐसी जगह रखें जहां शिशु न पहुंच सके। शिशु अभी यह नहीं समझ सकता कि कुछ चीजें उसके लिए नहीं हैं, इसलिए बेहतर है कि आप ऐसी लुभावनी चीजों को शिशु की नजरों से दूर कर दें, जिन्हें देखकर वह आकर्षित हो सकता है।


 नौ माह की उम्र में शिशु कौन से खेलों में आनंद लेता है?

आपके शिशु को डिब्बे में चीजे डालने और निकालने में खूब मजा आएगा। उसे प्लास्टिक की बाल्टी और कुछ बड़े रंग-बिरंगे ब्लॉक्स दे दें, ताकि वह अपने इस नए कौशल का अभ्यास कर सके।

उसे अब ऐसे खिलौने पसंद आएंगे, जिनमें खुलने-बंद करने के लिए दरवाजे हों या चलाने के लिए पहिये या उत्तोलक (लीवर) हो। प्लास्टिक की बड़ी कारें, जिन्हें शिशु फर्श पर चला सकता है, वे बालक व बालिकाओं, दोनों को ही पसंद आती हैं।

आप शिशु के साथ एक दूसरे को खिलौने देने वाले खेल सकती हैं, जैसे वह आपको कोई खिलौना दे और फिर आपसे वापिस ले ले। आप खेल में उसके साथी बनें। फर्श पर बैठकर खेलते हुए कोई गेंद शिशु के पास लुढ़काएं और देखें कि क्या वह भी आपके पास गेंद को पहुंचाता है या नहीं।

बच्चे को छांट कर क्रमबद्ध तरीके से लगाने वाले खिलौने या रिंग्स खेलने के लिए दें। देखें कि क्या वह खिलौनों को छांट या क्रमवार ढंग से लगा पाता है या खिलौने के सही हिस्सों को आपको दे पाता है या नहीं।

आपका शिशु अब आपनी जरुरतों और इच्छाओं को भी जाहिर करने लगा है। यदि आप उससे कोई खिलौना ले लें, तो आपका हठी शिशु शायद चिल्ला कर उसका विरोध करेगा और झल्लाहट में खुद को पीछे की ओर गिरा लेगा। आपको शायद यह देखकर थोड़ा आश्चर्य हो, मगर यह विकास का एक सामान्य चरण है।

नहाने का समय भी मस्ती करने का एक अच्छा अवसर होता है। शिशु को शायद बुलबुलों से खेलना और छोटे कप में पानी भरना बहुत अच्छा लगेगा। हालांकि, उस पर नजर रखें। जल्द ही वह उस कप का पानी बाल्टी या बाथटब के बाहर भी गिराना शुरु कर देगा। आप उसे पानी भरने के लिए छन्नी भी दे सकती हैं, और उसमें से पानी निकलते हुए देखने में उसे काफी खुशी होगी।

 मैं शब्दों को समझने और उनके इस्तेमाल में नौ माह के बच्चे की कैसे मदद कर सकती हूं?

शब्दों का जो प्रवाह शिशु अपने जन्म के समय से सुनता आ रहा है, अब उनका जादू उस पर होना शुरु हो गया है। शिशु का बड़बड़ाना अब शायद असली शब्दों जैसा सुनाई देने लगा है, जैसे मामा और पापा।

हालांकि, अभी से इतना उत्साहित होने की जरुरत नहीं है, क्योंकि वह शायद अभी नहीं समझता है कि "मामा" और "पापा" जैसे शब्दों का अर्थ माँ और पिता के संबोधन से है। ये दोनों शब्द भी उन कई आवाजों की तरह ही है, जिसे शिशु लगातार बड़बड़ाता रहता है।

इस चरण पर शिशु आपके वास्तविक शब्दों की बजाय आपकी आवाज के लहजे से ज्यादा समझता है। आप घर का काम करते समय, तैयार होते समय या फिर शिशु के साथ खेलते समय उससे जितनी अधिक बातें करेंगी, उतना ही वह संवाद के बारे में सीखता है।

यदि आपके पास ऐसी प्रैम या स्ट्रॉलर है, जिसमें बैठने पर शिशु का चेहरा आपकी तरफ होता है, तो आप चलते समय शिशु से बातें करें। रास्ते में शिशु की रुचि की कोई चीज आए तो इशारा करके उसे इसके बारे में बताएं।

लगभग इस समय तक शिशु को 'नहीं' शब्द का मतलब समझ आना शुरु हो जाता है, मगर वह शायद अब भी वैसा नहीं कर सकता, जैसा उसे करने को कहा जाए। हालांकि, वह अपना नाम पुकारे जाने पर आसपास देखकर प्रतिक्रिया देगा या फिर अपने काम छोड़कर देखने लगेगा कि किसने उसका नाम पुकारा।


दसवा माह का विकास

10 महीने का मेरा शिशु क्या-क्या कर सकता है?

शिशु की बुदबुदाहट अब असली शब्दों जैसी सुनाई देने लगी है। उसमें आप जितनी ज्यादा रुचि दिखाएंगी, उतनी ज्यादा वह बातें करेगा। जब वह कोई शब्द कहने की कोशिश करे, जैसे कि बॉल के लिए "बो", तो आप उसे सही शब्द का उच्चारण करके बताएं कि, "हां, यह बॉल है।" इससे शिशु का बातचीत का कौशल विकसित होने में मदद मिलेगी।

अगर आपका शिशु काफी समय से घुटनों के बल चल रहा है, तो अब वह शायद पूरे घर में आसानी और तेजी से एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंच जाएगा। अब वह फर्नीचर या आपकी टांगों के सहारे खड़े होने के प्रयास करेगा।

मेरा 10 माह का शिशु शिशु चलना-फिरना कब शुरु करेगा?

अब तक आपका शिशु अपने हाथों और घुटनों के बल आसानी से चल रहा होगा। जैसे-जैसे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है, वह और गति पकड़ेगा और तेजी से चलेगा। आपका शिशु अब आत्मविश्वास से अच्छी तरह बैठने लगा होगा।

वह अब शायद बैठी हुई अवस्था से अपने आप खड़ा हो सकेगा। शिशु फर्नीचर को पकड़कर चलना भी शुरु कर सकता है। वह कुछ सैकंड के लिए फर्नीचर को छोड़कर और बिना आपका सहारा लिए खड़ा भी हो सकता है।

क्योंकि आपका शिशु चलने-फिरने लगा है, वह अब घर को देखना-खोजना शुरु करेगा। अब मौका मिलने पर वह शायद सीढ़ियां चढ़ने-उतरने का भी प्रयास कर सकता है, इ​सलिए उस पर नजर रखें। अगर, आपने पहले ऐसा नहीं किया है तो अब समय है कि घर को शिशु के लिए एकदम सुरक्षित (चाइल्डप्रूफ) बना दें। शिशु की पहुंच में आने वाली हर उस चीज को हटा दें, जो उसके लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

शिशु का हाथ पकड़कर जब आप उसे चलाने का प्रयास करेंगी, तो शायद वह कुछ कदम चल सकता है। आप शिशु का एक हाथ थामे हुए हों, तो वह नीचे झुककर अपना कोई खिलौना उठाने का प्रयास भी कर सकता है।

स्वाधीनता की ओर शिशु के जादुई पहले कदम बस अब उठने ही वाले हैं। शिशु जब खुद से चलना शुरु कर देगा, तो आप भी उसके पीछे-पीछे कितनी भाग-दौड़ करने लगेंगी!

जब शिशु चलने लग जाता है, तो कभी-कभार उसका किसी चीज से टकरा जाना या खरोंच लग जाना संभव है। उसे प्यार करना और सीने से लगा लेना उसके आंसुओं को रोक लेगा। और जल्द ही वह फिर से चलने-फिरने में लग जाएगा।

 शिशु को अब लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगेगा?

आपके शिशु का व्यक्तित्व वास्वत में अब उभर रहा है। उसका सामाजिक कौशल भी अब विकसित हो रहा है और वह शायद हर मिलने वाले का स्वागत एक बड़ी मुस्कान से करेगा। या फिर यह भी हो सकता है कि पहली बार मिलने वाले लोगों से वह थोड़ा संकोच महसूस करे और अपना चेहरा छुपाने लगे।

शिशु आपका ध्यान पाने के लिए आवाजें और हाव-भाव दोहराने लगेगा और वह आपको दरवाजे के पास जाते देख हाथ हिलाकर बाय-बाय भी कह सकता है। अब आपका शिशु अपने हिसाब से चीजें करना चाहता है, आपने शायद ध्यान दिया होगा कि अब वह कार सीट, प्रैम या स्ट्रॉलर में बैठने का कैसे विरोध करने लगा है।


11वे माह का विकास

11 महीने की उम्र में शिशु क्या कर सकता है?

आपका शिशु अब आसान निर्देशों को समझने लगेगा और वह आपकी "ना" का मतलब भी समझता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है, कि शिशु सब कुछ आपके कहे अनुसार ही करेगा!

कोशिश करें कि "ना" शब्द का इस्तेमाल केवल वहीं करें जब शिशु कुछ ऐसा कर रहा हो, जिससे उसे खतरा हो। वरना आप पाएंगी कि हर समय आप शिशु को चीजों के लिए मना ही करती रहती हैं।

चटकीले और गहरे रंगों वाली किताबें शिशु को ध्यान आकर्षित करेंगी। आप स्थानीय पुस्तकालय में बच्चों के संभाग में जाकर देख सकती हैं। यहां आपको पुरानी लोकप्रिय किताबों के साथ-साथ कुछ नई किताबें भी देखनी को मिल सकती हैं।

क्या मेरा शिशु इस चरण पर और आत्मनिर्भर बनेगा?

आपका शिशु अब अपने पहले जन्मदिन से केवल एक महीने दूर है, अब वह पहले जैसा असहाय नवजात नहीं है, जो आपके बिना कुछ नहीं कर सकता।

हालांकि, उसे आपकी देखरेख और सहारे की काफी जरुरत है, मगर अब वह आत्मनिर्भर बनता जा रहा है। वह खड़ा होना, नीचे झुकना और उकड़ू बैठना सीख रहा है। वह शायद आपका हाथ थामकर चलना भी शुरु कर सकता है। कपड़े पहनाने में आपकी मदद के लिए वह अपने हाथ या टांग को भी आगे बढ़ा सकता है।

खाने के समय, आपका शिशु शायद खुद कप को पकड़कर पेय पदार्थ पी सकता है और खुद अपने हाथों से उठाकर पूरा भोजन खा सकता है। शिशु जब खुद कप से पीना शुरु कर देता है, तो शायद आपको लपक कर चीजों को पकड़ना शुरु करना होगा या फिर कभी कभार झुकर कर अपने आप को बचाना पड़ेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि पेय खत्म होने पर वह खेल-खेल में कप को नीचे गिरा सकता है या अगल-बगल में फेंक सकता है!


बारवे माह का विकास

 12 महीने का होने पर शिशु क्या कर सकता है?

अगर आपके शिशु ने अभी तक चलना शुरु नहीं किया है, तो वह जल्द ही ऐसा करने लगेगा। जैसे-जैसे शिशु और ज्यादा चलना-फिरना शुरु करता है, उसकी रुचि शोर करने वाली उधमबाजी में ज्यादा हो सकती है। इनके बहाने कम से कम उसकी खूब एक्सरसाइज तो होगी!

शिशु के साथ बातचीत अब ज्यादा दोतरफा होने लगी है। अगर, आप उससे पूछेंगी कि उसकी नाक कहां है, तो वह शायद इशारा करके बता सकता है। जैसे-जैसे शिशु की समझ बढ़ रही है, आप उसे शिष्टाचार सिखाना शुरु कर सकती हैं, जैसे कि कृप्या और धन्यवाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल।

हो सकता है आप शिशु को अपने खिलौने सही जगह रखने में मदद करने के लिए भी राजी कर पाएं।

एक साल का बच्चा किस तरह के खेल और कार्यकलाप पसंद करेगा?

शायद एक साल का होते-होते शिशु के खेलने के तरीके में बदलाव आ सकता है। अब शिशु चीजों को उठाने और छोटी वस्तुओं को हाथ में लेकर घुमा-फिरा सकता है, इसलिए हो सकता है अब वह बाजुओं और टांगों को मजबूत करने वाले कुछ और चुस्तीभरे खेल खेलना चाहे।

आपके शिशु को अभी भी शायद कुछ मिनटों के लिए शांत क्रियाकलाप अच्छे लगें, मगर उसके पसंदीदा खेल पहले से ज्यादा शोर करने वाले होंगे।

आपका बच्चा शायद यह समझता है कि चीजों को धकेलना, फेंकना और नीचे गिरा देना कितना मजेदार होता है। वह आपको कोई खिलौना देगा और साथ में आपसे कोई एक ले भी लेगा। उसे शायद किसी डिब्बे या पात्र में ब्लॉक्स डालने और फिर उन्हें बाहर निकालने जैसे खेल ज्यादा पसंद आएंगे।

ऐसे खेल वह बर्तनों के साथ भी खेलना चाहेगा। वह बड़े बर्तन के अंदर छोटे बंर्तन डाल सकता है और आपस में टकराने पर बर्तनों से आने वाली तेज आवाजों से वह काफी खुश हो जाएगा।

आप अपनी रसोई में एक अलमारी में प्लास्टिक के कप, कटोरे या स्टील की कटोरियां (ध्यान रखें कि इनके किनारे तेज धार वाले न हों) रख सकती हैं। आपके शिशु को अलमारी खोलने और उसमें रखे सामान से खेलने की आजादी काफी पसंद आएगी।

सोने से पहले मेरा शिशु काफी परेशान करता है। मैं उसके सोने का समय आसान कैसे बना सकती हूं?

शिशु जब झपकी ले रहा होता है, तो आपको आराम करने और फिर से तरोताजा होने का या अपने काम निपटाने का थोड़ा-बहुत समय मिल जाता है।

मगर, जब शिशु एक साल की उम्र तक पहुंचता है, तो वह शायद अब दिन में झपकी न लेना चाहे। वह अपनी बढ़ती आजादी का काफी आनंद ले रहा होता है, ऐसे में सोने के समय वह आपको परेशान कर सकता है।


शिशु को सुलाने में मदद के लिए आप सुलाने के समय की एक निश्चित दिनचर्या (बेडटाइम रुटीन) का पालन करें। इसमें सुलाने से पहले शिशु को नहलाना या उसकी मालिश करना शामिल हो सकता है। इससे शिशु को शांत होने में मदद मिलेगी और वह अपने आप सोना सीख सकता है, आपको उसके पास रहकर उसे सुलाने की जरुरत नहीं होगी।

बेहतर है कि हर रात शिशु को सुलाने के लिए एक ही तरह की गतिविधियों का पालन किया जाए। आप उसे सुलाने से पहले किताब पढ़कर सुना सकती हैं, गानें गा सकती हैं या कोई शांतिदायक संगीत चला सकती हैं। आप चाहे जो भी करें, यह शिशु के लिए आनंददायक और हर दिन एक जैसी दिनचर्या होनी चाहिए, साथ ही शिशु को आराम देने के लिए उसे खूब सारा प्यार-दुलार करें।

अगर, संभव हो तो सोने के लिए शिशु को तैयार करने के बाद उसे ड्रॉइंग रूम में न लेकर आएं। यह आपके सब किए-कराए पर पानी फेर सकता है। अगर उसके पिता को उसे शुभ रात्रि कहना हो, तो बेहतर है कि वह कमरे में आकर ही उसे यह बोलें, बच्चे को बाहर न ले जाएं।


मैं शब्दों को समझाने और उनके इस्तेमाल में शिशु की मदद कैसे कर सकती हूं?

