Sunday, October 4, 2020

उचित नहीं है मां का बेटी की गृहस्थी में हस्तक्षेप




 नमस्कार दोस्तों आज मैं काफी दिनों बाद आपके सामने एक पोस्ट सेयर करने जा रहा हूं जिसका किसी परिवार से व्यक्तिगत संबंध नहीं होने के बाद भी इस कहानी का कई परिवारों से संबंध है।

जो सोनी मल्होत्रा जी द्वारा लिखी एक पोस्ट है।  


Tuesday, 29 Aug, 11.20 am

माँ-बेटी का रिश्ता बहुत ही प्यारा रिश्ता है और हर माँ की चाह होती है कि उसकी बेटी ससुराल में खुश रहे, इसीलिए मां बेटी को प्रारंभ से ही अच्छे संस्कार देती है पर समय के साथ-साथ माताओं की इस सीख में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। आज अधिकतर घरों के टूटने की वजह लड़की के अभिभावकों का उसकी गृहस्थी में हस्तक्षेप और उनके द्वारा दी जाने वाली गलत शिक्षा है। ऐसे कई उदाहरण आप अपने आस-पास पाएंगे। सीमा हमारे पड़ोस में रहती है। उसकी शादी को दो वर्ष हो गए हैं। सीमा के पति रोहित बैंक में अच्छे पद पर कार्यरत हैं। उसके ससुर को भी पेंशन मिलती है। रोहित की एक अविवाहित बहन है और एक बड़े भइया, जो पटना में अपने परिवार के साथ रहते हैं।

बेटी के लिए चिंता करना तो हर मां का फर्ज है। बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, उसके सुख-दुख में उसका साथ देना हर माता-पिता का कर्तव्य होता है, अगर ससुराल वाले उनकी बेटी के साथ गलत व्यवहार करें। अगर उनकी बेटी गृहस्थी में खुश है, उसे अपने पति-ससुराल वालों से कोई शिकायत नहीं तो मां का फर्ज यही है कि वह बेटी और उसके ससुराल वालों के रिश्ते को मजबूत बनाएं। उसे अच्छी सीख दें।

उस रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएं। अपनी बेटी और ससुराल वालों के मध्य रिश्ते को सुधारने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखें:- - विवाह के पश्चात् बेटी की आवश्यकता से अधिक देखभाल न करें। उसकी सहायता करें पर उन्हीं परिस्थितियों में, जब उसे अपने परिवार से सहायता न मिल रही हो। डिलीवरी के दौरान अधिकतर मांएं सोचती हैं कि उनकी बेटी की देखभाल ससुराल में सही तरह से नहीं हो पाएगी, इसलिए वे बेटी को मायके में डिलीवरी करवाने के लिए उकसाती हैं और बेटी अपने ससुराल वालों को छोड़ मायके पहुंच जाती है।


उसे लगता है कि जो देखभाल उसकी मां करेगी, वह सास कहां कर पाएगी। ऐसा कतई न करें। जैसा ससुराल वाले चाहें, बेटी को वैसे ही करने को कहें। इससे आपकी बेटी और ससुराल वालों के मध्य प्यार व देखभाल की भावना बढ़ेगी, रिश्ते मजबूत होंगे।


- विवाह के बाद आपकी बेटी को ससुराल में अपनी जगह बनाने में कुछ समय लगता है। उसे वो समय दीजिए। उसे बार-बार मायके आने पर जोर न दें। विवाह के पश्चात् उसका असली घर ससुराल है और बार-बार मायके आने से वह अपने घर, परिवार को नजरअदांज करती है।


इससे उसके ससुराल वालों को परेशानी हो सकती है। - तोहफे हर किसी को अच्छे लगते हैं पर बहुत अधिक तोहफे देकर आप अपनी बेटी की आदतों को बिगाड़ रही हैं। अगर ससुराल वाले आपकी बेटी के शौकों को पूरा नहीं कर सकते तो आप आर्थिक सहायता देने का कष्ट बिलकुल न करें। इससे आप उसकी ससुराल वालों को नीचा दिखा रही हैं।

बेटी के गृहस्थ जीवन में आप हस्तक्षेप न करें। अगर आप उसकी ससुराल वालों और अपने दामाद को कुछ कहना भी चाहते हैं तो आपका ढंग ऐसा हो कि उन्हें बुरा न लगे। इससे आपके और उनके संबंधों में खटास पड़ सकती है। - बेटी से मिलने उसके घर जाएं तो बेटी के कमरे में ही, उससे ही बात करने की बजाय उसके ससुराल वालों से ऐसा व्यवहार करें कि उन्हें ऐसा लगे कि आप सिर्फ अपनी बेटी से नहीं, उनसे भी मिलने आई हैं।

- बेटी को उसकी ननद , जेठ, जेठानी और देवर के खिलाफ भी न भड़काएं। उसे हमेशा सीख दें कि उसका व्यवहार अपनी ननद से बहन की तरह ही होना चाहिए, और देवर - देवरानी, जेठानी से भी भाई बहन जैसा ही ब्यावहार करें।  अगर आपका दामाद अपने परिवार वालों पर कोई खर्चा करता है तो अपनी बेटी को दामाद के इस खर्चे में कटौती करने के लिए न उकसाएं। जब आपकी बेटी अपने भाई-बहनों पर खर्च कर सकती है तो आपका दामाद अपने परिवार पर क्यों खर्च नहीं कर सकता।

 ध्यान रहे आप अपनी सीखो से अपनी बेटी की गृहस्थी को सुखमय भी बना सकती हो ओर उजार भी सकती है। इसलिए आप अपनी बेटी की शोच को बड़ा और सकारात्मक बनाने की कोशिश करें। ताकि उसके ससुराल वाले उस पर नांज करे। सोनी मल्होत्रा।।


दोस्तो यह कहानी हमने काफी सोच विचार कर सेंड कर रहा हूं

इस कहानी से हमें यही सीख मिलती हैं कि हमें अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा और  शिष्टाचार देना चाहिए ताकि बेटी ससुराल में अपने नाम के साथ साथ अपने ससुराल और मायके का नाम भी रोशन करें। तथा अपने सास - ससुर का नाम रोशन करे।

Monday, June 22, 2020

9 महीने के बच्चे की गतिविधियां

9 महीने के बच्चे की गतिविधियां, विकास और देखभाल 9 Mahine Ke Shishu Ka Vikas

अगर आपका शिशु अपने उम्र के 9वें महीने में कदम रख चुका है, तो वह पहले से ज्यादा चुस्त और थोड़ा नटखट भी हो गया होगा। आपको उसकी भोली मुस्कान लुभाती होगी और आप उसके विकास के संबंध में और भी बहुत कुछ जानना चाहते होंगे।


9 महीने के बच्चे का वजन और हाइट कितनी होनी चाहिए?

9 महीने के शिशु का विकास पिछले महीनों की तुलना में काफी एक्टिव हो जाता है। उसके वजन और हाइट में भी काफी बदलाव होते हैं। नौ महीने की बेबी गर्ल का सामान्य वजन लगभग 7.2 से लेकर 9.3 किलो तक और लंबाई करीब 70 सेंटीमीटर तक हो सकती है। वहीं, बेबी बॉय का सामान्य वजन लगभग 7.9 किलो से लेकर 10.2 किलो तक hहो सकता है और लंबाई लगभग 72 सेंटीमीटर तक हो सकती है।


9 महीने के बच्चे के विकास के माइल्सटोन क्या हैं?

अब आपका शिशु नौ महीने का हो चुका है और वह पहले से ज्यादा फुर्तीला हो गया होगा। 9 महीने की उम्र में बच्चे की गतिविधियों में बदलाव आने लगता है और वो नई-नई चीजें सीखने लगता है। ऐसे में उसके मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तनों पर ध्यान देना जरूरी है। यहां जानिए कि 9 महीने के शिशु में क्या-क्या परिवर्तन आते हैं :

मानसिक विकास

इशारों की नकल करना – आपने यह तो सुना ही होगा कि बड़े जो करते हैं, बच्चे उसे देखकर दोहराने की कोशिश करते हैं। यह बात काफी हद तक सच है, क्योंकि 9 महीने के बच्चे अपने आसपास हर वक्त रहने वाले लोगों की नकल करने का प्रयास करते हैं। सिर्फ आदतें ही नहीं, बल्कि आवाजों की भी नकल करने लगते हैं। इसलिए, जो उनके साथ रहते हैं, उन्हें कोई भी काम सावधानी से करना चाहिए और सोच-समझकर बोलना चाहिए।


आवाजें निकालना – 9 महीने में शिशु कई तरह की आवाजें निकालने लगते हैं, यहां तक कि ‘मम्मा-बाबा’ तक बोलना सीखने लगते हैं।

चीजों को दिखाना – इस उम्र में शिशु को चीजों और लोगों की काफी समझ हो जाती है। उन्हें जो चीज चाहिए होती है या जिस इंसान के पास जाना होता है, वो उनकी तरफ उंगली से इशारा करके दिखाने लगते हैं।


लुका छिपी खेलना – अगर कोई उनके साथ लुका छिपी खेलें, तो उन्हें अच्छा लगता है और वो उस खेल का मजा लेने लगते हैं।

