Monday, April 24, 2023

गोस्वामी समाज

 गोस्वामी समाज केवल एक जाति नही बल्कि एक सम्प्रदाय है एक ऐसा पंथ जो सदैव से ही भगवान महादेव की आराधना को अपना प्रथम कर्तव्य मानते हुए सनातन धर्म का प्रचार प्रसार  करता है।

अनादिकाल से शैव ब्रह्मणों का ये सम्प्रदाय पठन पाठन, योग व अनेकों प्रकार के शोध के कार्य मे व्यस्त रहता था।  कुछ जानकारों के अनुसार इस पंथ का उदय आदिगुरू शंकराचार्य जी के समय हुआ था। जबकि अगर गहनता से अध्यन करें तो पता चलता है ये पंथ अनादिकाल से भगवान महादेव की सेवा मे गणों के रूप मे विधमान है।

समय समय पर स्वंय भगवान महादेव ने इस पंथ की पद भ्रष्ट होने व अपने कर्तव्य से विमुखता को रोकने के लिए गुरु दत्तात्रेय, आदि गुरु शंकराचार्य के रूप मे अवतार लिया। व शैव ब्रह्मणों को धर्म रक्षा के लिए प्रेरित किया। धर्मरक्षक सन्यासियों का ये सम्प्रदाय दो भाग मे विभाजित हो गया. गृहस्ती और सन्यासी जो साधु गृहस्त जीवन मे आ गए वह गृहस्थ जीवन मे भी अपनी परम्परा अपने उपनामों से जुड़े रहे।

ऐसा नही है की सभी गोस्वामी शैव है वैष्णव सम्प्रदाय मे भी गोस्वामी होते है 

आज हम केवल शैव ब्रह्मणों व दशनामी गोस्वामी पर चर्चा कर रहे है जिनको प्रमुख दश नामों से जाना जाता है जिनमें गिरी,पुरी,भारती,सरस्वती,सागर, अरण्य,तीर्थ,वन,आश्रम, व पर्वत हैं।


आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म की हानि रोकने के लिए इस सम्प्रदाय को 10 भागों में विभाजित कर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मरक्षार्थ हेतु भेज दिया। जिन संन्यासियों ने पहाड़ियों एवं पर्वतीय क्षेत्रों में प्रस्थान किया, वे गिरी एवं पर्वत और जिन्हें जंगली इलाकों में भेजा, उन्हें वन एवं अरण्य नाम दिया गया। जो संन्यासी सरस्वती नदी के किनारे धर्म प्रचार कर रहे थे, वे सरस्वती और जो जगन्नाथपुरी के क्षेत्र में प्रचार कर रहे थे, वे पुरी कहलाए। जो समुद्री तटों पर गए, वे सागर और जो तीर्थस्थल पर प्रचार कर रहे थे, वे तीर्थ कहलाए। जिन्हें मठ व आश्रम सौंपे गए, वे आश्रम और जो धार्मिक नगरी भारती में प्रचार कर रहे थे, वे भारती कहलाए। 

 इन सन्यासियों ने तपस्या के बल से अपनी पांचों इन्द्रियों को वश में कर लिया था इसलिए इन्हें गोस्वामी कहा गया।  गो का एक अर्थ इन्द्रियां होता है और स्वामी का अर्थ उनको वश में करने वाला होता है। गोस्वामी अर्थातः पांचों इन्द्रियों को वश में रखने वाला।

इन साधुओं को भिन्न उपाधियां दी जाती हैं। इसमें महामंडलेश्वर, श्रीमहंत, महंत, एवं आचार्य आदि होते है।  नागा  साधु भी इस ही परम्परा मे आते है नागाओं को शंकराचार्य की सेना भी कहा जाता है नागा साधु को शस्त्र चलाने मे पारंगत हासिल है वे दिगम्बर होते है। नागाओं को समझने के लिए पहले गोस्वामी संप्रदाय को समझना बहुत जरूरी है।


दशनामी गोस्वामी पंथ विज्ञान के आधार पर धर्म का प्रचार प्रसार करते है। शैव व वैष्णव सम्प्रदाय के महान संतों ने आयुर्वेद, योग, ज्योतिष आदि विषय पर शोध कर जनमानस को लाभांवित कराया। दशनामी पंथ मठों व आश्रमों की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के कार्य मे निपुण है। वर्तमान मे इनका प्रमुख कार्य शिव मंदिरों मे पूजा करना, धर्म उपदेश देना व धर्म का प्रचार प्रसार करना होता है

दशनामी सम्प्रदाय मे कुल 52 गोत्रों होते है। जिन्हे मढ़ी भी कहा जाता है गिरियों की कुल 27 मढ़ी, पुरियों की कुल 16, भारतीयों की कुल 4 मढ़ी, वनों की कुल 4 मढ़ी, व लामा गुरु की 1 मढ़ी है। 