आप शिशु को चीजों और उनके नामों के बीच मेल बिठाने में मदद कर सकती हैं। आप जितना ज्यादा यह करेंगी, उसकी शब्दावली उतनी ही तेज बढ़ेगी। इसलिए अपने बच्चे से बातें करती रहें और जो चीजें वह देख सकता है, उसे उनके नाम बताती रहें। शिशु जितनी ज्यादा बार कोई शब्द सुनेगा, उतनी ही जल्दी उसे वह याद होगा।

सीढ़ियां चढ़ते हुए उन्हे गिनें और इशारा करके फलों और सब्जियों के नाम व रंग शिशु को बताएं। शिशु के साथ चित्रों वाली किताब पढ़ें और उससे जानी-पहचानी चीजों की तरफ इशारा करने या उनके नाम बताने के लिए कहें। कई बार उसे विकल्प भी दें।

उससे पूछें कि वह लाल मोजे पहनना चाहेगा या नीले, या फिर वह ब्लॉक्स खेलना चाहेगा या स्टेकिंग रिंग्स। विकल्प देने से शिशु की शब्दावली और शब्दों की जानकारी बढ़ने में मदद मिलती है। हो सकता है वह कोई जवाब न दे पाए, मगर कई बार हो सकता है वह आपको अपने जवाब से आश्चर्यचकित कर दे।

जैसे-जैसे शिशु का विकास होता है और वह ज्यादा समझ दिखाने लगता है, तो आप उसे शिष्टाचार और अपनी मदद खुद करना सिखा सकती हैं। परिवार के साथ बैठकर भोजन करना शिशु के लिए अच्छा है, क्योंकि वह आपको प्लीज और थैंक यू जैसे शब्द कहते हुए देखता व सुनता है। वह शायद खुद भी ये बोलने का प्रयास कर सकता है।


 मेरे 12 महीने के बच्चे ने अभी तक चलना शुरु नहीं किया है। क्या वह जल्दी ही चलना शुरु कर देगा?

अपने आप चलने की यह बड़ी उपलब्धि अब शिशु हासिल करने ही वाला है। इस महीने या फिर अगले महीने तक आपका शिशु खुद अपने आप पहले कदम लेना शुरु कर सकता है। यदि आपका शिशु कुछ और महीनों तक ऐसा न कर पाए, तो भी चिंता न करें। वह समय के साथ अपने आप यह सीख लेगा।

शुरू में, आपका शिशु अपने शुरुआती कदम शायद पांवों की उंगलियों के बल चलेगा और उसके पांव बाहर की तरफ होंगे। जैसे-जैसे शिशु का आत्मविश्वास और ताकत बढ़ेगी, वह और अधिक संतुलित तरीके से चलना शुरु कर देगा।

जब आपका शिशु खुद चलना सीख रहा होता है, तो वह शायद अपने पैरों के बल काफी अस्थिर सा रहता है। शिशु पर नजर रखें और यदि वह गिर जाए तो उसे गोद में लेकर खूब प्यार-दुलार करें।


हर मां को पता होनी चाहिए शिशु के खानपान से जुड़ी ये खास बातें।


जन्म के शुरुआती माह में दिया जाने वाला ठोस आहार शिशु के मस्तिष्क और शरीर के विकास के लिए जरूरी है। आहार सही तरीके और समय पर देने से बच्चे को एलर्जी से भी दूर रख सकते हैं।

हर मां को पता होनी चाहिए शिशु के खानपान से जुड़ी ये खास बातें
जन्म के शुरुआती माह में दिया जाने वाला ठोस आहार शिशु के मस्तिष्क और शरीर के विकास के लिए जरूरी है। आहार सही तरीके और समय पर देने से बच्चे को एलर्जी से भी दूर रख सकते हैं।

प्रश्न : बच्चे का खानपान कब शुरू करना चाहिए?
ज्यादातर बच्चे को 4 से 6 माह के बीच ठोस आहार दिया जाता है। शोधों से पता चला है कि बच्चे को 4माह से पहले ठोस आहार शुरू करने से बच्चों में मोटापे का खतरा बढ़ सकता है। इस दौरान शिशु द्वारा सिर संभालना, आहार मुंह में अंदर ले जाने की क्षमता, स्तन या बोतल को खींचना और अन्य चीजों को करने या खाने के लिए चारों ओर देखने की क्षमताएं शामिल हैं। यदि बच्चा ठोस आहार खिलाने पर जीभ से बाहर निकाल देता है तो उसको ठोस पदार्थ देने के लिए एक सप्ताह बाद दोबारा प्रयास करें।

प्रश्न : कौनसी चीजें खिलाकर शुरुआत करनी चाहिए?
ठोस आहार के लिए वैसे कोई सख्त दिशा-निर्देश नहीं हैं। पहले 6 माह से अधिक उम्र के बच्चों को आयरन और जिंक से भरपूर अनाज ठोस आहार के रूप में देते थे। कुछ फूड एक्सपट्र्स का मानना है कि, मांस इन पोषक तत्वों का बेहतर स्रोत है। इससे मैं भी सहमत हूं। मैं शिशु के लिए स्वस्थ वसा का अच्छा स्रोत एवोकाडो खिलाना पसंद करती हूं, जो मस्तिष्क के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। इसके साथ हरी सब्जियां भी शामिल हैं। जितनी जल्दी शिशु को हरी सब्जियां देंगे, उतनी जल्दी उसका स्वाद विकसित होगा।

प्रश्न : मैं अपने बच्चे को पानी या जूस कब दे सकती हूं?
बच्चों को जूस की जरूरत नहीं है। उन्हें फाइबर युक्त फल देना चाहिए। स्वस्थ रहने के लिए सादे पानी की आदत बेहतर है। ज्यादा पानी नुकसान दाई हो सकता है।

प्रश्न : खाद्य पदार्थों से एलर्जी की आशंका पर क्या करें?
कुछ साल पहले, एक अध्ययन में बताया गया था कि जब तक बच्चों में खाद्य पदार्थों से त्वचा पर चकत्ते, चेहरे पर सूजन या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई न दें तब तक वह सब दे सकते हैं।

प्रश्न : बच्चे को कौनसे खाद्य पदार्थ नहीं देने चाहिए?
12 माह से कम उम्र के शिशु को शहद न दें। इससे बोटुलिज्म नमक बीमारी हो सकती है। 6 माह तक के बच्चो को पानी की मात्रा भी कम दे क्युकी मा के दूध से ही बच्चे की पानी की मात्रा की पूर्ति हो जाती है। पानी की मात्रा जाधा होने से water infection. हो सकता है। एक साल से बड़े बच्चों को दे सकते हैं क्योंकि उनमें पेट संबंधी बीमारियों से लडऩे की क्षमता होती है। खाने में अटकने वाली चीजों को देने से बचें।

प्रश्न : शुरुआत में बच्चे को खिलाने की आदत कैसे डालेंं?
बच्चे के मुंह में छोटे चम्मच से थोड़ा सा सूप देकर शुरुआत करें। फिर प्रतीक्षा करें और देखें कि क्या होता है। अगर वह अपना मुंह खोलता है और चम्मच की तरफ मुड़ता है तो उसे और खिलाएं। अगर वह दूर हो जाता है या मुंह बंद करता है तो जबरदस्ती न करें। एक सप्ताह तक इंतजार करें। इसके बाद दोबारा प्रयास करें, वह खाने लगेगा। खुद खाते हुए बच्चा गंदा हो सकता है, फिर भी उसे खाने दें। जितना अधिक बच्चा स्वस्थ भोजन की गंध, स्वाद, स्वस्थ भोजन खोजने की कोशिश करता है, उतना अधिक वह बड़ा होकर उन खाद्य पदार्थों को खाना शुरू कर सकता है।

प्रश्न : बच्चा खुद से खाने की कोशिश करें तो क्या देना सही रहेगा?
शिशु 8 या 9 महीने के बाद खुद से खाने की कोशिश करते हैं। शिशु के मुलायम मसूड़ों से खाने वाले खाद्य पदार्थ मैश करके दिए जा सकते है। उबले नरम मटर, सब्जियां, अंडे के टुकड़े, मसूर, रोटी, या चिकन और पोषक तत्वों से भरपूर स्ट्रॉबेरी, जामुन के टुकड़े बच्चे को दे सकते है।

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अधिगम असमर्थता के प्रकार एवं कारण

अधिगम असमर्थता के प्रकार एवं कारण


अधिगम विकृति का संबंध सीखने में होने वाली अक्षमता से होता है यह अक्षमता कई प्रकार के कौशलों एवं संज्ञानात्मक विकास से संबंधित हो सकती है।


अधिगम असमर्थता के प्रकार


नैदानिक मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अधिगम असमर्थता तीन प्रकार की होती है।

(1) अधिगम विकृतियॉं

(2) संचार विकृतियॉं

(3) पेशीय कौशल विकृतियॉं


अधिगम विकृतियॉं


 प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक नेविड, राथुस एवं ग्रीन (2014) अपनी पुस्तक ‘एबनॉरमल साइकोलॉजी इन ए चैलेंजिंग वल्र्ड’ में अमेरिका के नेल्सन रॉकफेलर के बारे में लिखते हैं कि नेल्सन अमेरिका के उपराष्ट्रपति रहे हैं एवं उससे पूर्व वे अमेरिका के न्यूयार्क स्टेट के गवर्नर पद पर भी रहे हैं, उनके जीवन में वे बड़े ही दिलचस्प मोड़ से गुजर चुके हैं। वे बहुत ही प्रतिभाशाली थे तथा उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। दुनिया के सबसे अच्छे शिक्षकों के उपलब्ध होने के बाद भी उन्हें पाठन में बड़ी ही परेशानी होती थी। वास्तव में रॉकफेलर डिस्लेक्सिया नामक बीमारी से ग्रस्त थे जो कि एक अधिगम विकृति कहलाती थी। इसे कई बार अधिगम असमर्थता भी सीधे सीधे कह दिया जाता है क्योंकि यह बहुत ही आम बीमारी है एवं अधिगम विकृति के 80 प्रतिशत व्यक्तियों में यह पायी जाती है।


 डिस्लेक्सिया के मरीजों में पढ़ने हेतु अपेक्षित बौद्धिक योग्यता होने के बावजूद उन्हें पाठ्य सामग्री का पाठन करने अथवा पाठ दोहराने में कठिनाई होती है। अधिगम विकृति एक ऐसी विकृति है जो कि दीर्घस्थायी होती है एवं व्यक्ति के विकास को उसकी वयस्कावस्था में भी अच्छे से प्रभावित करती है। अधिगम विकृति से ग्रस्त बच्चों का औसत बुद्धि एवं आयु होने के बावजूद स्कूल में निम्नस्तरीय प्रदर्शन रहता है। उनके माता पिता इस समस्या को समझ नहीं पाते एवं अधिकांशत: इसे बच्चों की असफलता माना जाता है। अतएव ऐसे बच्चों में आगे चलकर निम्न आत्मसम्मान जैसी अन्य मनोवैज्ञानिक समस्यायें जन्म ले लेती हैं। इनमें ADHD से ग्रस्त होने की संभावना भी काफी बढ़ी चढ़ी होती है।

डायग्नोस्टिक स्टेटिस्टिकल मैनुअल के आधार पर अधिगम विकृति के तीन प्रकार निर्धारित किए हैं-


1.पठन विकृति


2. गणित विकृति


3. लेखन अभिव्यक्ति की विकृति




पठन विकृति (reading disorder)


पठन-पाठन में होने वाली विकृति को पठन विकृति की संज्ञा दी जाती है। इसे डी.एस.एम-4 में डिस्लेक्सिया कहा गया है। हालांकि डी.एस.एम.-5 में डिस्लेक्सिया शब्द का प्रयोग पठन विकृति हेतु नहीं किया गया है परन्तु यह आज भी मनोवैज्ञानिकों, क्लीनिशियन तथा शिक्षकों के बीच में अत्यधिक प्रचलित है। इस तरह की विकृति में बच्चों को पाठ पढ़ने में बड़ी ही कठिनाई होती है। ऐसे बच्चें प्राय: पाठ को रूक रूक कर पढ़ते हैं इससे उनके पाठन गति धीमी होती है तथा इसके साथ ही उन्हें मूल शब्दों को पहचानने एवं पढ़े गये शब्दों के अर्थ को समझने में भी कठिनाई होती है। मनोवैज्ञानिक रटर एवं उनके सहयोगियों (2004) के अनुसार स्कूली उम्र के लगभग 4 प्रतिशत बच्चों में डिस्लेक्सिया की समस्या होती है एवं यह लड़कों में लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा पायी जाती है।


डिस्लेक्सिया से ग्रस्त बच्चे पाठ को बहुत ही कठिनता से एवं धीरे-धीरे पढ़ते हैं तथा जब वे जल्दी जल्दी अथवा ऊॅंची आवाज में पढ़ने की कोशिश करते हैं तो शब्दों को तोड़-मरोड़कर पढ़ते हैं, इसमें कई बार वाक्य के बीच के शब्द उनसे छूट जाते हैं एवं कई बार वे उन्हें गलत भी पढ़ जाते हैं तथा कभी कभी तो उनकी जगह पर दूसरे शब्दों का उच्चारण कर बैठते हैं। उन्हें शब्दों में बीच अक्षर विभाजन में भी समस्या हो सकती है कई बार तो वे अक्षरों के संयोजन को समझने में भी दिक्कत महसूस करते हैं। परिणामस्वरूप वे शब्द का समुचित स्वर में पाठन नहीं कर पाते हैं। कभी कभी उनमें कुछ अक्षरों को उल्टा प्रत्यक्षित करने की समस्या भी होती है जैसे कि अंग्रेजी के अक्षर W को M के रूप में प्रत्यक्षित करना। इसके अलावा उन्में अक्षरों की दिशा पलटने की भी समस्या होती है जैसे कि b को d के रूप में पढ़ना। डिस्लेक्सिया अधिकांशत: 6-7 वर्ष की उम्र में पहचान में आता है। इसे बच्चों की ग्रेड 2 कक्षा से भी जोड़कर देखा जाता है। डिस्लेक्सिया से ग्रस्त बच्चों व किशोरों में डिप्रेशन, निम्नआत्ममूल्य एवं ADHD विकसित होने का खतरा काफी ज्यादा होता है।



गणित विकृति –


गणित विकृति की पहचान तब होती है जब बच्चों की बौद्धिक क्षमता की तुलना में बच्चों का अंकगणितीय प्रदर्शन काफी निम्नस्तरीय होता है। तथा उसकी शैक्षिक उपलबिधयॉं उससे प्रभावित होती हैं। ऐसे बच्चों में लिखित समस्याओं को गणितीय संकेतों में कूटबद्ध करने में भी परेशानी होती है जिससे उनमें भाषाई कौशल से संबंधित कठिनाई भी उत्पन्न हो जाती है। ऐसे बच्चों में संख्यात्मक संकेतों (numerical symbols) को समझने में भी समस्या हो सकती है। ऐसे बच्चों में मूल गणितीय संक्रियाओं को सम्पादित करने में भी कठिनाई हो सकती है जैसे कि जोड़-घटा एवं गुणा-भाग। यह समस्या वैसे तो छ: वर्ष की आयु से ही प्रारम्भ हो सकती है परन्तु बच्चे के कक्षा दो या तीन में पहुचने पर ही इसकी समुचित पहचान हो पाती है। यह लड़के एवं लड़कियों में समान रूप से पायी जाती है।