‘न’ की समझ – 9 महीने के शिशु ‘न’ शब्द को समझने लगते हैं। अगर वो कोई चीज मांगे और उन्हें न मिले, तो वो रोने लगते हैं।

चीजों को मुंह में डालना – इस उम्र में शिशु थोड़ी बहुत चीजें खाना सीखने लगते हैं। उनके सामने कुछ भी रहता है, तो वो उसे अपने मुंह में डाल लेते हैं। इसलिए, इस दौरान माता-पिता को शिशु पर काफी ध्यान रखना जरूरी होता है।

किताबें देखना – 9 महीने के बच्चे रंग-बिरंगी किताबों के तरफ भी बहुत आकर्षित होते हैं। अगर बड़े उनके साथ बैठकर उन्हें कार्टून की किताबें दिखाएं, तो वो काफी देर तक उसकी तरफ आकर्षित रहते हैं।

चीजों को फेंकना – शिशु चीजों को जमीन पर फेंकना या दीवार पर मारना सीखने लगते हैं। अगर एक बार उन्हें उठाकर वो चीज वापस दो, तो उन्हें मजा आता है और वो बार-बार उसे दोहराते हैं।

शारीरिक विकास

क्रॉल या घुटनों के बल चलना – माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं होता, जब उनका शिशु घुटनों के बल चलकर उनके तरफ आता है। 9 महीने का बच्चा घुटनों के बल चलना सीखने और खेलने लगता है।

बिना सहारे के बैठना – शिशु जन्म के कुछ महीने तक खुद से बैठ नहीं पाता, क्योंकि उनकी रीढ़ की हड्डी कमजोर होती है और सही तरीके से विकसित नहीं होती है। फिर जैसे-जैसे वो बड़े होने लगते हैं, उनकी रीढ़ की हड्डी मजबूत होने लगती है और जब शिशु 9 महीने के होते हैं, तो वो बिना सहारे के बैठने लगते हैं।

चीजों को पकड़ना – शिशु अपने तर्जनी और अंगूठे से छोटी-छोटी चीजों को पकड़ना सीखने लगते हैं और एक हाथ से दूसरे हाथ में पास करना भी सीख जाते हैं।

कंधों और हाथों का उपयोग – शिशु कंधों और हाथों का सहारा लेने लगते हैं। अगर उन्हें नीचे या बेड पर पेट के बल लेटाया जाता है, तो वो अपने हाथों से खुद को रोक सकते हैं। इसको पैराशूट रिफ्लेक्स कहते हैं।

सहारे से खड़ा होना – शिशु सहारे के साथ-साथ धीरे-धीरे खड़े होने लगते हैं। कई बार तो वो इशारे करके या रो-रोकर लोगों को अपने पास बुलाते हैं। फिर उनके सहारे खड़े होकर खुश हो जाते हैं।


सामाजिक और भावनात्मक विकास

जानने वालों के ज्यादा करीब – जो लोग शिशु के साथ ज्यादा वक्त बिताते हैं, उनके साथ शिशु ज्यादा घुल-मिल जाते हैं और प्यार जताते हैं। साथ ही उनके करीब रहना पसंद करते हैं।

अजनबियों से डर – शिशु को लोगों को पहचानने की समझ होने लगती है। वो अपने और अजनबियों के बीच फर्क समझने लगते हैं। इसलिए, जब वो कोई नया चेहरा देखते हैं या किसी अजनबी के गोद में जाते हैं, तो रोने और चिड़चिड़ाने लगते हैं।

पसंदीदा खिलौना – 9 महीने में शिशु कई तरह के खिलौनों से खेलना सीख जाते हैं। साथ ही कई बार उनको कुछ विशेष तरह के खिलौनों के साथ खेलना ज्यादा पसंद होता है। ऐसे में उनके पसंदीदा खिलौने भी हो जाते हैं, जिनके साथ उन्हें खेलना अच्छा लगता है।

आगे जानिए 9 महीने बच्चे को कौन-कौन से टीके लगवाने जरूरी है।

9 महीने के बच्चे को कौन-कौन से टीके लगाए जाते हैं?

9 महीने के शिशु का विकास सही तरीके से हो, उसके लिए उन्हें लगने वाले टीकों का ध्यान रखना जरूरी है। टीकाकरण के कारण ही शिशु की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है और बीमारियों से उनका बचाव हो सकता है। इसलिए, लेख के इस भाग में हम 9 महीने बच्चे को लगाए जाने वाले टीकों के बारे में जानकारी दे रहे हैं।

ओपीवी 2

एमएमआर -1

नोट : टाइफाइड कॉन्जुगेट वैक्सीन, ये टीका शिशु को 9 से 12 महीने के बीच लगाया जाता है। हालांकि, इसके बारे में आपको डॉक्टर या शिशु विशेषज्ञ से और अच्छी जानकारी मिल सकती है।
अब बारी आती है यह जानने की कि 9 महीने के बच्चे के लिए कितना दूध आवश्यक है।

9 महीने के बच्चे के लिए कितना दूध आवश्यक है?

मां का दूध – शिशु को 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध ही पिलाना ही चाहिए। उसके बाद शिशु को ठोस आहार देना शुरू किया जा सकता है। वहीं, कुछ शिशु 6 महीने के बाद भी मां के दूध का सेवन करते हैं। अगर आपका 9 महीने का शिशु भी उन्हीं में से एक है, तो उसे दिन भर में तीन से पांच बार स्तनपान करा सकते हैं। अगर मिलीलीटर की बात करें, तो शिशु लगभग 887 से 946 मिलीलीटर (30 to 32 ounces) तक दूध पी सकता है। यह मात्रा काफी हद तक शिशु के स्वास्थ्य और भूख पर भी निर्भर करती है।
फॉर्मूला फीड – अगर आपका शिशु फॉर्मूला दूध पीता है, तो आप उसे उसकी इच्छानुसार चार से पांच बार फॉर्मूला फीड दे सकते हैं। आप दिनभर में 700 से 950 मिलीलीटर तक फॉर्मूला दूध दे सकते हैं।

नोट : शिशु की दूध पीने की मात्रा उसके भूख और स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। हर शिशु की भूख और जरूरत अलग-अलग होती है, तो उसी के अनुसार वो दूध पीते हैं।
दूध के बाद बारी आती है आपके 9 महीने बच्चे के विकास के लिए सही मात्रा में आहार के बारे में जानने की।

9 महीने के बच्चे के लिए कितना खाना आवश्यक है?

9 महीने के बच्चे का विकास सही तरीके से हो, उसके लिए उसका सही आहार लेना बहुत जरूरी है। शिशु को धीरे-धीरे पौष्टिक तत्व युक्त आहार मिलना बहुत आवश्यक है। नौवें महीने का बेबी ठोस आहार लेना शुरू कर देता है। इसलिए, यहां हम आपको बता रहे हैं कि 9 महीने के बच्चे के लिए कितना खाना आवश्यक है।

खाद्य पदार्थ मात्रा बेबी सीरीयल (शुरुआत करें होल वीट और मिश्रित अनाज से)पूरे दिन में 4 से 8 चम्मच या उससे ज्यादा भी दे सकते हैं।

हरी सब्जियां हर दिन एक चौथाई कप से आधा कप दो से तीन बार

फल हर दिन एक चौथाई कप से आधा कप दो से तीन बार

डेयरी उत्पाद – दही या पनीरएक चौथाई कप दही या पनीर के छोटे टुकड़े दिनभर में एक से दो बार

प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ – अंडे की जर्दी, चिकन, बीन्सएक चौथाई कप एक से दो बार

पानी आधा से एक कप (लगभग 125 से 250 मिलीलीटर – 4 to 8 oz) मतलब पूरे दिन में आधा से कप

फलों का जूस शिशु के एक साल का होने के बाद ही दें।

नोट : शिशु को एक साल होने के बाद ही होल मिल्क और अंडे का सफेद भाग दें। इसके अलावा, हर शिशु का स्वास्थ्य और जरूरत अलग-अलग होती है, इसलिए यह डाइट चार्ट एक उदाहरण के तौर पर हमने आपके साथ शेयर किया है।अपने शिशु के डाइट चार्ट के लिए आप शिशु विशेषज्ञ से राय ले सकते हैं।

9 महीने के बच्चे के लिए कितनी नींद आवश्यक है?