गिरि :1.ऋद्धिनाथी, 2.संजानाथी, 

3.दुर्गानाथी, 4.ब्रह्मांडनाथी, 5.बैकुंठनाथी, 6.ब्रह्मनाथी, 7. रामदत्ती, 8. श्रृयभृंगनाथी, 9.ज्ञाननाथी,10.माननाथी,11. बलभद्रनाथी,

12. अपारनाथी, 13. पाटम्बरनाथी, 14.सागरबोदला, 15. ओंकारी, 16.सिंह श्याम यति, 17.चंदननाथी, 18.नागेंद्रनाथी, 19.सहजनाथी, 20.मोहननाथी,21.बालेंद्रनाथी, 22. रुद्रनाथी, 23.कुमुस्थनाथी, 24.परमानंदी, 25.सागरनाथी, 26.बाघनाथी, 27. रतननाथी, 

वन: 1.श्याम सुंदर वन, 2. गंगा वन व बलभद्र वन, 3 गोपाल वन व शंखधारी वन, 4. भगवंत वन व रामचंद्र वन,

लामा: 1 वेदगिरि लामा मढ़ी।

पुरी:1.केवल पुरी, 2.अचिंत्य पुरी, 3.मथुरा पुरी, 4.माधव पुरी, 5.हृषिकेश पुरी, 6.जगदेव पुरी, 7.रामचंद्र पुरी, 8.व्यंकट पुरी, 

9.श्याम सुंदर पुरी,10.जड़भरत पुरी, 11.गंगा दर्याव पुरी,12.सिंह दर्याव पुरी,13. भगवान पुरी,14.भगवंत पुरी,15. सहज पुरी,16.मेघनाथ पुरी।

भारती:1.नृसिंह भारती, 2.मनमुकुंद भारती, 3.विश्वम्भर भारती, 4.मनमहेश भारती।

इस सम्प्रदाय के लोग एक दूसरे का सम्बोधन "ओम नमो नारायण" व "हर हर महादेव" से करते है।


13 अखाड़े मे से 7 शैव संन्यासी संप्रदाय के अखाड़े है जिनके नाम 

1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी,

2. श्री पंच अटल अखाड़ा,

3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी,

4. श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती,

5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा,

6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा,

7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा, है। 

वर्तमान मे दशनामी सम्प्रदाय केवल एक जाति बन कर रह गया है। जो इस संप्रदाय को समझते है वो आज भी अतीत मे जी रहे है। युवा वर्ग आज भी अपने इस संप्रदाय से पूर्ण रूप से परिचित नही है। होंगे भी कैसे इतिहासकारों ने इस संप्रदाय के महान सन्यासियों व महान योद्धाओं के इतिहास को जनता से छिपाया है। आज अगर बात करें इस सम्प्रदाय के महान सन्यासियों, यौद्धाओं, क्रांतिकारियों, की तो शायद ही कोई युवा बता पाएगा। दशनामी सम्प्रदाय को सदैव से ही सम्मान की नजर से देखा जाता था परन्तु वर्तमान मे धर्म रक्षकों के इस महान सम्प्रदाय को घुमन्तू जाति बना कर रख दिया गया है। ये सम्प्रदाय श्रेष्ठ होने की प्रतिस्पर्धा से ये पंथ दूर रहा। जिसके चलते आज इस सम्प्रदाय का सम्मान कम हो रहा है। तथा गृहस्थ भी आध्यत्मिक ज्ञान व कर्मकांडों से दूर हो रहे है। अन्य जातियों के भाति ही जीवन यापन कर रहे है।


गोस्वामी का दूसरा नाम गोसाईं है और दोनों का अर्थ होता है -- गो + आत्मा = आत्मा का स्वामी या जितेंद्रिय या मनवशकर्त्ता या पृथ्वीराज या ब्रह्मांड का मालिक । इस लिहाज से देखें तो गोस्वामी या गोसाईं का अर्थ अत्यंत पवित्र , श्रेष्ठ और और कल्याणकारी होता है। पहले यह एक उपाधि होती थी , फिर यह पंथ बनी और अब एक जाति है ।


प्रोo प्रकाश गोस्वामी स्पेशल एजुकेटर

सचिव प्रदेश इकाई 

नासेर्प, उत्तराखंड


एंड 


सलाहकार, विशेष शिक्षक प्रशिकक्षु एसोसिएशन उत्तराखण्ड


कुमाऊँ संयोजक, हेल्प फाउंडेशन उत्तराखंड


ब्लॉक प्रभारी

देवभूमि जनसेवा संस्था बागेश्वर उत्तराखंड


एंड


जिला मीडिया प्रभारी, ओबीसी मोर्चा बागेश्वर, भारतीय जनता पार्टी जनपद बागेश्वर 


🪀9690663544 / 7253994805



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