लेखन अभिव्यक्ति में विकृति –


इस विकृति की पहचान बच्चों द्वारा उनके द्वारा लिखे गये कार्य में होने वाली स्पेलिंग, व्याकरण, एवं पन्क्चुएशन में होने वाली त्रुटियों के माध्यम से की जाती है। जब बच्चा अपनी बौद्धिक क्षमता एवं आयु के स्तर से कहीं निम्नस्तर पर अत्यधिक त्रुटियॉं करता है तो इसे लेखन अभिव्यक्ति में विकृति की संज्ञा दी जाती है। ऐसे बच्चे वाक्यों को लिखने में काफी त्रुटियॉं करते हैं एवं वाक्यों को पैराग्राफ में ठीक से समायोजित भी नहीं कर पाते हैं। अधिकांशत: सात वर्ष की उम्र में अथवा कक्षा-2 में इस विकृति की पहचान हो जाती है। कुछ केसेज जो कि माइल्डर केसेज कहे जा सकते हैं में इनकी पहचान 10 वर्ष की उम्र अथवा पांचवी कक्षा में पहुचते पहुचते हो जाती है।


संचार विकृतियॉं –


भाषा को, समझने एवं इस्तेमाल करने में तथा स्पष्ट रूप से तथा धाराप्रवाह बोलने में होने वाली विकृति को संचार विकृति कहा जाता है। दैनिक जीवन में भाषा एवं भाषण की अत्यधिक महत्ता होने की वजह से यह विकृति जीवन में व्यक्ति की सफलता को उसके स्कूल जीवन, कार्यस्थल एवं सामाजिक परिस्थितियों को काफी गंभीर रूप से प्रभावित करती है। यह विकृति कई प्रकार की होती है। आइये इनके बारे में जानें।


भाषा विकृति –


भाषा विकृति में बोलचाल की भाषा को उत्पन्न कर पाने की क्षमता में विकृति एवं बोलचाल की भाषा को समझ पाने की क्षमता में विकृति को सम्मिलिति किया गया है। इसके अन्तर्गत एक बालक में उसकी उम्र विशेष के परिप्रेक्ष्य में शब्दकोष के विकास का धीमा होना, वाक्य विन्यास में गड़बड़ी, शब्दों के प्रत्याह्वान में कठिनाई एवं उपयुक्त लम्बाई तथा जटिल वाक्यों को निर्मित कर पाने में परेशानी जैसी विशिष्ट विकृतियॉं शामिल हैं। इसके अलावा इस विकृति से ग्रस्त बच्चों में शब्दों के उपयुक्त उच्चारण में भी कमी पायी जाती है जिसे स्पीच साउुंड डिस्आर्डर कहा जाता है।



भाषा विकृति से ग्रस्त बच्चों में वाक्यों अथवा शब्दों को अर्थ को न समझ पाने की समस्यायें भी पायी जाती हैं। कुछ केसेज में ऐसे बच्चे कुछ विशेष प्रकार के शब्दों को समझने में संघर्ष करते पाये जाते हैं उदाहरण के लिए ऐसे शब्द जो पदार्थ अथवा वस्तु की मात्रा में अन्तर को अभिव्यक्त करते हैं जैसे कि large, big or huge । या फिर ऐसे शब्द जो कि लम्बाई, चौड़ाई, ऊॅंचाई, अथवा दूरी या निकटता को अभिव्यक्त करते हैं जैसे कि दूर (far) अथवा पास (near) । ये हमेशा वाक्यों को छोटा कर देते हैं। श्रव्य सूचनाओं को संसाधित करने में भी कठिनाई महसूस करते हैं।


भाषण आवाज विकृति –


इस विकृति को ध्वनिक विकृति (phonological disorder) भी कहा जाता है। वैसे बच्चों को जो उपयुक्त उम्र तथा संभाषण प्रक्रम में किसी प्रकार का दोष न होने के बावजूद शब्दों अथवा वाक्यों को सही सही ढंग से बोल या उच्चारित नहीं कर पाते हैं उन्हें भाषण-आवाज विकृति या ध्वनिक विकृति का रोगी माना जाता है। ऐसे बच्चों की भाषा में बोले गये शब्दों में अस्पष्टता होती है, ये शब्दों का प्रतिस्थापन करते हैं अर्थात् बोले जाने वाले शब्द के स्थान पर कोई अन्य शब्द बोल देते हैं। कई बार ये वाक्यों में से कुछ शब्दों को छोड़कर वाक्य बोलते हैं जिससे उनकी बातचीत एक बहुत छोटे बच्चे की बातचीत के समान हो जाती है। कुछ विशेष प्रकार के शब्द जिनका बहुत बढ़िया उच्चारण साधारण बच्चे नर्सरी, अथवा केजी की कक्षा में पहुचने से पूर्व ही भली भॉंति कर पाते हैं इस विकृति से ग्रस्त बच्चे उन शब्दों जैसे कि ch, f, l, r, sh एवं th की ध्वनियों का स्पष्ट उच्चारण करने में त्रुटियॉं करते हैं। जिन बच्चों में यह विकृति ज्यादा गंभीर होती है वे तो b, d, t, m, n, एवं h का भी उच्चारण ठीक से नहीं कर पाते हैं। इस प्रकार के बच्चों को यदि स्पीच थेरेपी प्रदान की जाती है तो सामान्यतया 8 वर्ष की उम्र से पहले ही यह समस्या दूर हो जाती है।


चाइल्डहुड-ऑनसेट-फ्लूयेन्सी विकृति –


इस विकृति को हकलाना विकृति (Stuttering) भी कहा जाता है। डी.एस.एम.-4 में इसे हकलाना विकृति के रूप में ही अभिव्यक्त किया जाता था। डी.एस.एम-5 के संस्करण में इसे चाइल्डहुड-ऑनसेट-फ्लूयेन्सी विकृति के नाम से वर्गीकृत किया गया है। इस विकृति से ग्रस्त बच्चे अपने बोलचाल के सामान्य प्रवाह तथा बोलने में लगने वाले समय के पैटर्निंग में परेशानी का अनुभव करते हैं। वे किसी अक्षर अथवा शब्द को कभी-कभी दोहरा देते हैं, या कभी उसे लम्बे समय तक खींचकर बोलते हैं, या कभी शब्द को बीच में ही बोल देते हैं, एक शब्द के भीतर एक अक्षर बोल कर रूक जाते हैं और फिर पुन: बोलते हैं, आवाज को अवरूद्ध कर देते हैं तथा अन्य कठिन शब्दों की जगह पर दूसरे शब्द बोलने लगते हैं, या फिर यदि मूल शब्दों को बोलते समय काफी तनाव का अनुभव करते हैं। एक ही पद में पूरा शब्द बोल देते हैं, आदि आदि। लगभग 1 प्रतिशत बच्चों में हकलाने की विकृति पायी जाती है इनमें 75 प्रतिशत लड़के होते हैं। हकलाने की समस्या प्राय: दो से सात वर्ष की उम्र में प्रारम्भ होती है और इनमें जसे तकरीबन 75 प्रतिशत बच्चे बिना उपचार के ही 15-16 वर्ष की उम्र तक आते आते अपने आप ही ठीक हो जाते हैं।


सामाजिक संचार विकृति –


सामाजिक संचार विकृति डी.एस.एम-5 में संचार विकृति के अन्तर्गत सम्मिलित की गयी एक नये प्रकार की विकृति है जो कि इससे पूर्व डी.एस.एम. के किसी अन्य पूर्व संस्करण में वर्गीकृत नहीं की गयी थी। इस विकृति की डायग्नोसिस किसी बालक के संबंध में तब की जाती है जब कि कोई बच्चा जीवन की स्वाभाविक परिस्थितियों जैसे कि, स्कूल, घर, खेल आदि में अन्य व्यक्तियों के साथ शाब्दिक अथवा अशाब्दिक रूप से दूसरे लोगों के साथ बातचीत नहीं कर पाता है एवं यह लम्बे समय से एवं स्पष्ट रूप में चल रहा होता है। इन बच्चों में बातचीत को लम्बे समय तक करने में कठिनाई होती है तथा वे कभी कभी बच्चों के समूह में होने पर अपनी इस कठिनाई के चलते चुप रह जाते हैं। उन्हें बोलचाल एवं लिखने वाली भाषा दोनों को ही सीखने में कठिनाई होती है। इस प्रकार की समस्या होने के बावजूद उनकी अन्य भाषाई एवं मानसिक योग्यता में औसत रूप से कोई भी कमी दृष्टिगोचर नहीं होती है जिससे कि कहा जा सके कि भाषा के ज्ञान के औसत से निम्नस्तर का होने एवं मानसिक योग्यता का औसत से निम्नस्तर होने की कमी के कारण वे बोलचाल में पिछड़े हुए हैं। हालॉंकि बोलचाल की यह सामाजिक अक्षमता जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी सफलता एवं उन्नति को गंभीर रूप से प्रभावित अवश्य करती है।


पेशीय कौशल विकृतियॉं –


इसे विकासात्मक समन्वय विकृति (developmental coordination disordrer) भी कहा जाता है। इस प्रकार की डायग्नोसिस तब की जाती है जब कि बच्चों में पेशीय समन्वय (motor coordination) में कोई ऐसा दोष हो जिसकी व्याख्या मानसिक दुर्बलता या किसी ज्ञात फिजियोलॉजिकल डिस्आर्डर के रूप में नहीं की जा सकती है। इस प्रकार की विकृति होने

पर बच्चे को अपनी कमीज के बटन लगाने में परेशानी हो सकती है, क्रिकेट खेलने, कैरम खेलने, निशानेबाजी, हाथ से लिखने, जूते का फीता बॉंधने आदि में कठिनाई हो सकती है। इस विकृति की डायग्नोसिस तभी की जाती है जब कि इस प्रकार की समस्याओं से बच्चे की शैक्षिक उपलब्धि या दैनिक क्रियायें गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हों।



अधिगम असमर्थता के कारण


वैसे तो कारण एवं कारक कई हो सकते हैं परन्तु जो प्रमुख हैं एवं जिनकी आपको जानकारी होनी चाहिए –

अधिगम असमर्थता के अंतर्गत अधिगम विकृति पर किये गये शोध अनुसंधानों एवं सिद्धान्तों के अनुसार इस विकृति के कारकों में जैविक (genetic), न्यूरोबायलॉजिकल (neurobiological), एवं वातावरणीय (environmental) कारक प्रमुख हैं। इनका समवेत विवेचन इस प्रकार है।


उपरोक्त तीनों प्रकार के कारकों में आनुवॉंशिक कारकों का विश्लेषण सर्वाधिक जटिल है। यद्यपि वैज्ञानिक फ्लेचर एवं उनके सहयोगियों के अनुसार जुड़वॉं युग्मों तथा उन्नत परिवारों पर किये गये अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि अधिगम विकृति परिवारों में वृक्ष की शाखाओं के समान फैलती है एवं पायी जाती है तथापि इस विकृति के लिए जिम्मेदार जीन्स का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि अलग अलग प्रकार के अधिगम विकृति के लिए अलग अलग प्रकार के कौन से जीन्स इसके विकसित होने के लिए उत्तरदायी हैं उनका विशिष्ट रूप से अभी तक प्रकाशन नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए पठन विकृति (reading disorder) या गणित विकृति (mathematics disorder) के लिए विशिष्ट रूप से जिम्मेदार जीन्स की पहचान वैज्ञानिक अभी तक नहीं कर पाये हैं। हालॉंकि यह अधिगम विकृति के लिए जिम्मेदार जीन्स की पहचान अवश्य हो गयी है जो कि पठन विकृति आदि अन्य सभी प्रकार की अधिगम विकृति के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।


मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अधिगम विकृति से जुड़ी हुई अलग-अलग प्रकार की समस्याओं के लिए अलग अलग कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए बच्चों में पठन विकृति से संबंधित विभिन्न समस्याओं जैसे कि शब्द पहचान (word recognition), शब्द प्रवाह (fluency) एवं समझ (comprehension) के लिए अलग अलग कारक हो सकते हैं। टैनोक (2009) के अनुसार शब्द पहचान से संबंधित विकृति के लिए अभी तक हुए अनुसंधानों से दो प्रकार के प्रमाण मिलते हैं एक प्रकार के प्रमाण इस विकृति के लिए आनुवांशिक कारकों यानि कि जीन्स को इसके लिए प्रमुख कारक सिद्ध करते हैं वही दूसरे तरह के प्रमाण इसमें वातावरणीय असर को प्रदर्शित करते हैं। टैनोक यह भी कहते हैं कि इस प्रकार की विकृति के लिए क्रोमोसोम्स में स्थित जीन संख्या 1, 2, 3, 6, 11, 12, 15 एवं 18 को विभिन्न अनुसंधानों में बार-बार संबंधित पाया गया है। वहीं पेट्रिल एवं उनके सहयोगी (2006) ने अपने शोध अनुसंधानों में वातावरणीय प्रभावों को इस विकृति से सहसंबंधित पाया है।


उनके अनुसार परिवारों में पढ़ने का वातावरण बच्चों की पठन आदत को महत्वपूर्ण रूप में प्रभावित करता है उनके अनुसार जिन परिवारों में पठन विकृति होने के बावजूद रीडिंग आदत को कुशलतापूर्वक बच्चों में स्थापित किया गया है उन परिवारों में अन्य परिवारों के बच्चों की अपेक्षा पठन विकृति की समस्या सार्थक रूप से कम विद्यमान होती है। यहॉं तक कि यदि योजनाबद्ध रीति से यदि पठन विकृति से ग्रस्त बच्चों में घर के स्नेहिल वातावरण में पठन-पाठन का अभ्यास कराया जाये एवं उनमें इस आदत को विकसित किया जाये तो विशेष रूप से उनके शब्द पहचान की समस्या के खतरे को कम किया जा सकता है।



सूक्ष्म मस्तिष्कीय विघटन अथवा क्षति को भी अधिगम विकृति से जोड़ा जाता रहा है। एवं वैज्ञानिक हिन्सेलवुड (1996) जैसे पूर्ववर्ती विद्वान इसकी न्यूरोलॉजिकल व्याख्या भी करते रहे हैं। शेविट्ज एवं उनके सहयोगियों (2006) के अनुसार अधिगम असमर्थता से ग्रस्त रोगियों के मस्तिष्क में संरचनात्मक (structural) एवं प्रकार्यात्मक (functional) विभिन्नताओं के प्रमाण उपलब्ध हैं खासतौर पर शब्द पहचान समस्या यानि की डिस्लेक्सिया की व्याख्या हेतु बॉंये हिमेस्फियर के तीन प्रमुख हिस्सों के माध्यम से की जाती है। इन तीन हिस्सों में पहला है ब्रोका एरिया (Broca’s area) जो कि शाब्दिक अभिव्यंजना एवं शब्द विश्लेषण को प्रभावित करता है, तथा दूसरा एरिया बॉंया पैराइटोटेम्पोरल (left- parietotemporal) एरिया है जो कि शब्द विश्लेषण को प्रभावित करता है तथा तीसरा एरिया बॉंया ऑक्सीटिपोटेम्पोरल (left- occitipotemporal) एरिया है जो कि शब्द के स्वरूप की पहचान (recognition of word form) को प्रभावित करता है।


फ्लेचर एवं उनके सहयोगियों (2007) के अनुसार संख्या ज्ञान के विकसित होने में मस्तिष्क के बॉंये हिमेस्फियर का इन्ट्रापैराइटल सलकस (intra-parietal sulcus) एक ऐसा एरिया है जो कि इसमें महत्वपूर्ण रूप से जुड़ा हुआ है तथा इसकी गणित विकृति में अहम् भूमिका होती है।