9 महीने के बच्चे का विकास सही तरीके से हो, उसके लिए पर्याप्त नींद लेना भी जरूरी है। 9 महीने के बच्चे की नींद में पहले की तुलना में बदलाव हो सकते हैं। 9 महीने के बच्चे के लिए 24 घंटे में से 12-16 घंटे की नींद जरूरी होती है। इसमें कुछ देर की झपकियां भी शामिल हैं।

9 महीने के बच्चे के लिए खेल और गतिविधियां

अब बात करते हैं आपके 9 महीने के नन्हे और फुर्तीले शिशु के लिए कुछ खेल और गतिविधियां के बारे में, जो उन्हें मानसिक और शारीरिक तरीके से और एक्टिव बनाने में आपकी मदद कर सकती हैं।

गेंद से खेलना – शिशुओं को बॉल से खेलना अच्छा लगता है। अगर उनके सामने कोई छोटी या बड़ी गेंद रखी जाए, तो वो उसे दूर फेंकने की कोशिश करते हैं। कोई उसे फिर से गेंद लाकर दे, तो शिशु बार-बार मजे के लिए यह प्रक्रिया दोहराते हैं। इस उम्र के शिशु को आवाज करने वाले और लाइट वाले खिलौने पसंद होते हैं।

किताबें या तस्वीरें देखना – शिशु को रंग-बिरंगी किताबें दिखाएं और उन्हें कहानियां सुनाएं। ऐसा करने से वो न सिर्फ किताब के पन्नों को पलट-पलटकर आपकी कहानी सुनाने की नकल करेंगे, बल्कि रंगों को भी देखकर खुश होंगे।

बाल्टी के साथ खेलना – शिशु के सामने कोई बाल्टी रख दें और उसमें उनके सामने खिलौने गिराएं। इससे वो भी आपकी नकल करेंगे और खिलौने गिराएंगे। वो जैसे ही ऐसा करें आप उनके सामने ‘धप’ या कोई और शब्द बोलें। ऐसा करने से वो धीरे-धीरे कुछ शब्द सीखने लगेंगे। अगली बार जब आपका बच्चा बाल्टी में कुछ गिराए, तो आप चुप रहकर उसकी प्रतिक्रिया का इंतजार करें।

गाना या ताली बजाना – शिशु के सामने ताली बजाकर या गाना चलाकर खेलें। कई शिशु तो गाने सुनकर नाचने तक की कोशिश करते हैं और उत्सुक होकर ताली भी बजाने लगते हैं।

लेख के आगे के भाग में जानिए कि 9 महीने के बच्चे के माता-पिता को उनके नन्हे के लिए कौन सी स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं होती हैं।


9 महीने के बच्चों के माता-पिता की आम स्वास्थ्य चिंताएं

काली खांसी – काली खांसी संक्रामक होती है और यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। अगर आपके बच्चे की नाक बह रही हो, उसे हल्का बुखार हो और वो लगातार खांस रहा हो, तो बिना देर करते हुए उसे डॉक्टर के पास ले जाएं। इससे शिशु को सांस लेने में तकलीफ हो सकती है।

निमोनिया – अगर आपके शिशु को लगातार बुखार हो, ठंड लगे, उल्टी और सांस लेने में तकलीफ हो, तो यह निमोनिया का लक्षण हो सकता है। ऐसी स्थिति में बिना देर करते हुए डॉक्टर से संपर्क कर शिशु की सेहत पर ध्यान दें।

कान में संक्रमण – कभी-कभी ऐसा होता है कि नहलाते वक्त शिशु के कान में हल्का पानी जा सकता है। हालांकि, माता-पिता तौलिए से कान साफ कर देते हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसा करने से भी पानी ठीक से नहीं निकलता है। इस कारण शिशु को कान दर्द की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है और कान में संक्रमण के लक्षण हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में शिशु को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं और सावधानी बरतें।

9 महीने बच्चे के बारे में जानिए कुछ और बातें।


बच्चे की सुनने की क्षमता, दृष्टि और अन्य इंद्रियां

क्या मेरा बच्चा देख सकता है?

आपके शिशु की दृष्टि महीने दर महीने तेज होने लगती है और नौवें महीने में आपकी शिशु की दृष्टि काफी विकसित हो जाती है। अब आपका शिशु दूर और पास दोनों चीजें तो देख ही सकता है, साथ ही चलती हुई चीजों पर भी ध्यान केंद्रित कर सकता है। उसे रंग-बिरंगी किताबें और खिलौने देखना और परिचित चेहरों को देखना पसंद आने लगता है।


क्या मेरा बच्चा स्वाद और गंध को पहचान सकता है?

इस उम्र से ही शिशु अपने पसंद के खाने का धीरे-धीरे चुनाव करने लगते हैं। अगर आपका शिशु कुछ खाने से इंकार करे, तो आप उसे थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार वो चीज देने की कोशिश करें। ऐसा करने से वो कभी न कभी उस चीज को जरूर चखेंगे। इसके अलावा, शिशु को अच्छी खुशबू वाली चीजों को हल्का-हल्का सुंघाएं, ताकि उनमें गंध की समझ और ज्यादा होने लगे।

नौवें महीने में शिशु की सफाई को लेकर ध्यान देने के संबंध में कुछ टिप्स।

बेबी स्वच्छता से जुड़ी कुछ बातें

शिशु को नहलाएं – शिशु को रोजाना नहलाएं। आप मौसम के अनुसार शिशु को नहलाने का फैसला कर सकते हैं। अगर रोजाना नहीं नहला सकते हैं, तो गीले तैलिये से हल्का-हल्का करके उनके शरीर को पोछें। फिर मॉइस्चराइजर या बेबी क्रीम लगाएं।

हाथ धोना – बाहर से आने के बाद शिशु को छूने से पहले हाथ धोएं। शिशु बहुत ही नाजुक होते हैं और उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, इसलिए उन्हें किसी भी चीज का संक्रमण जल्दी हो सकता है। इसलिए, बाहर से आने के बाद जो कोई भी शिशु को गोद में ले या छूने की कोशिश करे, तो पहले उसे हाथ धोने को कहें।

घर की साफ-सफाई – 9 महीने में शिशु क्रॉल करके जमीन पर खेलना शुरू कर देते हैं, ऐसे में ध्यान रहे कि आपका घर साफ-सुथरा रहे। इस उम्र में शिशु को कुछ भी उठाकर मुंह में डालने की आदत होती है। ऐसे में वो नीचे पड़ी चीजों को उठाकर मुंह में ले सकते हैं और इससे उनका स्वास्थ्य खराब हो सकता है। इसलिए, हर वक्त घर की सफाई पर ध्यान दें।
खिलौनों को साफ करना – शिशु खिलौनों से खेलते-खेलते कई बार उसे मुंह में लेने लगते हैं। अगर खिलौना गंदा हो, तो वो गंदगी शिशु के पेट में जा सकता है और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

शिशु के कपड़े – शिशु के कपड़ों को एंटीसेप्टिक लिक्विड से और गुनगुने पानी से धोएं, ताकि उनमें कीटाणु की समस्या न हो।

खाने का बर्तन – 9 महीने का बच्चा थोड़ा बहुत ठोस आहार लेने लगता है। ऐसे में शिशु को जिस कटोरे और चम्मच से आप आहार दे रहे हैं, उसे अच्छी तरह से धोएं।


माता-पिता अपने शिशु के विकास में सहयोग कर सकते हैं।


माता-पिता बच्चे के विकास में कैसे मदद कर सकते हैं?

शिशु का सही विकास हो, उसमें माता-पिता का महत्वपूर्ण योगदान होता है। नीचे उसी के बारे में हम कुछ बातें बता रहे हैं :

माता-पिता शिशु को रंग-बिरंगी किताबें दिखाएं और कहानियां व लोरी सुनाएं।

पौष्टिक आहार खिलाएं।

उनके साथ खेलें और ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताएं।

नई-नई चीजें और खिलौने दिखाएं।

उन्हें जमीन पर खेलने और क्रॉल करने दें।

इस उम्र में शिशु जमीन पर खेलने और क्रॉल करने लगते हैं। ऐसे में आपका घर बेबी प्रूफ होना भी जरूरी है, ताकि आपके शिशु को चोट न लगे या कोई अन्य समस्या न हो। टेबल व कुर्सी के नुकीले कोनों का ध्यान रखें। इससे आपके शिशु को चोट लगने का डर होता है। छोटी-छोटी चीजें जमीन पर न हो, जिसे शिशु मुंह में ले सके, कहीं पर भी तार न निकला हो।

अब हम आपको 9 महीने बच्चे के कुछ लक्षण बताएंगे, जिसके बारे में माता-पिता को ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि अगर इन लक्षणों पर ध्यान न दिया गया, तो यह चिंता का कारण हो सकता है।


9 महीने के बच्चे के विकास के बारे में माता-पिता को कब चिंतित होना चाहिए?

अगर आपका शिशु खड़े होने में असमर्थ हो।

अगर शिशु चीजों को उंगलियों से पकड़ नहीं पा रहा हो।

दूर की चीजों को देखने और समझने में परेशानी हो रही हो।

अगर शिशु अपनी आंखों को ज्यादा रगड़ या नोंच रहा हो।

आवाजों को सुनकर कोई प्रतिक्रिया न दे रहा हो।

अगर बैठने में परेशानी हो रही हो।

अगर शिशु चिड़चिड़ा हो और दिनभर रोता रहे।

इस महीने के लिए चेकलिस्ट

अन्य महीनों की तरह 9 महीने शिशु के लिए भी माता-पिता को चेकलिस्ट रखनी चाहिए, ताकि उन्हें शिशु के बेहतर विकास का पता चलते रहे।

नियमित रूप से डॉक्टर से शिशु का चेकअप कराएं।

9 महीने में दिए जाने वाले वैक्सीन के बारे में जानकारी रखकर शिशु को सही वक्त पर वैक्सीन दिलवाएं।

शिशु की सफाई का पूरा ध्यान रखें।

9 महीने के शिशु की तस्वीर खींचना न भूलें, जिससे आपको शिशु के शारीरिक विकास का पता चलेगा।

आगे हम माता-पिता द्वारा पूछे जानें वाले कुछ आम सवालों के जवाब देंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या 9 महीने की उम्र में बच्चे चलना शुरू कर सकते हैं?

9 महीने की उम्र में बच्चे क्रॉल करना सीख जाते हैं। अगर चलने की बात करें, तो कुछ बच्चे चल सकते हैं और कुछ नहीं भी चल सकते हैं। यह पूरी तरह से शिशु के स्वास्थ्य और उनके विकास पर निर्भर करता है।

मेरे 9 महीने के बच्चे ने बैठना नहीं सीखा है। क्या मुझे इस बारे में चिंता करनी चाहिए?

आमतौर पर शिशु छठे महीने से बिना सहारे के थोड़ा-बहुत बैठने लगते हैं (12), लेकिन अगर आपका बच्चा 9 महीने का हो चुका है और अभी तक बैठना नहीं शुरू किया है, तो यह चिंता का विषय हो सकता है। बेहतर होगा कि आप एक बार डॉक्टर से इस बारे में बात करें और अपने शिशु का चेकअप करा लें।

शिशु का स्वस्थ विकास किसी भी माता-पिता के लिए तोहफे से कम नहीं होता है। अगर शिशु खुश और सेहतमंद रहे, तो उसके और उसके माता-पिता दोनों के लिए खुशी की बात होती है। आशा करते हैं कि इस लेख से आपको अपने शिशु को खुश रखने के टिप्स मिलेंगे और इसमें दी गई जानकारी आपको अपने बच्चे को स्वस्थ रखने के काम आएगी। अगर आपके पास भी 9 महीने के बच्चे से जुड़ी कोई जानकारी है या सवाल है, तो उसे हमारे साथ नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर शेयर करें।


दोस्तो आपको यह आर्टिकल कैसा लगा हमें जरुर बताये. आप अपनी राय, सवाल और सुझाव हमें comments के जरिये जरुर भेजे. अगर आपको यह आर्टिकल उपयोगी लगा हो तो कृपया इसे share करे।
आप E-mail के द्वारा भी अपना सुझाव दे सकते हैं।
 prakashgoswami03@gmail.com

http://Goswamispecial.blogspot.com

My channel -
https://youtu.be/7FZQJo_oJMc

Like, Subscribe Goswami Channel-
https://youtu.be/5Yy8qiRFyfs

https://youtu.be/KgfIuA6T5AE

https://youtu.be/vymy2E4x8zg

https://youtu.be/KgfIuA6T5AE

https://mobile.twitter.com/Prakash41827790


 ऑनलाइन सेवा

गोस्वामी कॉमन सर्विस सेंटर
Goswami Common Service Center

1. सभी प्रकार के ऑनलाइन आवेदन और LIC किस्त जमा किया जाता है
2. सभी प्रकार के ऑनलाइन बिल जमा किए जाते है
3. रूपए ट्रांसफर किए जाते है
4. पीएम किसान सम्मान निधि योजना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाता है
5. सभी प्रकार से ऑनलाइन फॉर्म भरे जाते है।
6. ऑनलाइन एंप्लायमेंट रजिस्ट्रेशन किया जाता है
7. सभी प्रकार के ऑनलाइन फलेक्सी ओर रिचार्ज किए जाते है
8. कुमाऊं यूनिवर्सिटी की ऑनलाइन डिग्री, माइग्रेशन प्रमाण पत्र के लिए अप्लाई
9. कुमाऊं यूनिवर्सिटी ऑनलाइन एडमिशन
10. आरसीआई ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन
11. सीटेट / UTET ओर NET Exam k लिए अप्लाई
12. उत्तराखंड मुक्त विश्व विद्यालय की डिग्री के लिए अप्लाई
13. एग्जाम फॉर्म और बैक एग्जाम फॉर्म
14. ऑनलाइन एडमिशन फॉर्म
15.ऑनलाइन आधार कार्ड बनाने
16. ऑनलाइन स्कॉलरशिप का फॉर्म फिल
17.ऑनलाइन आरडी जमा करने
18.ऑनलाइन पेन कार्ड सेवा
19.ऑनलाइन लाइफ पेंशनर सर्टिफिकेट(जीवित प्रमाण पत्र)
20. ऑनलाइन मैरिज सर्टिफिकेट
21. ऑनलाइन पहचान पत्र बनवाना आदि।
22. PM श्रम योगी मानधन योजना : मासिक 55 रु जमा करने पर हर महीने मिलेंगे 3000 रु


💐💐कृपया सेवा का अवसर दे।🙏🏻🌷🌷
   
     
       
प्रोo - प्रकाश गोस्वामी ई-डिस्ट्रिक्ट उपयोगकर्ता
            9690663544/7253994805


नोट - सभी प्रकार से ऑनलाइन आवेदन के लिए या रजिस्ट्रेशन के लिए वॉट्सएप सेवा ही उपलब्ध है।

मेल आईडी - prakashgoswami03@gmail.com

Blogs-
www.goswamispecial.blogspot.com

New blogs- https://goswamispecialeducator.blogspot.com

YouTube-
https://youtu.be/7FZQJo_oJMc

https://mobile.twitter.com/Prakash41827790

My book link -
https://1drv.ms/w/s!Aob0473_bgN8dCsRYxgMPUVRw98



Wednesday, June 10, 2020

स्तनपान के दौरान मैस्टाइटिस

स्तनपान के दौरान मैस्टाइटिस (स्तनों में सूजन)

मैस्टाइटिस क्या है?

मैस्टाइटिस आपके स्तन ऊत्तकों में होने वाली सूजन व असहजता है। यह सूजन बहुत जल्दी इनफेक्शन का रूप ले सकती है, जिसका मतलब है कि सूजे हुए ऊत्तकों में जीवाणु (बैक्टीरिया) विकसित होने लगते हैं। हो सकता है अपने स्तनों के क्षेत्र में आप निम्नांकित समस्याएं महसूस करें:

1. लाल होना

2. ठोस होना

3. दर्द होना

4. गर्म महसूस होना

5. सूजन होना


आपको गांठ भी महसूस हो सकती है, जो कि स्तन में दूध इकट्ठा होने की वजह से होती है। इसे अक्सर अवरुद्ध नलिका (ब्लॉक्ड डक्ट) कहा जाता है, हालांकि वास्तव में यह कोई रुकावट होने की वजह से नहीं होता। यहां आपका बैक-अप यानि अतिरिक्त दूध रिसकर आपके स्तन ऊत्तकों में आ गया है, जिससे इनमें सूजन हो गई है।



स्तन में गांठ वाला क्षेत्र आपको शायद पत्ती के आकार का (वेज शेप) का लगेगा क्योंकि आसपास की नलिका, छोटी नलिकाएं और एल्वियोली सभी में सूजन होगी।

आपको फ्लू के लक्षण भी महसूस हो सकते हैं, जैसे कि:

1. कंपकपी

2. सिरदर्द

3. 101 डिग्री फेहरनहाइट से ज्यादा बुखार

4. थकान

5. बदन दर्द

6. सुस्ती


आमतौर पर स्तनपान करवाने वाली 10 में से एक माँ को मैस्टाइटिस होता है। बोतल से दूध पिलाने वाली कुछ माँओं को भी मैस्टाइटिस हो जाता है।

आपके स्तनों के माप का इससे कोई लेना-देना नहीं है। इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि बड़े या छोटे स्तनों वाली महिलाओं को मैस्टाइटिस होने की संभावना ज्यादा या कम रहती है।

मैस्टाइटिस होना काफी पीड़ादायी है, मगर सही उपाय या विकल्पों से इसे जल्द ही ठीक किया जा सकता है। यह आमतौर पर एक स्तन में ही होता है, मगर एक बार में दोनों स्तनों में होना भी संभव है। दुर्भाग्यवश, आपको मैस्टाइटिस एक से ज्यादा बार भी हो सकता है।

स्तनपान करवाने वाली माँओं में मैस्टाइटिस होने के क्या कारण हैं?