उपरोक्त सभी प्रकार की अधिगम विकृति की तुलना में लेखन अभिव्यक्ति विकृति के संबंध में अभी तक कोई भी विशिष्ट कारक संबंधी प्रमाण नहीं मिले हैं।


इसके अलावा संचार विकृति के प्रमुख प्रकार चाइल्ड-ऑनसेट-फ्लूयेन्सी विकृति (हकलाना विकृति) के संबंध में फिबिगर एवं उनके सहयोगियों (2010) का कहना है कि इसका प्रमुख कारण आनुवांशिक है। उनके अनुसार अनुमानत: कहा जा सकता है कि इस विकृति के लिए संभाषण करने के लिए जो मांसपेशियॉं सम्मिलित होती हैं उन्हें नियंत्रित करने वाले जीन्स ही इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। वैज्ञानिक कांग एवं उनके सहयोगियों (2010) के अनुसार एक विशेष प्रकार के जीन के म्यूटेशन को हकलाने वाले बच्चों में विभिन्न वैज्ञानिकों के शोध अनुसंधानों में रिपोर्ट किया गया है संभवतया वह म्यूटेशन भी हकलाने की विकृति से संबंधित हो सकता है। हालॉंकि इसकी वैधता के संबंध में अनुसंधान जारी


हकलाने की इस विकृति के कारण कई सांवेगिक प्रभाव एवं परिणाम भी इससे ग्रस्त बच्चों में अधिकांशत: देखने को मिलते हैं। करास एवं उनके सहयोगियों के अनुसार इस विकृति से ग्रस्त बच्चे जब तनाव अथवा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में फंस जाते हैं या उनसे उनका सामना होता है तब वे सामान्य बच्चों के तुलना में कहीं अधिक उत्तेजित एवं क्षुब्ध हो जाते हैं। इसके अलावा इनमें नहीं हकलाने वाले बच्चों के अपेक्षा सांवेगिक प्रतिक्रिया वृत्ति भी काफी अधिक होती है। क्राइमात एवं उनके सहयोगियों (2002) के अनुसार हकलाने वाले बच्चों में इस विचार को लेकर कि उनके हकलाने को देखकर दूसरे लोग क्या कहेंगे अथवा उनकी हंसी उड़ायेंगे सोचकर, सामाजिक चिंता (social anxiety) की संमस्या भी काफी मात्रा में उत्पन्न हो जाती है। हकलाने वाले बच्चों में प्राय: उनकी इस समस्या के साथ बोलने के संबंध में चिंता की समस्या, वैसी परिस्थितियॉं जहॉं बोलने की आवश्यकता पड़ती है का परिहार करने की प्रवृत्ति भी पायी जाती है। यह प्रवृत्ति प्राय: व्याकुलता से उत्पन्न होती है।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होती है कि अधिगम असमर्थता अथवा अधिगम विकृति, संचार विकृति आदि के कई कारण होते हैं अभी इस क्षेत्र में पर्याप्त शोध अनुसंधान नहीं हो पायें है जिन्हें किये जाने की महती आवश्यकता है।



ऑनलाइन सेवा


गोस्वामी कॉमन सर्विस सेंटर

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1. सभी प्रकार के ऑनलाइन आवेदन और LIC किस्त जमा किया जाता है

2. सभी प्रकार के ऑनलाइन बिल जमा किए जाते है

3. रूपए ट्रांसफर किए जाते है

4. पीएम किसान सम्मान निधि योजना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाता है

5. सभी प्रकार से ऑनलाइन फॉर्म भरे जाते है।

6. ऑनलाइन एंप्लायमेंट रजिस्ट्रेशन किया जाता है

7. सभी प्रकार के ऑनलाइन फलेक्सी ओर रिचार्ज किए जाते है

8. कुमाऊं यूनिवर्सिटी की ऑनलाइन डिग्री, माइग्रेशन प्रमाण पत्र के लिए अप्लाई

9. कुमाऊं यूनिवर्सिटी ऑनलाइन एडमिशन

10. आरसीआई ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन

11. सीटेट / UTET ओर NET Exam k लिए अप्लाई

12. उत्तराखंड मुक्त विश्व विद्यालय की डिग्री के लिए अप्लाई

13. एग्जाम फॉर्म और बैक एग्जाम फॉर्म

14. ऑनलाइन एडमिशन फॉर्म

15.ऑनलाइन आधार कार्ड बनाने

16. ऑनलाइन स्कॉलरशिप का फॉर्म फिल

17.ऑनलाइन आरडी जमा करने

18.ऑनलाइन पेन कार्ड सेवा

19.ऑनलाइन लाइफ पेंशनर सर्टिफिकेट(जीवित प्रमाण पत्र)

20. ऑनलाइन मैरिज सर्टिफिकेट

21. ऑनलाइन पहचान पत्र बनवाना आदि।


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Monday, April 24, 2023

गोस्वामी समाज

 गोस्वामी समाज केवल एक जाति नही बल्कि एक सम्प्रदाय है एक ऐसा पंथ जो सदैव से ही भगवान महादेव की आराधना को अपना प्रथम कर्तव्य मानते हुए सनातन धर्म का प्रचार प्रसार  करता है।

अनादिकाल से शैव ब्रह्मणों का ये सम्प्रदाय पठन पाठन, योग व अनेकों प्रकार के शोध के कार्य मे व्यस्त रहता था।  कुछ जानकारों के अनुसार इस पंथ का उदय आदिगुरू शंकराचार्य जी के समय हुआ था। जबकि अगर गहनता से अध्यन करें तो पता चलता है ये पंथ अनादिकाल से भगवान महादेव की सेवा मे गणों के रूप मे विधमान है।

समय समय पर स्वंय भगवान महादेव ने इस पंथ की पद भ्रष्ट होने व अपने कर्तव्य से विमुखता को रोकने के लिए गुरु दत्तात्रेय, आदि गुरु शंकराचार्य के रूप मे अवतार लिया। व शैव ब्रह्मणों को धर्म रक्षा के लिए प्रेरित किया। धर्मरक्षक सन्यासियों का ये सम्प्रदाय दो भाग मे विभाजित हो गया. गृहस्ती और सन्यासी जो साधु गृहस्त जीवन मे आ गए वह गृहस्थ जीवन मे भी अपनी परम्परा अपने उपनामों से जुड़े रहे।

ऐसा नही है की सभी गोस्वामी शैव है वैष्णव सम्प्रदाय मे भी गोस्वामी होते है 

आज हम केवल शैव ब्रह्मणों व दशनामी गोस्वामी पर चर्चा कर रहे है जिनको प्रमुख दश नामों से जाना जाता है जिनमें गिरी,पुरी,भारती,सरस्वती,सागर, अरण्य,तीर्थ,वन,आश्रम, व पर्वत हैं।


आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म की हानि रोकने के लिए इस सम्प्रदाय को 10 भागों में विभाजित कर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मरक्षार्थ हेतु भेज दिया। जिन संन्यासियों ने पहाड़ियों एवं पर्वतीय क्षेत्रों में प्रस्थान किया, वे गिरी एवं पर्वत और जिन्हें जंगली इलाकों में भेजा, उन्हें वन एवं अरण्य नाम दिया गया। जो संन्यासी सरस्वती नदी के किनारे धर्म प्रचार कर रहे थे, वे सरस्वती और जो जगन्नाथपुरी के क्षेत्र में प्रचार कर रहे थे, वे पुरी कहलाए। जो समुद्री तटों पर गए, वे सागर और जो तीर्थस्थल पर प्रचार कर रहे थे, वे तीर्थ कहलाए। जिन्हें मठ व आश्रम सौंपे गए, वे आश्रम और जो धार्मिक नगरी भारती में प्रचार कर रहे थे, वे भारती कहलाए। 

 इन सन्यासियों ने तपस्या के बल से अपनी पांचों इन्द्रियों को वश में कर लिया था इसलिए इन्हें गोस्वामी कहा गया।  गो का एक अर्थ इन्द्रियां होता है और स्वामी का अर्थ उनको वश में करने वाला होता है। गोस्वामी अर्थातः पांचों इन्द्रियों को वश में रखने वाला।

इन साधुओं को भिन्न उपाधियां दी जाती हैं। इसमें महामंडलेश्वर, श्रीमहंत, महंत, एवं आचार्य आदि होते है।  नागा  साधु भी इस ही परम्परा मे आते है नागाओं को शंकराचार्य की सेना भी कहा जाता है नागा साधु को शस्त्र चलाने मे पारंगत हासिल है वे दिगम्बर होते है। नागाओं को समझने के लिए पहले गोस्वामी संप्रदाय को समझना बहुत जरूरी है।


दशनामी गोस्वामी पंथ विज्ञान के आधार पर धर्म का प्रचार प्रसार करते है। शैव व वैष्णव सम्प्रदाय के महान संतों ने आयुर्वेद, योग, ज्योतिष आदि विषय पर शोध कर जनमानस को लाभांवित कराया। दशनामी पंथ मठों व आश्रमों की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के कार्य मे निपुण है। वर्तमान मे इनका प्रमुख कार्य शिव मंदिरों मे पूजा करना, धर्म उपदेश देना व धर्म का प्रचार प्रसार करना होता है

दशनामी सम्प्रदाय मे कुल 52 गोत्रों होते है। जिन्हे मढ़ी भी कहा जाता है गिरियों की कुल 27 मढ़ी, पुरियों की कुल 16, भारतीयों की कुल 4 मढ़ी, वनों की कुल 4 मढ़ी, व लामा गुरु की 1 मढ़ी है। 


गिरि :1.ऋद्धिनाथी, 2.संजानाथी, 

3.दुर्गानाथी, 4.ब्रह्मांडनाथी, 5.बैकुंठनाथी, 6.ब्रह्मनाथी, 7. रामदत्ती, 8. श्रृयभृंगनाथी, 9.ज्ञाननाथी,10.माननाथी,11. बलभद्रनाथी,

12. अपारनाथी, 13. पाटम्बरनाथी, 14.सागरबोदला, 15. ओंकारी, 16.सिंह श्याम यति, 17.चंदननाथी, 18.नागेंद्रनाथी, 19.सहजनाथी, 20.मोहननाथी,21.बालेंद्रनाथी, 22. रुद्रनाथी, 23.कुमुस्थनाथी, 24.परमानंदी, 25.सागरनाथी, 26.बाघनाथी, 27. रतननाथी, 

वन: 1.श्याम सुंदर वन, 2. गंगा वन व बलभद्र वन, 3 गोपाल वन व शंखधारी वन, 4. भगवंत वन व रामचंद्र वन,

लामा: 1 वेदगिरि लामा मढ़ी।

पुरी:1.केवल पुरी, 2.अचिंत्य पुरी, 3.मथुरा पुरी, 4.माधव पुरी, 5.हृषिकेश पुरी, 6.जगदेव पुरी, 7.रामचंद्र पुरी, 8.व्यंकट पुरी, 

9.श्याम सुंदर पुरी,10.जड़भरत पुरी, 11.गंगा दर्याव पुरी,12.सिंह दर्याव पुरी,13. भगवान पुरी,14.भगवंत पुरी,15. सहज पुरी,16.मेघनाथ पुरी।

भारती:1.नृसिंह भारती, 2.मनमुकुंद भारती, 3.विश्वम्भर भारती, 4.मनमहेश भारती।

इस सम्प्रदाय के लोग एक दूसरे का सम्बोधन "ओम नमो नारायण" व "हर हर महादेव" से करते है।


13 अखाड़े मे से 7 शैव संन्यासी संप्रदाय के अखाड़े है जिनके नाम 

1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी,

2. श्री पंच अटल अखाड़ा,

3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी,

4. श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती,

5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा,

6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा,

7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा, है। 

वर्तमान मे दशनामी सम्प्रदाय केवल एक जाति बन कर रह गया है। जो इस संप्रदाय को समझते है वो आज भी अतीत मे जी रहे है। युवा वर्ग आज भी अपने इस संप्रदाय से पूर्ण रूप से परिचित नही है। होंगे भी कैसे इतिहासकारों ने इस संप्रदाय के महान सन्यासियों व महान योद्धाओं के इतिहास को जनता से छिपाया है। आज अगर बात करें इस सम्प्रदाय के महान सन्यासियों, यौद्धाओं, क्रांतिकारियों, की तो शायद ही कोई युवा बता पाएगा। दशनामी सम्प्रदाय को सदैव से ही सम्मान की नजर से देखा जाता था परन्तु वर्तमान मे धर्म रक्षकों के इस महान सम्प्रदाय को घुमन्तू जाति बना कर रख दिया गया है। ये सम्प्रदाय श्रेष्ठ होने की प्रतिस्पर्धा से ये पंथ दूर रहा। जिसके चलते आज इस सम्प्रदाय का सम्मान कम हो रहा है। तथा गृहस्थ भी आध्यत्मिक ज्ञान व कर्मकांडों से दूर हो रहे है। अन्य जातियों के भाति ही जीवन यापन कर रहे है।


गोस्वामी का दूसरा नाम गोसाईं है और दोनों का अर्थ होता है -- गो + आत्मा = आत्मा का स्वामी या जितेंद्रिय या मनवशकर्त्ता या पृथ्वीराज या ब्रह्मांड का मालिक । इस लिहाज से देखें तो गोस्वामी या गोसाईं का अर्थ अत्यंत पवित्र , श्रेष्ठ और और कल्याणकारी होता है। पहले यह एक उपाधि होती थी , फिर यह पंथ बनी और अब एक जाति है ।


प्रोo प्रकाश गोस्वामी स्पेशल एजुकेटर

सचिव प्रदेश इकाई 

नासेर्प, उत्तराखंड


एंड 


सलाहकार, विशेष शिक्षक प्रशिकक्षु एसोसिएशन उत्तराखण्ड


कुमाऊँ संयोजक, हेल्प फाउंडेशन उत्तराखंड


ब्लॉक प्रभारी

देवभूमि जनसेवा संस्था बागेश्वर उत्तराखंड


एंड


जिला मीडिया प्रभारी, ओबीसी मोर्चा बागेश्वर, भारतीय जनता पार्टी जनपद बागेश्वर 


🪀9690663544 / 7253994805



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My Nyu blogs

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Friday, February 18, 2022

पीठ दर्द होने के कारण और उपचार

 पीठ दर्द होने के कारण और उपचार : Back Pain Cause And Remedy



पीठ दर्द एक ऐसा शब्द है जो आसानी से किसी भी घर में सुना जा सकता है। आजकल पीठ दर्द की समस्या होना सबसे आम स्वास्थ्य समस्या है, जो की सभी उम्र के लोगों को प्रभावित करता है। आमतौर पर यह समस्या 40 से 60 साल से अधिक उम्र के लोगों और वृद्ध व्यक्तियों को होती है। पीठ दर्द के लक्षणों में पेडू और कूल्हों के आसपास दर्द, उठने-बैठने में दर्द जैसी समस्यायें शामिल होती है। इसके सुधार से जुड़ें पहलु पर ध्यान देने से पहले हम यह जानने की कोशिश करें की पीठ का दर्द किन कारण से पैदा होता है।


पीठ दर्द होने के कारण और उपचार : Back Pain Cause And Remedy



पीठ दर्द के कारण - Causes Of Back Pain


1. जोड़ों का खुलना या टूटना (Due To Joint Pull)


अगर रीढ़ की हड्डी के जोड़ों को आपके खींचने, धकेलने, उठाने, व झटका देने जैसे कई काम लगातार करने पड़े तो उनके कार्टिलेज खुल जाते है और जिस स्थान से नाड़ियाँ होकर गुजरती हैं, वे सँकरे हो सकते हैं। ऐसी स्तिथि में इतना तेज़ पीठ दर्द पैदा हो जाता है। जो पूरा जीवन आपका साथ नहीं छोड़ता।


2. लिगमेंट की परेशानी (Due To Ligament Injury)


अगर आप अपनी रीढ़ की हड्डी में खिचाव नहीं लाते, तो आगे चल कर इनके लिगमेंट अकड़े हुए, बिना लोच के और दर्दनाक हो सकते हैं। लिगमेंट में अकड़न से रीढ़ की हड्डी में भी जकड़न आ सकती है। इससे खतरनाक हालत बन सकते हैं। पीठ और गर्दन के लिए कई बड़ी समस्याएं कड़ी हो सकती हैं।


3. डेजेनेरेटिव बदलाव (Degenerative Changes)


यह बदलाव भी पीठ दर्द की वजह हो सकता है। आयु भी रीढ़ की हड्डी में सभी जोड़ों पर एक सा असर डालती है लेकिन कभी-कभी कोई जल्दी ही टूट जाता है। कई बार छोटी उम्र में ही डेजेनेरेटिव बदलाव दिखाई देने लगते हैं पर ऐसा केवल एक या दो जोड़ों में ही होता है।


4. डिस्क का खिसकना (Slip Disk)


डिस्क का बहार की ओर उभरना भी पीठ दर्द का कारण बन जाता है। शारीरिक काम ज़्यादा करने वाले में यह पाया जाता है। इसके कारण शियाटिका का दर्द भी उभर आता है। डिस्क की कमजोरी से इस बात का पता भी चलता है की आस पास के जोड़ और लिगमेंट भी लगातार तनाव झेल रहे हैं और कभी भी टूट सकते हैं।


5. अपच तथा पेट का अलसर (Indigestion And Stomach Ulcers)


अपच या पेट का अलसर होने वाले दर्द का असर पेट के ऊपरी हिस्से के बीचों-बिच होता है, लेकिन कई बार यह पीठ के बीचों-बिच भी हो सकता है। भरी, फैट फूड्स हज़म ना हो पाने की वजह से यह दर्द और भी बढ़ जाता है।


6. अचानक झुकना या मुड़ना या बिना वार्मअप किये व्यायाम करना (Sudden Movement Or Due To Less Warmup)


अगर आप अचानक झुकें या मुड़ें तो आपके कशेरुक को सँभालने वाले लिगमेंट टूट सकते हैं। अगर आप वार्मअप किये बिना अचानक कसरत करते हैं तो कमज़ोर मासपेशियाँ थक जाती हैं।


पीठ दर्द के उपाय - Back Pain Remedies

1- हमेशा सीधे बैठने और सीधे चलने की कोशिश करें। 


जब भी पीठ दर्द हो तब व्यायाम ना करें।


2- लगातार कुर्सी पर ना बैठें और बीच-बीच में ब्रेक लेते रहें।


- विटामिन D, C, कैल्शीयम और फास्फोंरस से भरपूर आहार लेते रहे।


3- प्रतिदिन व्यायाम करें।


4- जिन लोगो को पीठ दर्द की समस्या रहती है, उन्हें हमेशा सख्त बिस्तर पर सोना चाहिए।


5- कंप्यूटर पर काम करते वक़्त शरीर बिल्कुल सीधा रखें।


6- ज्यादा भारी सामान न उठाएं।


7- खाने में कैल्शियम और विटमिन की मात्रा को शामिल करे।


                           ****




दिव्यांग कार्ड बनवाये गोस्वामी साइबर कैफे से


दिव्यांगता कार्ड के लाभ



दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कई लाभ लाएगा।दिव्यांग व्यक्तियों को दस्तावेजों की कई प्रतियां बनाने, बनाए रखने और कई दस्तावेजों को ले जाने की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि कार्ड सभी आवश्यक विवरणों को कैप्चर करेगा जिन्हें एक पाठक की मदद से डिकोड किया जा सकता है


 यूडीआईडी ​​कार्ड भविष्य में विभिन्न लाभों का लाभ उठाने के लिए दिव्यांग की पहचान, सत्यापन का एकल दस्तावेज होगा


 यूडीआईडी ​​कार्ड कार्यान्वयन के पदानुक्रम के सभी स्तरों - ग्राम स्तर, ब्लॉक स्तर, जिला स्तर, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर लाभार्थी की भौतिक और वित्तीय प्रगति की ट्रैकिंग को सुव्यवस्थित करने में भी मदद करेगा।


कार्ड बनाने के लिए डॉक्यूमेंट 


1. आधार कार्ड

2. पेंशन कार्ड

3. दिव्यांगता सर्टिफिकट

4. फोटो

5. मोबाइल नंबर

6. साइन/ थंब

7. आय प्रमाण पत्र आदि। 



नोट: सभी प्रकार के आँनलाइन कार्य किए जाते है। 


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भारत गैस एजेंसी  घांघली


भारत गैस सुविधा उपलब्ध है जिसमें न्यू कनेक्शन सिंगल सिलेंडर कनेक्शन, गैस बुकिंग,

डबल सिलेंडर कनेक्शन, डीबीसी कनेक्शन के साथ साथ खाली सिलेंडर रिफिल किए जाते है। 

 

अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें।


प्रोo प्रकाश गोस्वामी स्पेशल एजुकेटर

प्रदेश अध्यक्ष 

नासेर्प, उत्तराखंड


एंड 


ब्लॉक प्रभारी

देवभूमि जनसेवा संस्था बागेश्वर उत्तराखंड


🪀9690663544 / 7253994805

Friday, July 2, 2021

नाथो का इतिहास

दोस्तो आज मैं आपको नाथो के नाथ की कहानी विस्तार रूप से बताऊंगा।

      

     प्राचीन काल में तिब्बत हिन्दू धर्म का प्रमुख केंद्र था। इसे वेद-पुराणों में त्रिविष्टप कहा गया है। तिब्बत प्राचीन काल से ही योगियों और सिद्धों का घर माना जाता रहा है तथा अपने पर्वतीय सौंदर्य के लिए भी यह प्रसिद्ध है। संसार में सबसे अधिक ऊंचाई पर बसा हुआ प्रदेश तिब्बत ही है। तिब्बत मध्य एशिया का सबसे ऊंचा प्रमुख पठार है। वर्तमान में यह बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र है।


तिब्बत का द्रुकपा संप्रदाय और हेमिस मठ


तिब्बत में ही भगवान शिव का निवास स्थान कैलास पर्वत और मानसरोवर स्थित है। इसे धरती का स्वर्ग कहा गया है। महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में स्वर्गारोहण में स्पष्ट किया गया है कि तिब्बत हिमालय के उस राज्य को पुकारा जाता था जिसमें नंदनकानन नामक देवराज इंद्र का देश था। इससे सिद्ध होता है कि इंद्र स्वर्ग में नहीं धरती पर ही हिमालय के इलाके में रहते थे। वहीं शिव और अन्य देवता भी रहते थे।


राहुलजी सांस्कृतायन के अनुसार तिब्बत के 84 सिद्धों की परम्परा 'सरहपा' से आरंभ हुई और नरोपा पर पूरी हुई। सरहपा चौरासी सिद्धों में सर्व प्रथम थे। इस प्रकार इसका प्रमाण अन्यत्र भी मिलता है लेकिन तिब्बती मान्यता अनुसार सरहपा से पहले भी पांच सिद्ध हुए हैं। इन सिद्धों को हिन्दू या बौद्ध धर्म का कहना सही नहीं होगा क्योंकि ये तो वाममार्ग के अनुयायी थे और यह मार्ग दोनों ही धर्म में समाया था। बौद्ध धर्म के अनुयायी मानते हैं कि सिद्धों की वज्रयान शाखा में ही चौरासी सिद्धों की परंपरा की शुरुआत हुई, लेकिन आप देखिए की इसी लिस्ट में भारत में मनीमा को मछींद्रनाथ, गोरक्षपा को गोरखनाथ, चोरंगीपा को चोरंगीनाथ और चर्पटीपा को चर्पटनाथ कहा जाता है। यही नाथों की परंपरा के 84 सिद्ध हैं।


यहां प्रस्तुत है तिब्बत के 84 सिद्धों की लिस्ट...


1.लूहिपा, 2.लोल्लप, 3.विरूपा, 4.डोम्भीपा, 5.शबरीपा, 6.सरहपा, 7.कंकालीपा, 8.मीनपा, 9.गोरक्षपा, 10.चोरंगीपा, 11.वीणापा, 12.शांतिपा, 13.तंतिपा, 14.चमरिपा, 15.खंड्‍पा, 16.नागार्जुन, 17.कराहपा, 18.कर्णरिया, 19.थगनपा, 20.नारोपा, 21.शलिपा, 22.तिलोपा, 23.छत्रपा, 24.भद्रपा, 25.दोखंधिपा, 26.अजोगिपा, 27.कालपा, 28.घोम्भिपा, 29.कंकणपा, 30.कमरिपा, 31.डेंगिपा, 32.भदेपा, 33.तंघेपा, 34.कुकरिपा, 35.कुसूलिपा, 36.धर्मपा, 37.महीपा, 38.अचिंतिपा, 39.भलहपा, 40.नलिनपा, 41.भुसुकपा, 42.इंद्रभूति, 43.मेकोपा, 44.कुड़ालिया, 45.कमरिपा, 46.जालंधरपा, 47.राहुलपा, 48.धर्मरिया, 49.धोकरिया, 50.मेदिनीपा, 51.पंकजपा, 52.घटापा, 53.जोगीपा, 54.चेलुकपा, 55.गुंडरिया, 56.लुचिकपा, 57.निर्गुणपा, 58.जयानंत, 59.चर्पटीपा, 60.चंपकपा, 61.भिखनपा, 62.भलिपा, 63.कुमरिया, 64.जबरिया, 65.मणिभद्रा, 66.मेखला, 67.कनखलपा, 68.कलकलपा, 69.कंतलिया, 70.धहुलिपा, 71.उधलिपा, 72.कपालपा, 73.किलपा, 74.सागरपा, 75.सर्वभक्षपा, 76.नागोबोधिपा, 77.दारिकपा, 78.पुतलिपा, 79.पनहपा, 80.कोकालिपा, 81.अनंगपा, 82.लक्ष्मीकरा, 83.समुदपा और 84.भलिपा।


नवनाथ : आदिनाथ, अचल अचंभानाथ, संतोषनाथ, सत्यानाथ, उदयनाथ, गजबलिनाथ, चौरंगीनाथ, मत्स्येंद्रनाथ और गौरखनाथ।


इन नामों के अंत में पा जो प्रत्यय लगा है, वह संस्कृत 'पाद' शब्द का लघुरूप है। नवनाथ की परंपरा के इन सिद्धों की परंपरा के कारण ही मध्यकाल में हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म के अस्तित्व की रक्षा होती रही। इन सिद्धों के कारण ही अन्य धर्म के संतों की परंपरा भी शुरू हुई। इन सिद्धों के इतिहास को संवरक्षित किए जाने की अत्यंत आवश्यकता है।


सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। कहा यह भी जाता है कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं।


सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रवृत्ति ने एक प्रकार की स्वच्छंदता को जन्म दिया जिसकी प्रतिक्रिया में नाथ संप्रदाय शुरू हुआ। नाथ-साधु हठयोग पर विशेष बल देते थे। वे योग मार्गी थे। वे निर्गुण निराकार ईश्वर को मानते थे। तथाकथित नीची जातियों के लोगों में से कई पहुंचे हुए सिद्ध एवं नाथ हुए हैं। नाथ-संप्रदाय में गोरखनाथ सबसे महत्वपूर्ण थे। आपकी कई रचनाएं प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त चौरन्गीनाथ, गोपीचन्द, भरथरी आदि नाथ पन्थ के प्रमुख कवि है। इस समय की रचनाएं साधारणतः दोहों अथवा पदों में प्राप्त होती हैं, कभी-कभी चौपाई का भी प्रयोग मिलता है। परवर्ती संत-साहित्य पर सिध्दों और विशेषकर नाथों का गहरा प्रभाव पड़ा है।


गोरक्षनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। राहुल सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. की 13वीं सदी का मानते हैं। नाथ परम्परा की शुरुआत बहुत प्राचीन रही है, किंतु गोरखनाथ से इस परम्परा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे। दोनों को चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है।


गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। इनके नाम पर एक नगर का नाम गोरखपुर है। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखपंथी साहित्य के अनुसार आदिनाथ स्वयं भगवान शिव को माना जाता है। शिव की परम्परा को सही रूप में आगे बढ़ाने वाले गुरु मत्स्येन्द्रनाथ हुए। ऐसा नाथ सम्प्रदाय में माना जाता है।


गोरखनाथ से पहले अनेक सम्प्रदाय थे, जिनका नाथ सम्प्रदाय में विलय हो गया। शैव एवं शाक्तों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन तथा वैष्णव योग मार्गी भी उनके सम्प्रदाय में आ मिले थे।


गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणीधान को अधिक महत्व दिया है। इनके माध्‍यम से ही उन्होंने हठयोग का उपदेश दिया। गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नए-नए प्रयोग करते थे। गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 40 बताई जाती है किन्तु डा. बड़्थ्याल ने केवल 14 रचनाएं ही उनके द्वारा रचित मानी है जिसका संकलन ‘गोरखबानी’ मे किया गया है।


जनश्रुति अनुसार उन्होंने कई कठ‍िन (आड़े-त‍िरछे) आसनों का आविष्कार भी किया। उनके अजूबे आसनों को देख लोग अ‍चम्भित हो जाते थे। आगे चलकर कई कहावतें प्रचलन में आईं। जब भी कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि ‘यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है।’


गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।


सिद्ध योगी : गोरखनाथ के हठयोग की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं :- चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव आदि। 13वीं सदी में इन्होंने गोरख वाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे।


नाथ सम्प्रदाय गुरु गोरखनाथ से भी पुराना है। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। पूर्व में इस समप्रदाय का विस्तार असम और उसके आसपास के इलाकों में ही ज्यादा रहा, बाद में समूचे प्राचीन भारत में इनके योग मठ स्थापित हुए। आगे चलकर यह सम्प्रदाय भी कई भागों में विभक्त होता चला गया।


यह सम्प्रदाय भारत का परम प्राचीन, उदार, ऊँच-नीच की भावना से परे एंव अवधूत अथवा योगियों का सम्प्रदाय है।


इसका आरम्भ आदिनाथ शंकर से हुआ है और इसका वर्तमान रुप देने वाले योगाचार्य बालयति श्री गोरक्षनाथ भगवान शंकर के अवतार हुए है। इनके प्रादुर्भाव और अवसान का कोई लेख अब तक प्राप्त नही हुआ।


पद्म, स्कन्द शिव ब्रह्मण्ड आदि पुराण, तंत्र महापर्व आदि तांत्रिक ग्रंथ बृहदारण्याक आदि उपनिषदों में तथा और दूसरे प्राचीन ग्रंथ रत्नों में श्री गुरु गोरक्षनाथ की कथायें बडे सुचारु रुप से मिलती है।


श्री गोरक्षनाथ वर्णाश्रम धर्म से परे पंचमाश्रमी अवधूत हुए है जिन्होने योग क्रियाओं द्वारा मानव शरीरस्थ महा शक्तियों का विकास करने के अर्थ संसार को उपदेश दिया और हठ योग की प्रक्रियाओं का प्रचार करके भयानक रोगों से बचने के अर्थ जन समाज को एक बहुत बड़ा साधन प्रदान किया।