मैस्टाइटिस अधिकांशत: स्तन में दूध के बढ़ जाने पर होता है क्योंकि दूध जितनी जल्दी बन रहा है उतनी शीघ्रता से निकाला नहीं जा रहा है (मिल्क स्टेसिस)।

मिल्क स्टेसिस की स्थिति तब होती है जब स्तनपान के दौरान शिशु स्तनों से पर्याप्त दूध नहीं ले पा रहा हो। ऐसा शिशु द्वारा स्तन सही ढंग से मुंह में न ले पाने (लैचिंग) की वजह से हो सकता है।

यदि शिशु एक स्तन में सही ढंग से लैच नहीं कर रहा, तो इससे निप्पल में दर्द हो सकता है और आपके लिए उस स्तन से दूध पिलाना मुश्किल हो सकता है। इससे अतिपूरित स्तन, मिल्क स्टेसिस और फिर मैस्टाइटिस हो सकता है। यदि आपका शिशु किसी एक स्तन से दूध पीना ज्यादा पसंद करता है, तो जिस स्तन से वह कम बार दूध पीता है उसमें मैस्टाइटिस होने का खतरा ज्यादा होता है।

मिल्क स्टेसिस और फिर मैस्टाइटिस होने के निम्न कारण हो सकते हैं:


  • स्तन भरे-भरे रहना (एन्गॉर्जमेंट), जो सामान्य न हो पाएं, शायद शिशु के पूरी रात अच्छी तरह सोने की वजह से।



  • तय दिनचर्या के अनुसार दूध पिलाना, ताकि एक फीड से दूसरे फीड के बीच लंबा अंतराल हो।



  • कपड़ों की वजह से स्तन पर दबाव पड़ना, ब्रा की पट्टी तंगहोना या अंडवायर ब्रा, आपके सोने की अवस्था, सीट बेल्ट या फिर पर्स या डायपर बैग इस तरह से लेना कि आपके स्तनों पर दबाव पड़े।



  • स्तन पर कोई चोट लगना।




  • कई बार मिल्क स्टेसिस की स्थिति बिगड़ सकती है और रोगजनक मैस्टाइटिस का रूप ले लेती है। ऐसा तब हो सकता है जब आपके निप्पलों में क्रेक हो। निप्पल के क्रेक या छिद्र के जरिये इनफेक्शन आपके स्तन की लसीका प्रणाली में प्रवेश कर सकता है।



  • पहली बार माँ बनी महिलाओं में मैस्टाइटिस होने की संभावना अधिक होती है, हालांकि पहले भी स्तनपान करवा चुकी माँओं को भी यह हो सकता है। मैस्टाइटिस स्तनपान के किसी भी दौर में हो सकता है। हालांकि, यह पहले तीन माह में अधिक आम है, विशेषतौर पर दूसरे या तीसरे सप्ताह में, जब आप स्तनपान की आदि होने का प्रयास कर रही होती हैं।



  • मैस्टाइटिस को पैसिफायर या सूदर या फिर बोतल इस्तेमाल करने वाले शिशुओं से भी जोड़ा गया है। इन चीजों के इस्तेमाल की वजह से शिशु स्तनों पर ज्यादा समय नहीं लगा रहता और साथ ही ये स्तनों को मुंह में लेने के तरीके को भी प्रभावित करते है।



  • यदि आपके शिशु को टंग टाई है, तो भी उसे स्तनों को सही ढंग से मुंह में लेने में दिक्कत हो सकती है।


मैस्टाइटिस का उपचार कैसे किया जा सकता है?

प्रभावित स्तन से भी शिशु को स्तनपान कराती रहें। हालांकि, ऐसा करने में आपको बहुत दर्द हो सकता है, मगर यदि आप उस स्तन से दूध पिलाना बंद कर देंगी तो मैस्टाइटिस और अधिक बिगड़ सकता है।

यदि आपकी तबियत ठीक न लगे या शिशु को स्तनपान करवाने से भी सूजन व असहजता में कोई फर्क न पड़े तो डॉक्टर से मिलें। यदि कुछ दिनों से आपको मैस्टाइटिस और इसमें इनफेक्शन हो गया है तो डॉक्टर आपको एंटीबायोटिक दवाएं दे सकते हैं, जिनका सेवन स्तनपान के दौरान सुरक्षित हो।

यहां कुछ घरेलू तरीके भी बताए गए हैं जिनका इस्तेमाल आप एंटीबायोटिक लेने या न लेने पर भी कर सकती हैं:


  • सुनिश्चित करें कि शिशु ने सही ढंग से स्तन मुंह में लिया है और सही से दूध पी रहा है।



  • स्तनपान की अलग-अलग अवस्थाओं को आजमाकर देखें कि कौन सी अवस्था में शिशु सही ढंग से लैच कर पा रहा है।



  • शिशु को इस तरह स्तन से लगाएं कि उसका निचला जबड़ा आपके स्तन के सूजे हुए हिस्से की तरफ हो। उदारहण के तौर पर यदि मैस्टाइटिस स्तन के ऊपरी हिस्से के पास है, तो शिशु को रग्बी होल्ड अवस्था में स्तनपान करवाएं।



  • शिशु जब चाहे उसे स्तनपान करवाएं, दिन में कम से कम आठ से 12 बार।



  • यदि शिशु ने पूरी तरह दूध नहीं पीया है तो स्तनपान करवाने के बाद हाथ या पंप की सहायता से दूध निकालें (एक्सप्रेस)। यदि आपके निप्पलों मे दर्द हो तो यह काफी काम आ सकता है।



  • आराम करें और पर्याप्त तरल पदार्थ लें। जब आप आराम करें तो अपने पति या परिवार के अन्य सदस्य को शिशु की देखभाल करने दें।



  • स्थिति सुधरने तक ढीले-ढाले कपड़े या ढीली ब्रा पहनें।



  • आप पाएंगी कि स्तन पर गर्माहट का सेक करना मदद करता है। तौलिया या कम्प्रेस को अपनी त्वचा पर लगाएं या हल्के गर्म पानी से नहा लें। यह भी संभव है कि आपको ठंडी सिकाई से ज्यादा आराम मिले। कई महिलाओं को पत्तागोभी का एकदम ठंडा पत्ता लगाने से भी आराम मिलता है।



  • शिशु जब स्तनपान कर रहा हो, तो अपने स्तनों को हल्के से मालिश करें। जहां से आपको गांठ महसूस हो रही हो, वहां से निप्पल की तरफ मालिश करें। अधिक बल से मालिश करना मैस्टाइटिस को और बिगाड़ सकता है क्योंकि यह रिस कर आए दूध को स्तन ऊत्तकों में और अंदर ले जाता है।



  • आप दर्द कम करने के लिए डॉक्टर द्वारा बताई गई दर्दनिवारक दवा ले सकती हैं। ध्यान रखें कि स्तनपान के दौरान एस्पिरिन का सेवन उचित नहीं है।



  • कुछ माँएं पाती है कि मैस्टाइटिस के उपचार में होम्योपैथिक दवाएं फायदा करती हैं। यदि आप यह आजमाना चाहे तो किसी मान्यता प्राप्त होम्योपैथी डॉक्टर से सलाह लें।



  • आप ये घरेलू उपचार एंटीबायोटिक लेने से पहले आजमा सकती हैं।



यदि आपको सुधार न लगे तो डॉक्टर से मिलने को टाले न। यदि मैस्टाइटिस ठीक न हो तो यह स्तन फोड़े का रूप ले सकता है। यह स्तन के अंदर मवाद इकट्ठी होने की स्थिति है और मैस्टाइटिस से ग्रस्त कुछ महिलाओं को होती है।

यदि आपको स्तन फोड़ा है तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता की जरुरत होगी और कई बार मवाद या पस निकालने के लिए आॅपरेशन भी करना पड़ता है। फोड़ा लाल और छूने पर गर्म महसूस हो सकता है इसमें सूजन हो सकती है और आपको तेज बुखार भी हो सकता है।

यदि आपका शिशु सही ढंग से स्तनपान नहीं कर रहा या उचित ढंग से लैच नहीं कर पा रहा तो डॉक्टर से मदद लें। वे आपको किसी स्तनपान सलाहकार या नवजात फीडिंग स्पेशलिस्ट के पास जाने को कह सकती हैं। मदद के लिए आप हमारी स्तनपान संस्थाओं की सूची भी देख सकती हैं।

मैस्टाइटिस कितने समय तक रहता है?

यदि इसका पता जल्दी चल जाए, तो मैस्टाइटिस का उपचार आसान और जल्द है और आपको आराम आने में ज्यादा समय भी नहीं लगेगा। यदि आप एंटीबायोटिक का कोर्स शुरु करती हैं, तो सुनिश्चित करें कि यह कोर्स पूरा करें।

यदि आपके स्तन में दर्द रहे और एंटीबायोटिक दवाएं लेने के कुछ दिन बाद भी आपको बुखार रहे तो दोबारा डॉक्टर को दिखाएं। ऐसा किस तरह के बैक्टीरिया की वजह से हो रहा है, यह जानने के लिए हो सकता है आपको टेस्ट करवाने की जरुरत हो। इस तरह आपको सही दवा देना आसान रहेगा।


यदि मुझे मैस्टाइटिस है, तो क्या स्तनपान करवाना बंद कर देना चाहिए?

नहीं, यह जरुरी है कि मैस्टाइटिस होने पर आप स्तनपान करवाना जारी रखें। दूध का प्रवाह बना रहे तो बेहतर है इससे आपको ठीक होने में मदद मिलेगी। हालांकि कई बार ऐसा करने में बहुत दर्द महसूस होगा, मगर आपको शिशु को जितनी बार वह चाहे उतनी ज्यादा बार स्तनपान करवाना होगा।

यदि आपको स्तनपान करवाने में बहुत ही ज्यादा दर्द हो, तो हर बार स्तनपान करवाने से पहले स्तनों पर कई मिनटों तक गर्म सिकाई करें। इससे लेटडाउन रिफ्लेक्स होने में मदद मिलेगी और स्तनपान करवाना आपके लिए सहनीय होगा।

यदि प्रभावित स्तन से शिशु पूरा दूध खत्म न करें या स्तनपान करवाने में बहुत दर्द हो तो आप ब्रेस्ट पंप से दूध एक्सप्रेस कर सकती हैं। यह दूध आप उसे पलड़ाई, कटोरी या बोतल से पिला सकती हैं।

क्या स्तनपान करने पर शिशु पर मैस्टाइटिस का असर होगा?