श्री गोरक्षनाथ ने योग सम्बन्धी अनेकों ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे जिनमे बहुत से प्रकाशित हो चुके है और कई अप्रकाशित रुप में योगियों के आश्रमों में सुरक्षित हैं।


श्री गोरक्षनाथ की शिक्षा एंव चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेकों बड़े-बड़े राजा इनसे दीक्षित हुए। उन्होंने अपने अतुल वैभव को त्याग कर निजानन्द प्राप्त किया तथा जन-कल्याण में अग्रसर हुए। इन राजर्षियों द्वारा बड़े-बड़े कार्य हुए।


श्री गोरक्षनाथ ने संसारिक मर्यादा की रक्षा के अर्थ श्री मत्स्येन्द्रनाथ को अपना गुरु माना और चिरकाल तक इन दोनों में शका समाधान के रुप में संवाद चलता रहा। श्री मत्स्येन्द्र को भी पुराणों तथा उपनिषदों में शिवावतर माना गया अनेक जगह इनकी कथायें लिखी हैं।


यों तो यह योगी सम्प्रदाय अनादि काल से चला आ रहा किन्तु इसकी वर्तमान परिपाटियों के नियत होने के काल भगवान शंकराचार्य से 200 वर्ष पूर्व है। ऐस शंकर दिग्विजय नामक ग्रन्थ से सिद्ध होता है।


बुद्ध काल में वाम मार्ग का प्रचार बहुत प्रबलता से हुअ जिसके सिद्धान्त बहुत ऊँचे थे, किन्तु साधारण बुद्धि के लोग इन सिद्धान्तों की वास्तविकता न समझ कर भ्रष्टाचारी होने लगे थे।


इस काल में उदार चेता श्री गोरक्षनाथ ने वर्तमान नाथ सम्प्रदाय क निर्माण किया और तत्कालिक 84 सिद्धों में सुधार का प्रचार किया। यह सिद्ध वज्रयान मतानुयायी थे।


इस सम्बन्ध में एक दूसरा लेख भी मिलता है जो कि निम्न प्रकार हैः-

1ओंकार नाथ,

2उदय नाथ,

3सन्तोष नाथ,

4अचल नाथ,

5गजबेली नाथ,

6ज्ञान नाथ,

7चौरंगी नाथ,

8मत्स्येन्द्र नाथ,

9गुरु गोरक्षनाथ।

सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है।


यह योगी सम्प्रदाय बारह पन्थ में विभक्त है, यथाः-

1 सत्यनाथ,

2 धर्मनाथ,

3 दरियानाथ,

4 आई पन्थी,

5 रास के,

6 वैराग्य के,

7 कपिलानी,

8 गंगानाथी,

9 मन्नाथी,

10 रावल के,

11 पाव पन्थ,ी

12 पागल।


इन बारह पन्थ की प्रचलित परिपाटियों में कोई भेद नही हैं। भारत के प्रायः सभी प्रान्तों में योगी सम्प्रदाय के बड़े-बड़े वैभवशाली आश्रम है और उच्च कोटि के विद्वान इन आश्रमों के संचालक हैं।

श्री गोरक्षनाथ का नाम नेपाल प्रान्त में बहुत बड़ा था और अब तक भी नेपाल का राजा इनको प्रधान गुरु के रुप में मानते है और वहाँ पर इनके बड़े-बड़े प्रतिष्ठित आश्रम हैं। यहाँ तक कि नेपाल की राजकीय मुद्रा (सिक्के) पर श्री गोरक्ष का नाम है और वहाँ के निवासी गोरक्ष ही कहलाते हैं।

काबुल-गान्धर सिन्ध, विलोचिस्तान, कच्छ और अन्य देशों तथा प्रान्तों में यहा तक कि मक्का मदीने तक श्री गोरक्षनाथ ने दीक्षा दी थी और ऊँचा मान पाया था।

इस सम्प्रदाय में कई भाँति के गुरु होते हैं यथाः- चोटी गुरु, चीरा गुरु, मंत्र गुरु, टोपा गुरु आदि।


श्री गोरक्षनाथ ने कर्ण छेदन-कान फाडना या चीरा चढ़ाने की प्रथा प्रचलित की थी। कान फाडने को तत्पर होना कष्ट सहन की शक्ति, दृढ़ता और वैराग्य का बल प्रकट करता है।


श्री गुरु गोरक्षनाथ ने यह प्रथा प्रचलित करके अपने अनुयायियों शिष्यों के लिये एक कठोर परीक्षा नियत कर दी। कान फडाने के पश्चात मनुष्य बहुत से सांसारिक झंझटों से स्वभावतः या लज्जा से बचता हैं। चिरकाल तक परीक्षा करके ही कान फाड़े जाते थे और अब भी ऐसा ही होता है। बिना कान फटे साधु को 'ओघड़' कहते है और इसका आधा मान होता है।


भारत में श्री गोरखनाथ के नाम पर कई विख्यात स्थान हैं और इसी नाम पर कई महोत्सव मनाये जाते हैं।

यह सम्प्रदाय अवधूत सम्प्रदाय है। अवधूत शब्द का अर्थ होता है " स्त्री रहित या माया प्रपंच से रहित" जैसा कि " सिद्ध सिद्धान्त पद्धति" में लिखा हैः-


"सर्वान् प्रकृति विकारन वधु नोतीत्यऽवधूतः।"

अर्थात् जो समस्त प्रकृति विकारों को त्याग देता या झाड़ देता है वह अवधूत है। पुनश्चः-

" वचने वचने वेदास्तीर्थानि च पदे पदे।

इष्टे इष्टे च कैवल्यं सोऽवधूतः श्रिये स्तुनः।"

"एक हस्ते धृतस्त्यागो भोगश्चैक करे स्वयम्

अलिप्तस्त्याग भोगाभ्यां सोऽवधूतः श्रियस्तुनः॥"

उपर्युक्त लेखानुसार इस सम्प्रदाय में नव नाथ पूर्ण अवधूत हुए थे और अब भी अनेक अवधूत विद्यमान है।


नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से अपने इष्ट देव का ध्यान करते है। परस्पर आदेश या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है जिसका वर्णन वेद और उपनिषद आदि में किया गया है।


योगी लोग अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते है जिसे 'सिले' कहते है। गले में एक सींग की नादी रखते है। इन दोनों को सींगी सेली कहते है यह लोग शैव हैं अर्थात शिव की उपासना करते है। षट् दर्शनों में योग का स्थान अत्युच्च है और योगी लोग योग मार्ग पर चलते हैं अर्थात योग क्रिया करते है जो कि आत्म दर्शन का प्रधान साधन है। जीव ब्रह्म की एकता का नाम योग है। चित्त वृत्ति के पूर्ण निरोध का योग कहते है।


वर्तमान काल में इस सम्प्रदाय के आश्रम अव्यवस्थित होने लगे हैं। इसी हेतु "अवधूत योगी महासभा" का संगठन हुआ है और यत्र तत्र सुधार और विद्या प्रचार करने में इसके संचालक लगे हुए है।


प्राचीन काल में स्याल कोट नामक राज्य में शंखभाटी नाम के एक राजा थे। उनके पूर्णमल और रिसालु नाम के पुत्र हुए। यह श्री गोरक्षनाथ के शिष्य बनने के पश्चात क्रमशः चोरंगी नाथ और मन्नाथ के नाम से प्रसिद्ध होकर उग्र भ्रमण शील रहें। "योगश्चित वृत्ति निरोधः" सूत्र की अन्तिमावस्था को प्राप्त किया और इसी का प्रचार एंव प्रसार करते हुए जन कल्याण किया और भारतीय या माननीय संस्कृति को अक्षूण्ण बने रहने का बल प्रदान किया। उर्पयुक्त 12 पंथो में जो "मन्नाथी" पंथ है वह इन्ही का श्री मन्नाथ पंथ है। श्री मन्नाथ ने भ्रमण करते हुए वर्तमान जयपुर राज्यान्तर्गत शेखावाटी प्रान्त के बिसाऊ नगर के समीप आकर अपना आश्रम निर्माण किया। यह ग्राम अब 'टाँई' के नाम से प्रसिद्ध है। श्री मन्नाथ ने यहीं पर अपना शरीर त्याग किया था, यही पर इनका समाधि मन्दिर है और मन्नाथी योगियों का गुरु द्वार हैं। 'टाँई' के आश्रम के अधीन प्राचीन काल से 2000 बीघा जमीन है, अच्छा बड़ा मकान है और इसमे कई समाधियाँ बनी हुई है। इससे ज्ञात होता है कि श्री मन्नाथ के पश्चात् यहाँ पर दीर्घकाल तक अच्छे सन्त रहते रहे है। इस स्थान में बाबा श्री ज्योतिनाथ जी के शिष्य श्री केशरनाथ रहते थे। अब श्री ज्ञाननाथ रहते हैं। इन दिनों इस आश्रम का जीर्णोद्वार भी हुआ हैं। श्री मन्नाथ के परम्परा में आगे चल कर श्री चंचलनाथ अच्छे संत हुए और इन्होने कदाचित सं. 1700 वि. के आस पास झुंझुनु(जयपुर) में अपना आश्रम बनाया यही इनका समाधि मन्दिर हैं।



नाथ लक्षणः-

"नाकरोऽनादि रुपंच'थकारः' स्थापयते सदा"

भुवनत्रय में वैकः श्री गोरक्ष नमोल्तुते।

"शक्ति संगम तंत्र॥


अवधूत लोग अद्वैत वादी योगी होते है जो कि बिना किसी भौतिक साधन के यौगग्नि प्रज्वलित करके कर्म विपाक को भस्म कर निजानन्द में रमण करते है और अपनी सहज शिक्षा के द्वारा जन कलयाण करते रहते है। तभी उपयुक्त नाथ शब्द सार्थक होता है।


इनका सिद्धान्तः-

न ब्रह्म विष्णु रुद्रौ, न सुरपति सुरा,

नैव पृथ्वी न चापौ।

नैवाग्निनर्पि वायुः न च गगन तलं,

नो दिशों नैव कालः।

नो वेदा नैव यज्ञा न च रवि शशिनौ,

नो विधि नैव कल्पाः।

स्व ज्योतिः सत्य मेकं जयति तव पदं,

सच्चिदानन्दमूर्ते,

ऊँ शान्ति ! प्रेम!! आनन्द!!!


नवनाथ


नवनाथ नाथ सम्प्रदाय के सबसे आदि में नौ मूल नाथ हुए हैं । वैसे नवनाथों के सम्बन्ध में काफी मतभेद है, किन्तु वर्तमान नाथ सम्प्रदाय के 18-20 पंथों में प्रसिद्ध नवनाथ क्रमशः इस प्रकार हैं -


1॰ आदिनाथ - ॐ-कार शिव, ज्योति-रुप

2॰ उदयनाथ - पार्वती, पृथ्वी रुप

3॰ सत्यनाथ - ब्रह्मा, जल रुप

4॰ संतोषनाथ - विष्णु, तेज रुप

5॰ अचलनाथ (अचम्भेनाथ) - शेषनाग, पृथ्वी भार-धारी

6॰ कंथडीनाथ - गणपति, आकाश रुप

7॰ चौरंगीनाथ - चन्द्रमा, वनस्पति रुप

8॰ मत्स्येन्द्रनाथ - माया रुप, करुणामय

9॰ गोरक्षनाथ - अयोनिशंकर त्रिनेत्र, अलक्ष्य रुप




नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख गुरुआदिगुरू :- भगवान शिव (हिन्दू देवता)मच्छेन्द्रनाथ :- 8वीं या 9वीं सदी के योग सिद्ध, "तंत्र" परंपराओं और अपरंपरागत प्रयोगों के लिए मशहूरगोरक्षनाथ (गोरखनाथ) :- 10वीं या 11वीं शताब्दी में जन्म, मठवादी नाथ संप्रदाय के संस्थापक, व्यवस्थित योग तकनीकों, संगठन , हठ योग के ग्रंथों के रचियता एवं निर्गुण भक्ति के विचारों के लिए प्रसिद्धजालन्धरनाथ :- 12वीं सदी के सिद्ध, मूल रूप से जालंधर (पंजाब) निवासी, राजस्थान और पंजाब क्षेत्र में ख्यातिप्राप्तकानीफनाथ :- 14वीं सदी के सिद्ध, मूल रूप से बंगाल निवासी, नाथ सम्प्रदाय के भीतर एक अलग उप-परंपरा की शुरूआत करने वाले

कानिफनाथ कालबेलिया समाज के संस्थापक हैं

चौरंगीनाथ :- बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र, उत्तर-पश्चिम में पंजाब क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त, उनसे संबंधित एक तीर्थस्थल सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में हैlचर्पटीनाथ :- हिमाचल प्रदेश के चंबा क्षेत्र में हिमालय की गुफाओं में रहने वाले, उन्होंने अवधूत का प्रतिपादन किया और बताया कि व्यक्ति को अपनी आन्तरिक शक्तियों को बढ़ाना चाहिए क्योंकि बाहरी प्रथाओं से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता हैlभर्तृहरिनाथ :- उज्जैन के राजा और विद्वान जिन्होंने योगी बनने के लिए अपना राज्य छोड़ दियाlगोपीचन्दनाथ :- बंगाल की रानी के पुत्र जिन्होंने अपना राजपाट त्याग दिया थाlरत्ननाथ :- 13वीं सदी के सिद्ध, मध्य नेपाल और पंजाब में ख्यातिप्राप्त, उत्तर भारत में नाथ और सूफी दोनों सम्प्रदाय में आदरणीयधर्मनाथ :- 15वीं सदी के सिद्ध, गुजरात में ख्यातिप्राप्त, उन्होंने कच्छ क्षेत्र में एक मठ की स्थापना की थी, किंवदंतियों के अनुसार उन्होंने कच्छ क्षेत्र को जीवित रहने योग्य बनायाlमस्तनाथ :- 18वीं सदी के सिद्ध, उन्होंने हरियाणा में एक मठ की स्थापना की थी


८वी सदी में ८४ सिद्धों के साथ बौद्ध धर्म के वज्रयान की परम्परा का प्रचलन हुआ। ये सभी भी नाथ ही थे। सिद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते थे। उनमें से प्रमुख जो हुए उनकी संख्या चौरासी मानी गई है।


नौ नाथ गुरु


1. मच्छेंद्रनाथ

2. गोरखनाथ

3. जालंदरनाथ

4. नागेशनाथ

5. भर्तरीनाथ

6. चर्पटीनाथ

7. कानीफनाथ

8. गहनीनाथ

9. रेवननाथ

इसके अलावा ये भी हैं:


1. आदिनाथ 2. मीनानाथ 3. गोरखनाथ 4.खपरनाथ 5.सतनाथ 6.बालकनाथ 7.गोलक नाथ 8.बिरुपक्षनाथ 9.भर्तृहरि नाथ 10.अईनाथ 11.खेरची नाथ 12.रामचंद्रनाथ।

ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ। सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है। बाबा शिलनाथ, दादाधूनी वाले, , गोगा नाथ, पंढरीनाथ और श्री स्वामी समर्थ, गजानन महाराज, साईं बाबा को भी नाथ परंपरा का माना जाता है। उल्लेखनीय है कि भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, क्योंकि उनकी भी नाथों में गणना की जाती है। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं। और विशेष इन्हे योगी भी कहते और जोगी भी कहा जाता हैं। देवो के देव महादेव जी स्वयं शिव जी ने नवनाथो को खुद का नाम जोगी दिया हैं। इन्हें तो नाथो के नाथ नवनाथ भी कहा जाता हैं।


कबीर किरण: नौ नाथ व चौरासी सिद्ध कैसे उत्पन्न हुए। . आपने अमरनाथ की कथा तो सुनी ही होगी जहां शिव शंकर ने पार्वती जी को मंत्र दिया था। उस समय शिवजी द्वारा बताया वह मंत्र एक तोते ने भी सुन लिया था। जब शिवजी को पता लगा तो उस तोते को मारने के लिए उसके पीछे दौडे। तब वह तोते वाली आत्मा अपना तोते वाला शरीर छोडकर व्यास जी की पत्नी के पेट में चला गया। समय आने पर शरीर धारण किया। जब वह 12 वर्ष तक भी गर्भ से बाहर नहीं आया तब ब्रह्मा, विष्णु महेश ने उससे कहा कि अगर ये ही रीत चली पडी तो माताए बहुत दुखी हो जाएगी, सुखदेव जी बाहर आ जाइए। तब सुखदेव जी ने कहा कि आपने अपनी त्रिगुणमयी माया का जाल फैलाया हुआ है।

अभी तो मुझे अपने सभी पुराने जन्म कर्म याद है, बाहर आते ही मैं सब भूल जाऊंगा। मैं एक शर्त पर बाहर आऊंगा, अगर आप कुछ समय के लिए त्रिगुण प्रभाव को रोक दें तो ही मैं आऊंगा। तब तीनो देवो ने कहा कि हम केवल इतनी देर ही इस प्रभाव को रोक सकते हैं जितनी देर तक राई(सरसों का बीज) भैंस के सींग पर ठहर सकता है अर्थात एक सेकेंड से भी बहुत कम समय तक। सुखदेव जी ने कहा आप इतने ही समय तक रोक दीजै। तीनों देवों ने जब माया का प्रभाव रोका उस समय 94 बच्चे पैदा हुए। उन सबको अपने पुराने जन्म याद थे और उन्हें ये बात याद रह गयी कि भक्ति करने के लिए ही मनुष्य जीवन मिलता है। उन 94 बच्चों में से 84 तो सिद्ध हो गए व 9 नाथ हुए, और एक सुखदेव ऋषि हुए।

Sunday, October 4, 2020

उचित नहीं है मां का बेटी की गृहस्थी में हस्तक्षेप




 नमस्कार दोस्तों आज मैं काफी दिनों बाद आपके सामने एक पोस्ट सेयर करने जा रहा हूं जिसका किसी परिवार से व्यक्तिगत संबंध नहीं होने के बाद भी इस कहानी का कई परिवारों से संबंध है।

जो सोनी मल्होत्रा जी द्वारा लिखी एक पोस्ट है।  


Tuesday, 29 Aug, 11.20 am

माँ-बेटी का रिश्ता बहुत ही प्यारा रिश्ता है और हर माँ की चाह होती है कि उसकी बेटी ससुराल में खुश रहे, इसीलिए मां बेटी को प्रारंभ से ही अच्छे संस्कार देती है पर समय के साथ-साथ माताओं की इस सीख में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। आज अधिकतर घरों के टूटने की वजह लड़की के अभिभावकों का उसकी गृहस्थी में हस्तक्षेप और उनके द्वारा दी जाने वाली गलत शिक्षा है। ऐसे कई उदाहरण आप अपने आस-पास पाएंगे। सीमा हमारे पड़ोस में रहती है। उसकी शादी को दो वर्ष हो गए हैं। सीमा के पति रोहित बैंक में अच्छे पद पर कार्यरत हैं। उसके ससुर को भी पेंशन मिलती है। रोहित की एक अविवाहित बहन है और एक बड़े भइया, जो पटना में अपने परिवार के साथ रहते हैं।

बेटी के लिए चिंता करना तो हर मां का फर्ज है। बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, उसके सुख-दुख में उसका साथ देना हर माता-पिता का कर्तव्य होता है, अगर ससुराल वाले उनकी बेटी के साथ गलत व्यवहार करें। अगर उनकी बेटी गृहस्थी में खुश है, उसे अपने पति-ससुराल वालों से कोई शिकायत नहीं तो मां का फर्ज यही है कि वह बेटी और उसके ससुराल वालों के रिश्ते को मजबूत बनाएं। उसे अच्छी सीख दें।

उस रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएं। अपनी बेटी और ससुराल वालों के मध्य रिश्ते को सुधारने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखें:- - विवाह के पश्चात् बेटी की आवश्यकता से अधिक देखभाल न करें। उसकी सहायता करें पर उन्हीं परिस्थितियों में, जब उसे अपने परिवार से सहायता न मिल रही हो। डिलीवरी के दौरान अधिकतर मांएं सोचती हैं कि उनकी बेटी की देखभाल ससुराल में सही तरह से नहीं हो पाएगी, इसलिए वे बेटी को मायके में डिलीवरी करवाने के लिए उकसाती हैं और बेटी अपने ससुराल वालों को छोड़ मायके पहुंच जाती है।


उसे लगता है कि जो देखभाल उसकी मां करेगी, वह सास कहां कर पाएगी। ऐसा कतई न करें। जैसा ससुराल वाले चाहें, बेटी को वैसे ही करने को कहें। इससे आपकी बेटी और ससुराल वालों के मध्य प्यार व देखभाल की भावना बढ़ेगी, रिश्ते मजबूत होंगे।


- विवाह के बाद आपकी बेटी को ससुराल में अपनी जगह बनाने में कुछ समय लगता है। उसे वो समय दीजिए। उसे बार-बार मायके आने पर जोर न दें। विवाह के पश्चात् उसका असली घर ससुराल है और बार-बार मायके आने से वह अपने घर, परिवार को नजरअदांज करती है।


इससे उसके ससुराल वालों को परेशानी हो सकती है। - तोहफे हर किसी को अच्छे लगते हैं पर बहुत अधिक तोहफे देकर आप अपनी बेटी की आदतों को बिगाड़ रही हैं। अगर ससुराल वाले आपकी बेटी के शौकों को पूरा नहीं कर सकते तो आप आर्थिक सहायता देने का कष्ट बिलकुल न करें। इससे आप उसकी ससुराल वालों को नीचा दिखा रही हैं।

बेटी के गृहस्थ जीवन में आप हस्तक्षेप न करें। अगर आप उसकी ससुराल वालों और अपने दामाद को कुछ कहना भी चाहते हैं तो आपका ढंग ऐसा हो कि उन्हें बुरा न लगे। इससे आपके और उनके संबंधों में खटास पड़ सकती है। - बेटी से मिलने उसके घर जाएं तो बेटी के कमरे में ही, उससे ही बात करने की बजाय उसके ससुराल वालों से ऐसा व्यवहार करें कि उन्हें ऐसा लगे कि आप सिर्फ अपनी बेटी से नहीं, उनसे भी मिलने आई हैं।

- बेटी को उसकी ननद , जेठ, जेठानी और देवर के खिलाफ भी न भड़काएं। उसे हमेशा सीख दें कि उसका व्यवहार अपनी ननद से बहन की तरह ही होना चाहिए, और देवर - देवरानी, जेठानी से भी भाई बहन जैसा ही ब्यावहार करें।  अगर आपका दामाद अपने परिवार वालों पर कोई खर्चा करता है तो अपनी बेटी को दामाद के इस खर्चे में कटौती करने के लिए न उकसाएं। जब आपकी बेटी अपने भाई-बहनों पर खर्च कर सकती है तो आपका दामाद अपने परिवार पर क्यों खर्च नहीं कर सकता।

 ध्यान रहे आप अपनी सीखो से अपनी बेटी की गृहस्थी को सुखमय भी बना सकती हो ओर उजार भी सकती है। इसलिए आप अपनी बेटी की शोच को बड़ा और सकारात्मक बनाने की कोशिश करें। ताकि उसके ससुराल वाले उस पर नांज करे। सोनी मल्होत्रा।।


दोस्तो यह कहानी हमने काफी सोच विचार कर सेंड कर रहा हूं

इस कहानी से हमें यही सीख मिलती हैं कि हमें अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा और  शिष्टाचार देना चाहिए ताकि बेटी ससुराल में अपने नाम के साथ साथ अपने ससुराल और मायके का नाम भी रोशन करें। तथा अपने सास - ससुर का नाम रोशन करे।

Monday, June 22, 2020

9 महीने के बच्चे की गतिविधियां

9 महीने के बच्चे की गतिविधियां, विकास और देखभाल 9 Mahine Ke Shishu Ka Vikas

अगर आपका शिशु अपने उम्र के 9वें महीने में कदम रख चुका है, तो वह पहले से ज्यादा चुस्त और थोड़ा नटखट भी हो गया होगा। आपको उसकी भोली मुस्कान लुभाती होगी और आप उसके विकास के संबंध में और भी बहुत कुछ जानना चाहते होंगे।


9 महीने के बच्चे का वजन और हाइट कितनी होनी चाहिए?

9 महीने के शिशु का विकास पिछले महीनों की तुलना में काफी एक्टिव हो जाता है। उसके वजन और हाइट में भी काफी बदलाव होते हैं। नौ महीने की बेबी गर्ल का सामान्य वजन लगभग 7.2 से लेकर 9.3 किलो तक और लंबाई करीब 70 सेंटीमीटर तक हो सकती है। वहीं, बेबी बॉय का सामान्य वजन लगभग 7.9 किलो से लेकर 10.2 किलो तक hहो सकता है और लंबाई लगभग 72 सेंटीमीटर तक हो सकती है।


9 महीने के बच्चे के विकास के माइल्सटोन क्या हैं?

अब आपका शिशु नौ महीने का हो चुका है और वह पहले से ज्यादा फुर्तीला हो गया होगा। 9 महीने की उम्र में बच्चे की गतिविधियों में बदलाव आने लगता है और वो नई-नई चीजें सीखने लगता है। ऐसे में उसके मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तनों पर ध्यान देना जरूरी है। यहां जानिए कि 9 महीने के शिशु में क्या-क्या परिवर्तन आते हैं :

मानसिक विकास

इशारों की नकल करना – आपने यह तो सुना ही होगा कि बड़े जो करते हैं, बच्चे उसे देखकर दोहराने की कोशिश करते हैं। यह बात काफी हद तक सच है, क्योंकि 9 महीने के बच्चे अपने आसपास हर वक्त रहने वाले लोगों की नकल करने का प्रयास करते हैं। सिर्फ आदतें ही नहीं, बल्कि आवाजों की भी नकल करने लगते हैं। इसलिए, जो उनके साथ रहते हैं, उन्हें कोई भी काम सावधानी से करना चाहिए और सोच-समझकर बोलना चाहिए।


आवाजें निकालना – 9 महीने में शिशु कई तरह की आवाजें निकालने लगते हैं, यहां तक कि ‘मम्मा-बाबा’ तक बोलना सीखने लगते हैं।

चीजों को दिखाना – इस उम्र में शिशु को चीजों और लोगों की काफी समझ हो जाती है। उन्हें जो चीज चाहिए होती है या जिस इंसान के पास जाना होता है, वो उनकी तरफ उंगली से इशारा करके दिखाने लगते हैं।


लुका छिपी खेलना – अगर कोई उनके साथ लुका छिपी खेलें, तो उन्हें अच्छा लगता है और वो उस खेल का मजा लेने लगते हैं।

‘न’ की समझ – 9 महीने के शिशु ‘न’ शब्द को समझने लगते हैं। अगर वो कोई चीज मांगे और उन्हें न मिले, तो वो रोने लगते हैं।

चीजों को मुंह में डालना – इस उम्र में शिशु थोड़ी बहुत चीजें खाना सीखने लगते हैं। उनके सामने कुछ भी रहता है, तो वो उसे अपने मुंह में डाल लेते हैं। इसलिए, इस दौरान माता-पिता को शिशु पर काफी ध्यान रखना जरूरी होता है।

किताबें देखना – 9 महीने के बच्चे रंग-बिरंगी किताबों के तरफ भी बहुत आकर्षित होते हैं। अगर बड़े उनके साथ बैठकर उन्हें कार्टून की किताबें दिखाएं, तो वो काफी देर तक उसकी तरफ आकर्षित रहते हैं।

चीजों को फेंकना – शिशु चीजों को जमीन पर फेंकना या दीवार पर मारना सीखने लगते हैं। अगर एक बार उन्हें उठाकर वो चीज वापस दो, तो उन्हें मजा आता है और वो बार-बार उसे दोहराते हैं।

शारीरिक विकास

क्रॉल या घुटनों के बल चलना – माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं होता, जब उनका शिशु घुटनों के बल चलकर उनके तरफ आता है। 9 महीने का बच्चा घुटनों के बल चलना सीखने और खेलने लगता है।

बिना सहारे के बैठना – शिशु जन्म के कुछ महीने तक खुद से बैठ नहीं पाता, क्योंकि उनकी रीढ़ की हड्डी कमजोर होती है और सही तरीके से विकसित नहीं होती है। फिर जैसे-जैसे वो बड़े होने लगते हैं, उनकी रीढ़ की हड्डी मजबूत होने लगती है और जब शिशु 9 महीने के होते हैं, तो वो बिना सहारे के बैठने लगते हैं।

चीजों को पकड़ना – शिशु अपने तर्जनी और अंगूठे से छोटी-छोटी चीजों को पकड़ना सीखने लगते हैं और एक हाथ से दूसरे हाथ में पास करना भी सीख जाते हैं।

कंधों और हाथों का उपयोग – शिशु कंधों और हाथों का सहारा लेने लगते हैं। अगर उन्हें नीचे या बेड पर पेट के बल लेटाया जाता है, तो वो अपने हाथों से खुद को रोक सकते हैं। इसको पैराशूट रिफ्लेक्स कहते हैं।

सहारे से खड़ा होना – शिशु सहारे के साथ-साथ धीरे-धीरे खड़े होने लगते हैं। कई बार तो वो इशारे करके या रो-रोकर लोगों को अपने पास बुलाते हैं। फिर उनके सहारे खड़े होकर खुश हो जाते हैं।


सामाजिक और भावनात्मक विकास

जानने वालों के ज्यादा करीब – जो लोग शिशु के साथ ज्यादा वक्त बिताते हैं, उनके साथ शिशु ज्यादा घुल-मिल जाते हैं और प्यार जताते हैं। साथ ही उनके करीब रहना पसंद करते हैं।

अजनबियों से डर – शिशु को लोगों को पहचानने की समझ होने लगती है। वो अपने और अजनबियों के बीच फर्क समझने लगते हैं। इसलिए, जब वो कोई नया चेहरा देखते हैं या किसी अजनबी के गोद में जाते हैं, तो रोने और चिड़चिड़ाने लगते हैं।

पसंदीदा खिलौना – 9 महीने में शिशु कई तरह के खिलौनों से खेलना सीख जाते हैं। साथ ही कई बार उनको कुछ विशेष तरह के खिलौनों के साथ खेलना ज्यादा पसंद होता है। ऐसे में उनके पसंदीदा खिलौने भी हो जाते हैं, जिनके साथ उन्हें खेलना अच्छा लगता है।

आगे जानिए 9 महीने बच्चे को कौन-कौन से टीके लगवाने जरूरी है।

9 महीने के बच्चे को कौन-कौन से टीके लगाए जाते हैं?