हालांकि आप अस्वस्थ व असहज महसूस कर सकती हैं, मगर मैस्टाइटिस से आपके शिशु पर असर नहीं होगा। शिशु के लिए आपके प्रभावित स्तन से दूध पीना एकदम सुरक्षित है, मगर उसे दूध सामान्य की तुलना में अधिक नमकीन लग सकता है।

यदि आपको रोगजनक मैस्टाइटिस हो और शिशु दूध में मौजूद बैक्टीरिया भी गटक ले तो भी ये उसके पेट में मौजूद एसिड की वजह से मर जाएंगे।


दोस्तों आपको यह आर्टिकल कैसा लगा हमें जरुर बताये. आप अपनी राय, सवाल और सुझाव हमें comments के जरिये जरुर भेजे. अगर आपको यह आर्टिकल उपयोगी लगा हो तो कृपया इसे share करे।
आप E-mail के द्वारा भी अपना सुझाव दे सकते हैं।
 prakashgoswami03@gmail.com

http://Goswamispecial.blogspot.com

My channel -
https://youtu.be/7FZQJo_oJMc

Like, Subscribe Goswami Channel-
https://youtu.be/5Yy8qiRFyfs

https://youtu.be/KgfIuA6T5AE

https://youtu.be/vymy2E4x8zg

https://youtu.be/KgfIuA6T5AE

https://mobile.twitter.com/Prakash41827790


ऑनलाइन सेवा

गोस्वामी कॉमन सर्विस सेंटर
Goswami Common Service Center

1. सभी प्रकार के ऑनलाइन आवेदन और LIC किस्त जमा किया जाता है
2. सभी प्रकार के ऑनलाइन बिल जमा किए जाते है
3. रूपए ट्रांसफर किए जाते है
4. पीएम किसान सम्मान निधि योजना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाता है
5. सभी प्रकार से ऑनलाइन फॉर्म भरे जाते है।
6. ऑनलाइन एंप्लायमेंट रजिस्ट्रेशन किया जाता है
7. सभी प्रकार के ऑनलाइन फलेक्सी ओर रिचार्ज किए जाते है
8. कुमाऊं यूनिवर्सिटी की ऑनलाइन डिग्री, माइग्रेशन प्रमाण पत्र के लिए अप्लाई
9. कुमाऊं यूनिवर्सिटी ऑनलाइन एडमिशन
10. आरसीआई ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन
11. सीटेट / UTET ओर NET Exam k लिए अप्लाई
12. उत्तराखंड मुक्त विश्व विद्यालय की डिग्री के लिए अप्लाई
13. एग्जाम फॉर्म और बैक एग्जाम फॉर्म
14. ऑनलाइन एडमिशन फॉर्म
15.ऑनलाइन आधार कार्ड बनाने
16. ऑनलाइन स्कॉलरशिप का फॉर्म फिल
17.ऑनलाइन आरडी जमा करने
18.ऑनलाइन पेन कार्ड सेवा
19.ऑनलाइन लाइफ पेंशनर सर्टिफिकेट(जीवित प्रमाण पत्र)
20. ऑनलाइन मैरिज सर्टिफिकेट
21. ऑनलाइन पहचान पत्र बनवाना आदि।
22. PM श्रम योगी मानधन योजना : मासिक 55 रु जमा करने पर हर महीने मिलेंगे 3000 रु


💐💐कृपया सेवा का अवसर दे।🙏🏻🌷🌷
 
   
       
प्रोo - प्रकाश गोस्वामी ई-डिस्ट्रिक्ट उपयोगकर्ता
            9690663544/7253994805


नोट - सभी प्रकार से ऑनलाइन आवेदन के लिए या रजिस्ट्रेशन के लिए वॉट्सएप सेवा ही उपलब्ध है।

मेल आईडी - prakashgoswami03@gmail.com

Blogs-
www.goswamispecial.blogspot.com

New blogs- https://goswamispecialeducator.blogspot.com

YouTube-
https://youtu.be/7FZQJo_oJMc

https://mobile.twitter.com/Prakash41827790

My book link -
https://1drv.ms/w/s!Aob0473_bgN8dCsRYxgMPUVRw98

Thursday, May 28, 2020

संस्कार ही शिष्टाचार व आचरण की जननी

संस्कार ही शिष्टाचार व आचरण की जननी


शिष्टाचार अथवा विनम्रतापूर्वक एवं शालीनता पूर्ण आचरण ही वह आभूषण है जो मनुष्य को आदर व सम्मान दिलाता है। शिष्टाचार, व्यवहार का नैतिक मापदंड जिस पर सभ्यता एवं संस्कृति का भवन निर्माण होता है। एक दूसरे के प्रति सदभावना, सहानुभूति व सहयोग आदि शिष्टाचार के मूल आधार है। शिष्टाचार का क्षेत्र बहुत व्यापक है। जहां-जहां भी एक-दूसरे व्यक्ति से संपर्क होता है वहां शिष्टाचार की जरूरत होती है।

किसी व्यक्ति द्वारा किया गया वह व्यवहार जिससे दूसरे व्यक्ति का सामाजिक हृास हो अथवा जो दूसरे व्यक्ति को व्यवहार अप्रिय लगे वह अशिष्टता कहलाता है। अशिष्टता के बारे में वेदों और पुराणों में भी कुछ पंक्तियां कही गई है।

सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात्, अप्रियम सत्यम न ब्रूयात।

अर्थात सत्य बोलो परंतु प्रिय बोलो। कभी भी असत्य नहीं बोलना चाहिए किन्तु अप्रिय सत्य भी अशिष्टता की ही श्रेणी में आता है। इसी क्रम में एक अप्रिय सत्य जो महाभारत के युद्ध में घटना घटित हुई। द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा मारा तो गया परंतु हाथी जिसके कारण द्रोणाचार्य जैसे गुरु को युद्ध तथा अपने जीवन से पराजित होना पड़ा। परंतु आज के युग में न तो द्रोणाचार्य जैसे गुरु और न ही एकलव्य जैसे शिष्य है। आज बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि युवाओं में शिष्टाचार का अभाव है। आज से पचास वर्ष पूर्व सामूहिक परिवार में बच्चा दादा-दादी, नाना-नानी से श्रीराम, कृष्ण, भगत सिंह आदि की कहानी सुनकर बढ़ा होता था तब बच्चे के अंदर वो सभी गुण इन्हीं आदर्शो के होते थे। नैतिकता जीवन का एक सहज व कुदरती आयाम है। यह ऐसी वस्तु नही है जो शिक्षा से धर्म से अथवा गुरु से भेंट स्वरुप सौंपी जा सके। आज के इस भौतिकवादी व आधुनिक युग में शालीनता दुर्लभ गुण बनकर रह गई है। खेल का मैदान हो या समाज, घर परिवार हो अशिष्टता एवं अनाचार की कीमत हमारे परस्पर संबंधों को चुकानी पड़ती है। हमारी संवेदनाओं पर आघात हुआ है।

युवा पीढ़ी में शिष्टाचार की शिक्षा बेहद जरूरी

अशिष्टता अर्थात सदाचार का न होना। अशिष्टता अनैतिकता का मूल कारण है। बच्चा बचपन से ही शिष्टता माता-पिता से सीखता है। लेकिन वर्तमान समय में व्यस्ततापूर्ण जीवनशैली के कारण माता-पिता बच्चों को पर्याप्त समय नही दे पाते है। जिस कारण बच्चा जाने-अंजाने में अशिष्टता का व्यवहार करने लगता है। वह कहते है कि आधुनिक युग संचार का युग है। सूचनाओं के आदान प्रदान का प्रयोग हम इसके लिए करते है। फेसबुक, ट्वीटर, व्हाटस एप जैसी सोशल साइटस पर हर कोई अपना एकाउंट बनाकर प्रयोग करना चाहता है, जिसमें शिष्टाचार नितांत जरुरी है। हमे अपनी प्रोफाइल की फोटो तथा अन्य फोटो में शिष्टता का ध्यान रखना आवश्यक है।

आज के युग में हम नैतिकता की तो बहुत बात करते है। हमारा जीवन नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण होना चाहिए। समाज सभ्य बने यह हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है। समाज में फैली बुराइयों की वजह से हम नैतिक मूल्यों का हनन कर रहे है। जिसका प्रभाव इस पीढ़ी पर तथा आने वाली पीढि़यों पर भी पड़ेगा। अनैतिकता का मुख्य कारण अशिष्टता है। जो कि समाज में अब व्यापक रुप से फैली हुई है। अब से लगभग दो दशक पूर्व पहले समाज में जो शिष्टता थी तथा भाईचारा था। छोटे बड़े की शर्म थी आज वो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अहंकार की वजह से लोगों में शिष्टता समाप्त होती जा रही है। यदि हमे शिष्ट समाज और सभ्य समाज की स्थापना करनी है तो पूर्ण रुप से नैतिक मूल्यों को समझना होगा।