9 महीने के शिशु का विकास सही तरीके से हो, उसके लिए उन्हें लगने वाले टीकों का ध्यान रखना जरूरी है। टीकाकरण के कारण ही शिशु की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है और बीमारियों से उनका बचाव हो सकता है। इसलिए, लेख के इस भाग में हम 9 महीने बच्चे को लगाए जाने वाले टीकों के बारे में जानकारी दे रहे हैं।

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नोट : टाइफाइड कॉन्जुगेट वैक्सीन, ये टीका शिशु को 9 से 12 महीने के बीच लगाया जाता है। हालांकि, इसके बारे में आपको डॉक्टर या शिशु विशेषज्ञ से और अच्छी जानकारी मिल सकती है।
अब बारी आती है यह जानने की कि 9 महीने के बच्चे के लिए कितना दूध आवश्यक है।

9 महीने के बच्चे के लिए कितना दूध आवश्यक है?

मां का दूध – शिशु को 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध ही पिलाना ही चाहिए। उसके बाद शिशु को ठोस आहार देना शुरू किया जा सकता है। वहीं, कुछ शिशु 6 महीने के बाद भी मां के दूध का सेवन करते हैं। अगर आपका 9 महीने का शिशु भी उन्हीं में से एक है, तो उसे दिन भर में तीन से पांच बार स्तनपान करा सकते हैं। अगर मिलीलीटर की बात करें, तो शिशु लगभग 887 से 946 मिलीलीटर (30 to 32 ounces) तक दूध पी सकता है। यह मात्रा काफी हद तक शिशु के स्वास्थ्य और भूख पर भी निर्भर करती है।
फॉर्मूला फीड – अगर आपका शिशु फॉर्मूला दूध पीता है, तो आप उसे उसकी इच्छानुसार चार से पांच बार फॉर्मूला फीड दे सकते हैं। आप दिनभर में 700 से 950 मिलीलीटर तक फॉर्मूला दूध दे सकते हैं।

नोट : शिशु की दूध पीने की मात्रा उसके भूख और स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। हर शिशु की भूख और जरूरत अलग-अलग होती है, तो उसी के अनुसार वो दूध पीते हैं।
दूध के बाद बारी आती है आपके 9 महीने बच्चे के विकास के लिए सही मात्रा में आहार के बारे में जानने की।

9 महीने के बच्चे के लिए कितना खाना आवश्यक है?

9 महीने के बच्चे का विकास सही तरीके से हो, उसके लिए उसका सही आहार लेना बहुत जरूरी है। शिशु को धीरे-धीरे पौष्टिक तत्व युक्त आहार मिलना बहुत आवश्यक है। नौवें महीने का बेबी ठोस आहार लेना शुरू कर देता है। इसलिए, यहां हम आपको बता रहे हैं कि 9 महीने के बच्चे के लिए कितना खाना आवश्यक है।

खाद्य पदार्थ मात्रा बेबी सीरीयल (शुरुआत करें होल वीट और मिश्रित अनाज से)पूरे दिन में 4 से 8 चम्मच या उससे ज्यादा भी दे सकते हैं।

हरी सब्जियां हर दिन एक चौथाई कप से आधा कप दो से तीन बार

फल हर दिन एक चौथाई कप से आधा कप दो से तीन बार

डेयरी उत्पाद – दही या पनीरएक चौथाई कप दही या पनीर के छोटे टुकड़े दिनभर में एक से दो बार

प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ – अंडे की जर्दी, चिकन, बीन्सएक चौथाई कप एक से दो बार

पानी आधा से एक कप (लगभग 125 से 250 मिलीलीटर – 4 to 8 oz) मतलब पूरे दिन में आधा से कप

फलों का जूस शिशु के एक साल का होने के बाद ही दें।

नोट : शिशु को एक साल होने के बाद ही होल मिल्क और अंडे का सफेद भाग दें। इसके अलावा, हर शिशु का स्वास्थ्य और जरूरत अलग-अलग होती है, इसलिए यह डाइट चार्ट एक उदाहरण के तौर पर हमने आपके साथ शेयर किया है।अपने शिशु के डाइट चार्ट के लिए आप शिशु विशेषज्ञ से राय ले सकते हैं।

9 महीने के बच्चे के लिए कितनी नींद आवश्यक है?

9 महीने के बच्चे का विकास सही तरीके से हो, उसके लिए पर्याप्त नींद लेना भी जरूरी है। 9 महीने के बच्चे की नींद में पहले की तुलना में बदलाव हो सकते हैं। 9 महीने के बच्चे के लिए 24 घंटे में से 12-16 घंटे की नींद जरूरी होती है। इसमें कुछ देर की झपकियां भी शामिल हैं।

9 महीने के बच्चे के लिए खेल और गतिविधियां

अब बात करते हैं आपके 9 महीने के नन्हे और फुर्तीले शिशु के लिए कुछ खेल और गतिविधियां के बारे में, जो उन्हें मानसिक और शारीरिक तरीके से और एक्टिव बनाने में आपकी मदद कर सकती हैं।

गेंद से खेलना – शिशुओं को बॉल से खेलना अच्छा लगता है। अगर उनके सामने कोई छोटी या बड़ी गेंद रखी जाए, तो वो उसे दूर फेंकने की कोशिश करते हैं। कोई उसे फिर से गेंद लाकर दे, तो शिशु बार-बार मजे के लिए यह प्रक्रिया दोहराते हैं। इस उम्र के शिशु को आवाज करने वाले और लाइट वाले खिलौने पसंद होते हैं।

किताबें या तस्वीरें देखना – शिशु को रंग-बिरंगी किताबें दिखाएं और उन्हें कहानियां सुनाएं। ऐसा करने से वो न सिर्फ किताब के पन्नों को पलट-पलटकर आपकी कहानी सुनाने की नकल करेंगे, बल्कि रंगों को भी देखकर खुश होंगे।

बाल्टी के साथ खेलना – शिशु के सामने कोई बाल्टी रख दें और उसमें उनके सामने खिलौने गिराएं। इससे वो भी आपकी नकल करेंगे और खिलौने गिराएंगे। वो जैसे ही ऐसा करें आप उनके सामने ‘धप’ या कोई और शब्द बोलें। ऐसा करने से वो धीरे-धीरे कुछ शब्द सीखने लगेंगे। अगली बार जब आपका बच्चा बाल्टी में कुछ गिराए, तो आप चुप रहकर उसकी प्रतिक्रिया का इंतजार करें।

गाना या ताली बजाना – शिशु के सामने ताली बजाकर या गाना चलाकर खेलें। कई शिशु तो गाने सुनकर नाचने तक की कोशिश करते हैं और उत्सुक होकर ताली भी बजाने लगते हैं।

लेख के आगे के भाग में जानिए कि 9 महीने के बच्चे के माता-पिता को उनके नन्हे के लिए कौन सी स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं होती हैं।


9 महीने के बच्चों के माता-पिता की आम स्वास्थ्य चिंताएं

काली खांसी – काली खांसी संक्रामक होती है और यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। अगर आपके बच्चे की नाक बह रही हो, उसे हल्का बुखार हो और वो लगातार खांस रहा हो, तो बिना देर करते हुए उसे डॉक्टर के पास ले जाएं। इससे शिशु को सांस लेने में तकलीफ हो सकती है।

निमोनिया – अगर आपके शिशु को लगातार बुखार हो, ठंड लगे, उल्टी और सांस लेने में तकलीफ हो, तो यह निमोनिया का लक्षण हो सकता है। ऐसी स्थिति में बिना देर करते हुए डॉक्टर से संपर्क कर शिशु की सेहत पर ध्यान दें।

कान में संक्रमण – कभी-कभी ऐसा होता है कि नहलाते वक्त शिशु के कान में हल्का पानी जा सकता है। हालांकि, माता-पिता तौलिए से कान साफ कर देते हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसा करने से भी पानी ठीक से नहीं निकलता है। इस कारण शिशु को कान दर्द की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है और कान में संक्रमण के लक्षण हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में शिशु को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं और सावधानी बरतें।

9 महीने बच्चे के बारे में जानिए कुछ और बातें।


बच्चे की सुनने की क्षमता, दृष्टि और अन्य इंद्रियां

क्या मेरा बच्चा देख सकता है?

आपके शिशु की दृष्टि महीने दर महीने तेज होने लगती है और नौवें महीने में आपकी शिशु की दृष्टि काफी विकसित हो जाती है। अब आपका शिशु दूर और पास दोनों चीजें तो देख ही सकता है, साथ ही चलती हुई चीजों पर भी ध्यान केंद्रित कर सकता है। उसे रंग-बिरंगी किताबें और खिलौने देखना और परिचित चेहरों को देखना पसंद आने लगता है।


क्या मेरा बच्चा स्वाद और गंध को पहचान सकता है?

इस उम्र से ही शिशु अपने पसंद के खाने का धीरे-धीरे चुनाव करने लगते हैं। अगर आपका शिशु कुछ खाने से इंकार करे, तो आप उसे थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार वो चीज देने की कोशिश करें। ऐसा करने से वो कभी न कभी उस चीज को जरूर चखेंगे। इसके अलावा, शिशु को अच्छी खुशबू वाली चीजों को हल्का-हल्का सुंघाएं, ताकि उनमें गंध की समझ और ज्यादा होने लगे।

नौवें महीने में शिशु की सफाई को लेकर ध्यान देने के संबंध में कुछ टिप्स।

बेबी स्वच्छता से जुड़ी कुछ बातें

शिशु को नहलाएं – शिशु को रोजाना नहलाएं। आप मौसम के अनुसार शिशु को नहलाने का फैसला कर सकते हैं। अगर रोजाना नहीं नहला सकते हैं, तो गीले तैलिये से हल्का-हल्का करके उनके शरीर को पोछें। फिर मॉइस्चराइजर या बेबी क्रीम लगाएं।

हाथ धोना – बाहर से आने के बाद शिशु को छूने से पहले हाथ धोएं। शिशु बहुत ही नाजुक होते हैं और उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, इसलिए उन्हें किसी भी चीज का संक्रमण जल्दी हो सकता है। इसलिए, बाहर से आने के बाद जो कोई भी शिशु को गोद में ले या छूने की कोशिश करे, तो पहले उसे हाथ धोने को कहें।

घर की साफ-सफाई – 9 महीने में शिशु क्रॉल करके जमीन पर खेलना शुरू कर देते हैं, ऐसे में ध्यान रहे कि आपका घर साफ-सुथरा रहे। इस उम्र में शिशु को कुछ भी उठाकर मुंह में डालने की आदत होती है। ऐसे में वो नीचे पड़ी चीजों को उठाकर मुंह में ले सकते हैं और इससे उनका स्वास्थ्य खराब हो सकता है। इसलिए, हर वक्त घर की सफाई पर ध्यान दें।
खिलौनों को साफ करना – शिशु खिलौनों से खेलते-खेलते कई बार उसे मुंह में लेने लगते हैं। अगर खिलौना गंदा हो, तो वो गंदगी शिशु के पेट में जा सकता है और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

शिशु के कपड़े – शिशु के कपड़ों को एंटीसेप्टिक लिक्विड से और गुनगुने पानी से धोएं, ताकि उनमें कीटाणु की समस्या न हो।

खाने का बर्तन – 9 महीने का बच्चा थोड़ा बहुत ठोस आहार लेने लगता है। ऐसे में शिशु को जिस कटोरे और चम्मच से आप आहार दे रहे हैं, उसे अच्छी तरह से धोएं।


माता-पिता अपने शिशु के विकास में सहयोग कर सकते हैं।


माता-पिता बच्चे के विकास में कैसे मदद कर सकते हैं?

शिशु का सही विकास हो, उसमें माता-पिता का महत्वपूर्ण योगदान होता है। नीचे उसी के बारे में हम कुछ बातें बता रहे हैं :

माता-पिता शिशु को रंग-बिरंगी किताबें दिखाएं और कहानियां व लोरी सुनाएं।

पौष्टिक आहार खिलाएं।

उनके साथ खेलें और ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताएं।

नई-नई चीजें और खिलौने दिखाएं।

उन्हें जमीन पर खेलने और क्रॉल करने दें।

इस उम्र में शिशु जमीन पर खेलने और क्रॉल करने लगते हैं। ऐसे में आपका घर बेबी प्रूफ होना भी जरूरी है, ताकि आपके शिशु को चोट न लगे या कोई अन्य समस्या न हो। टेबल व कुर्सी के नुकीले कोनों का ध्यान रखें। इससे आपके शिशु को चोट लगने का डर होता है। छोटी-छोटी चीजें जमीन पर न हो, जिसे शिशु मुंह में ले सके, कहीं पर भी तार न निकला हो।

अब हम आपको 9 महीने बच्चे के कुछ लक्षण बताएंगे, जिसके बारे में माता-पिता को ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि अगर इन लक्षणों पर ध्यान न दिया गया, तो यह चिंता का कारण हो सकता है।


9 महीने के बच्चे के विकास के बारे में माता-पिता को कब चिंतित होना चाहिए?

अगर आपका शिशु खड़े होने में असमर्थ हो।

अगर शिशु चीजों को उंगलियों से पकड़ नहीं पा रहा हो।

दूर की चीजों को देखने और समझने में परेशानी हो रही हो।

अगर शिशु अपनी आंखों को ज्यादा रगड़ या नोंच रहा हो।

आवाजों को सुनकर कोई प्रतिक्रिया न दे रहा हो।

अगर बैठने में परेशानी हो रही हो।

अगर शिशु चिड़चिड़ा हो और दिनभर रोता रहे।

इस महीने के लिए चेकलिस्ट

अन्य महीनों की तरह 9 महीने शिशु के लिए भी माता-पिता को चेकलिस्ट रखनी चाहिए, ताकि उन्हें शिशु के बेहतर विकास का पता चलते रहे।

नियमित रूप से डॉक्टर से शिशु का चेकअप कराएं।

9 महीने में दिए जाने वाले वैक्सीन के बारे में जानकारी रखकर शिशु को सही वक्त पर वैक्सीन दिलवाएं।

शिशु की सफाई का पूरा ध्यान रखें।

9 महीने के शिशु की तस्वीर खींचना न भूलें, जिससे आपको शिशु के शारीरिक विकास का पता चलेगा।

आगे हम माता-पिता द्वारा पूछे जानें वाले कुछ आम सवालों के जवाब देंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या 9 महीने की उम्र में बच्चे चलना शुरू कर सकते हैं?

9 महीने की उम्र में बच्चे क्रॉल करना सीख जाते हैं। अगर चलने की बात करें, तो कुछ बच्चे चल सकते हैं और कुछ नहीं भी चल सकते हैं। यह पूरी तरह से शिशु के स्वास्थ्य और उनके विकास पर निर्भर करता है।

मेरे 9 महीने के बच्चे ने बैठना नहीं सीखा है। क्या मुझे इस बारे में चिंता करनी चाहिए?

आमतौर पर शिशु छठे महीने से बिना सहारे के थोड़ा-बहुत बैठने लगते हैं (12), लेकिन अगर आपका बच्चा 9 महीने का हो चुका है और अभी तक बैठना नहीं शुरू किया है, तो यह चिंता का विषय हो सकता है। बेहतर होगा कि आप एक बार डॉक्टर से इस बारे में बात करें और अपने शिशु का चेकअप करा लें।

शिशु का स्वस्थ विकास किसी भी माता-पिता के लिए तोहफे से कम नहीं होता है। अगर शिशु खुश और सेहतमंद रहे, तो उसके और उसके माता-पिता दोनों के लिए खुशी की बात होती है। आशा करते हैं कि इस लेख से आपको अपने शिशु को खुश रखने के टिप्स मिलेंगे और इसमें दी गई जानकारी आपको अपने बच्चे को स्वस्थ रखने के काम आएगी। अगर आपके पास भी 9 महीने के बच्चे से जुड़ी कोई जानकारी है या सवाल है, तो उसे हमारे साथ नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर शेयर करें।


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