सत्य ही बनाता है संस्कारवान
सत्य ही वह शिक्षा है जो मानवीय गुणों में समायोजित होकर उसे संस्कारवान बनाती है।

 माता-पिता के रोकने पर बच्चों में अज्ञानता के कारण अशिष्टता की भावना आ जाती है और बच्चे शिष्टाचार को भूल अशिष्ट हो जाते हैं तथा अनैतिक व्यवहार करने लगते है। इसलिए हमे बच्चों को प्यार से समझाकर उन्हें हित और अहित की बातों से अवगत कराना चाहिए तथा उन्हें शिक्षाप्रद बातों के लिए भी प्रेरित करना चाहिए। और एक माता - पिता की पूर्ण रूप से मह्वपूर्ण जिमेदारी होती है कि वो बच्चो को अच्छी शिक्षा और संस्कार दे ताकि बच्चे अच्छी प्रकार से शिष्टाचार व संस्कारवान बन सके।

 शिष्ट या सभ्य पुरुषों का आचरण शिष्टाचार कहलाता है । दूसरों के प्रति अच्छा व्यवहार, घर आने वाले का आदर करना, आवभगत करना, बिना द्वेष और नि:स्वार्थ भाव से किया गया सम्मान शिष्टाचार कहलाता है । ... शिष्टाचार का अंकुर बच्चे के हृदय में बचपन से बोया जाता है । इसका ख्याल माता - पिता को रखना चाहिए क्युकी जिस प्रकार से जैसे शिष्टाचार माता पिता द्वारा सिखाया जाता है उसी पर बच्चे खरे उतरते हैं।


कुछ अन्य मुख्य बातें जिनपर आपका ध्यान होना चाहिए:

सद्भाव कायम करें - जिस तरक्की व नेकी की राह पर चल रहा है वो उस नीति की वजह से ही संपन्न हो पाया है जो किसी को भी मुक्त रूप से ज्ञान उपलब्ध कराती है व किसी को भी किसी प्रतिबन्ध के बिना उसमे और अधिक जानकारी जोड़ने का हक देती है।

सुनहरा उसूल याद रखें - किसी दूसरे व्यक्ति से वैसे ही बर्ताव करे जैसा की आप चाहते है की आप से हो। नए उपयोगकर्ताओ से भी। याद रखे हम सब भी कभी नए थे।

विनम्र रहें - चाहे हालत कुछ भी हो हमेशा विनम्र रहे इससे यह होगा की आपकी बात अंत तक सुनी और समझी जायेगी।

भावों को समझें - यहाँ विकिपीडिया पर हम आपस में वार्ता लिखकर करते है व यह एक अच्छा माध्यम है। पर ध्यान देने वाली बात यह है की शब्द आखिरकार शब्द होते है व कोरे शब्द कई बार असली मंशा व भाव प्रदर्शित नहीं कर पाते या सामने वाले को इसके पीछे की मंशा पर संशय हो सकता है। जितना हो सके खुलकर व सीधे रूप में बात करे। शब्दों के चयन व लिखने के तरीके पे ध्यान दे, ताकि आपके साथी सदस्य पर इसका विपरीत असर न हो।

अपनी पहचान व्यक्त करें - हर बार जब भी आप किसी वार्ता पृष्ठ पर कुछ लिखते है तो अपने हस्ताक्षर ज़रूर छोड़े, पर सिर्फ वार्ताओं पर न की लेखो पर। वो अलग बात है की आप किसी विशेष कारण से अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते हो। पर इससे आपके कहे गए वक्तव्य का भार कम हो सकता है।

समझौते का प्रयास करें - विचारों में मतभेद होना लाज़मी है पर बात बढ़ाने की जगह एक मध्यम रास्ता निकाले और किसी निर्णायक समझौते तक पहुँचे।

तथ्यों पे तर्क करे न की व्यक्तित्व पर - व्यक्ति विशेष को निशाना न बनाये। याद रखे आपका उनके किये गए कार्य से मतभेद हो सकता है पर यह कोई निजी दुश्मनी नहीं है।

बातों का गलत मतलब नहीं निकालें - जो कहा नहीं गया उसे सच ना माने। ज़्यादातर समय जो लिखा गया है वो ही कहा गया है। विभिन पहलुओं की जगह सीधा सोचे।

उचित प्रश्नों की उपेक्षा नहीं करें - सवाल कई तरह के हो सकते है व हो सकता सभी हमें रास नहीं आये या कुछ हमारे खुद के कार्यों की समीक्षा के बारे में हो। याद रखे की उचित प्रश्न जवाब के हक़दार होते हैं।

आपके किये गए संपादन की समीक्षा - अगर कोई अन्य सदस्य आपके द्वारा किये गए संपादन से संतुष्ट नहीं है या उसके खिलाफ है तो वाद-विवाद की जगह तर्कपूर्ण तरीके से यह बात स्पष्ट करे की आपका संपादन सही क्यों है।

अपने विचार रखें - अगर आपके पास किसी विषय के बारे में कोई उत्तर नहीं हो तो उसे स्वीकार करे या अगर आप किसी विषय वस्तु के खिलाफ है तो उसे बताए व वजह साफ़ करे।

सभ्य रहें - चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो हमेशा सभ्य बने रहे। इससे आप सामने वाले का दिल जीत सकते है। हाँ ऐसा करना कई बार मुश्किल हो सकता है वो भी जब वार्ता आपके बारे में या आप की ग़लतियाँ निकालने के लिए हो रही हो। हो सकता है की सामने वाला आप से सभ्य न हो पर आप शालीनता का परिचय दे।

बदतमीजी का जवाब दें पर बदतमीजी से नहीं - ऐसा करने वाले व्यक्ति को बताए की वह क्या गलत कर रहे है व आप इस प्रकार के व्यवहार का जवाब नहीं देंगे व अगर उन्हें आपसे वार्ता जारी रखनी है तो सभ्यता से पेश आये।

क्षमा मांगें - कई बार हम भावना के वश में ऐसी कुछ बाते कर जाते है जिनपर हमें बाद में खेद होता है। अपनी ग़लती स्वीकारें। क्षमा मांगें।

क्षमा करें और भूल जायें - अगर आप किसी को क्षमा कर रहे है तो फिर दिल से उन्हें माफ़ कर दे, व नयी शुरुआत करे। बाद के लिए मन काला नहीं रखे।

अपने पूर्वाग्रहों को समझें - हम में से कोई भी परिपूर्ण नहीं है। अगर आप भी कोई पूर्वाग्रह रखते हो तो उन्हें पहचाने व उनपे काबू रखें।


|||बड़ों का अभिवादन |||

१.बड़ों को कभी तुम मत कहो उन्हें आप कहो और अपने लिए ‘मैं’ का प्रयोग मत करो हम कहो.
२.जो गुरुजन घर में है उन्हें सबेरे उठते ही प्रणाम करो. अपने से बड़े लोग जब मिलें जब उनसे भेंट हो उन्हें प्रणाम करना चाहिए.
३.जहाँ दीपक जलाने पर या मन्दिर में आरती होने पर सायंकाल प्रणाम करने की प्रथा हो वहाँ उस समय भी प्रणाम करना चाहिए.
४. जब किसी नये व्यक्ति से परिचय करया जाय, तब उन्हें प्रणाम करना चाहिए.
५. गुरुजनों को पत्र व्यवहार में भी प्रणाम लिखना चाहिए.
६. प्रणाम करते समय हाथ में कोई वस्तु हो तो उसे बगल में दबाकर या एक ओर रखकर दोनों हाथों से प्रणाम करना चाहिए.
७. चिल्लाकर या पीछे से प्रणाम नहीं करना चाहिए. सामने जाकर शान्ति से प्रणाम करना चाहिए.
८. प्रणाम की उत्तम रीति दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुकाना है. जिस समाज में प्रणाम के समय जो कहने की प्रथा हो, उसी शब्द का व्यवहार करना चाहिए. महात्माओं तथा साधुओं के चरण छूने की प्राचीन प्रथा है.


||| बड़ों का अनुगमन |||


१. अपने से बड़ा कोई पुकारे तो ‘क्या’, ‘ऐं’, ‘हाँ’ नहीं कहना चाहिए . जी हाँ , जी , अथवा आज्ञा कहकर प्रत्युत्तर देना चाहिए .

२.लोगों को बुलाने, पत्र लिखने या चर्चा करने में उनके नाम के आगे ‘श्री’ और अन्त  में ‘जी’ अवश्य लगाओ. इसके अतिरिक्त पंडित, सेठ, बाबू, लाला आदि यदि उपाधि हो तो उसे भी लगाओ.

३. अपने से बड़ों की ओर पैर फैलाकर या पीठ करके मत बैठो. उनकी ओर पैर करके मत सोओ.

४. मार्ग में जब गुरुजनों के साथ चलना हो तो उनके आगे या बराबर मत चलो उनके पीछे चलो. उनके पास कुछ सामान हो तो आग्रह करके उसे स्वयं ले लो. कहीं दरवाजे में से जाना हो तो पहले बड़ों को जाने दो. द्वार बंद है तो आगे बढ़कर खोल दो और आवश्यकता हो तो भीतर प्रकाश कर दो. यदि द्वार पर पर्दा हो तो उसे तब तक उठाये रहो, जब तक वे अंदर न चले जायें.


५. सवारी पर बैठते समय बड़ों को पहले बैठने देना चाहिए. कहीं भी बड़ों के आने पर बैठे हो तो खड़े हो जाओ और उनके बैठ जाने पर ही बैठो. उनसे ऊँचे आसान पर नहीं बैठना चाहिए. बराबर भी मत बैठो. नीचे बैठने को जगह हो तो नीचे बैठो. स्वयं सवारी पर हो या ऊँचे चबूतरे आदि स्थान पर और बड़ों से बात करना हो तो नीचे उतर कर बात करो. वे खड़े हों तो उनसे बैठे बैठे बाते नहीं करनी चाहिए


६. जब कोई आदरणीय व्यक्ति अपने यहाँ आएँ तो कुछ दूर आगे बढ़कर उनका स्वागत करें और जब वे जाने लगें तब सवारी या द्वार तक उन्हें पहुँचाना चाहिए.


||| छोटों के प्रति |||



१. बच्चों को, नौकरों को अथवा किसी को भी ‘तू’ मत कहो. ‘तुम’ या ‘आप’ कहो.


२. जब कोई आपको प्रणाम करे तब उसके प्रणाम का उत्तर प्रणाम करके या जैसे उचित हो अवश्य दो.


३. नौकर को भी भोजन तथा विश्राम के लिए उचित समय दो. बीमारी आदि में उसकी सुविधा का ध्यान रखो. किसीको भी कभी नीच मत समझो.


४. आपके द्वारा आपसे जो छोटे हैं, उन्हें असुविधा न हो यह ध्यान रखना चाहिए. छोटों के आग्रह करने पर भी उनसे अपनी सेवा का काम कम से कम लेना चाहिए.

५. सवारी पर बैठते समय बड़ों को पहले बैठने देना चाहिए. कहीं भी बड़ों के आने पर बैठे हो तो खड़े हो जाओ और उनके बैठ जाने पर ही बैठो. उनसे ऊँचे आसान पर नहीं बैठना चाहिए. बराबर भी मत बैठो. नीचे बैठने को जगह हो तो नीचे बैठो. स्वयं सवारी पर हो या ऊँचे चबूतरे आदि स्थान पर और बड़ों से बात करना हो तो नीचे उतर कर बात करो. वे खड़े हों तो उनसे बैठे बैठे बाते नहीं करनी चाहिए


६. जब कोई आदरणीय व्यक्ति अपने यहाँ आएँ तो कुछ दूर आगे बढ़कर उनका स्वागत करें और जब वे जाने लगें तब सवारी या द्वार तक उन्हें पहुँचाना चाहिए.



||| महिलाओं के प्रति |||



१. अपने से बड़ी स्त्रियों को माता, बराबर वाली को बहिन तथा छोटी को कन्या समझो.

२. बिना जान पहचान के स्त्री से कभी बात करनी ही पड़े तो दृष्टि नीचे करके बात करनी चाहिए. स्त्रियों को घूरना, उनसे हँसी करना उनके प्रति इशारे करना या उनको छूना असभ्यता है, पाप भी है.

३. घर के जिस भाग में स्त्रियाँ रहती हैं, वहाँ बिना सूचना दिये नहीं जाना चाहिए. जहाँ स्त्रियाँ स्नान करती हों, वहाँ नहीं जाना चाहिए. जिस कमरे में कोई स्त्री अकेली हो, सोयी हो, कपड़े पहन रही हो, अपरिचित हो, भोजन कर रही हो, वहाँ भी नहीं जाना चाहिए.


४. गाड़ी, नाव आदि में स्त्रियों को बैठाकर तब बैठना चाहिए. कहीं सवारी में या अन्यत्र जगह की कमी हो और कोई स्त्री वहाँ आये तो उठकर बैठने के लिए स्थान खाली कर देना चाहिए.


||| सर्वसाधारण के प्रति |||


१. यदि किसी के अंग ठीक नहीं नाक या कान या कोई और अंग ठीक नहीं है , अंधा लंगड़ा या कुरूप है अथवा किसी में तुतलानेआदि का कोई स्वभाव है तो उसे चिढ़ाओ मत. उसकी नकल मत करो. कोई स्वयं गिर पड़े या उसकी कोई वस्तु गिर जाये, किसी से कोई भूल हो जाये, तो हँसकर उसे दुखी मत करो. यदि कोई दूसरे प्रान्त का तुम्हारे रहन सहन का पालन नहीं करता है और बोलने के ढंग में भूल करता है. तो उसकी हँसी मत उड़ाओ.


२. कोई रास्ता पूछे तो उसे समझाकर बताओ और संभव हो तो कुछ दूर तक जाकर मार्ग दिखा आओ. कोई चिट्ठी या तार पढ़वाये तो रुक कर पढ़ दो. किसी का भार उससे न उठता हो तो उसके बिना कहे ही उठवा दो. कोई गिर पड़े तो उसे सहायता देकर उठा दो. जिसकी जैसी भी सहायता कर सकते हो, अवश्य करो. किसी की उपेक्षा मत करो.


३. अंधों को अंधा कहने के बदले सूरदास कहना चाहिए. इसी प्रकार किसी में कोई अंग दोष हो तो उसे चिढ़ाना नहीं चाहिए. उसे इस प्रकार बुलाना या पुकारना चाहिए कि उसको बुरा न लगे.


४. किसी भी देश या जाति के झण्डे, राष्ट्रीय गान, धर्म ग्रन्थ अथवा सामान्य महापुरुषों को अपमान कभी मत करो. उनके प्रति आदर प्रकट करो. किसी धर्म पर आक्षेप मत करो.

५. सोये हुए व्यक्ति को जगाना हो तो बहुत धीरे से जगाना चाहिए.


६. किसी से झगड़ा मत करो. कोई किसी बात पर हठ करे व उसकी बातें आपको ठीक न भी लगें, तब भी उसका खण्डन करने का हठ मत करो.


७. मित्रों, पड़ोसियों, परिचतों को भाई, चाचा आदि उचित संबोधनों से पुकारो.


८. दो व्यक्ति झगड़ रहे हों तो उनके झगड़े को बढ़ाने का प्रयास मत करो. दो व्यक्ति परस्पर बातें कर रहे हों तो वहाँ मत आओ और न ही छिपकर उनकी बात सुनने का प्रयास करो. दो आदमी आपस में बैठकर या खड़े होकर बात कर रहे हों तो उनके बीच में मत जाओ.


९. आपने हमें पहचाना. ऐसे प्रश्न करके दूसरों की परीक्ष मत करो. आवश्यकता न हो तो किसी का नाम, गाँव, परिचय मत पूछो और कोई कहीं जा रहा हो तो ‘‘कहाँ जाते हो?” भी मत पूछो.


१०. किसी का पत्र मत पढ़ो और न किसी की कोई गुप्त बात जानने का प्रयास करो.


११. किसी की निन्दा या चुगली मत करो. दूसरों का कोई दोष तुम्हें ज्ञात हो भी जाये तो उसे किसी से मत कहो. किसी ने आपसे दूसरे की निन्दा की हो तो निन्दक का नाम मत बतलाओ.


१२. बिना आवश्यकता के किसी की जाति, आमदनी, वेतन आदि मत पूछो.

१३. कोई अपना परिचित बीमार हो जाय तो उसके पास कई बार जाना चाहिए. वहाँ उतनी ही देर ठहरना चाहिए जिसमें उसे या उसके आस पास के लोगों को कष्ट न हो. उसके रोग की गंभीरता की चर्चा वहाँ नहीं करनी चाहिए और न बिना पूछे औषधि बताने लगना चाहिए.


१४. अपने यहाँ कोई मृत्यु या दुर्घटना हो जाये तो बहुत चिल्लाकर शोक नहीं प्रकट करना चाहिए. किसी परिचित या पड़ोसी के यहाँ मृत्यु या दुर्घटना हो जाये तो वहाँ अवश्य जाना व आश्वासन देना चाहिए.


१५. किसी के घर जाओ तो उसकी वस्तुओं को मत छुओ. वहाँ प्रतीक्षा करनी पड़े तो धैर्य रखो. कोई आपके पास आकर कुछ अधिक देर भी बैठै तो ऐसा भाव मत प्रकट करो कि आप उब गये हैं.


१७. किसी से मिलो तो उसका कम से कम समय लो. केवल आवश्यक बातें ही करो. वहाँ से आना हो तो उसे नम्रतापूर्वक सूचित कर दो. वह अनुरोध करे तो यदि बहुत असुविधा न हो तभी कुछ देर वहाँ रुको.


||| अपने प्रति |||


१. अपने नाम के साथ स्वयं पण्डित, बाबू आदि मत लगाओ.

२. कोई आपको पत्र लिखे तो उसका उत्तर आवश्यक दो. कोई कुछ पूछे तो नम्रतापूर्वक उसे उत्तर दो.

३. कोई कुछ दे तो बायें हाथ से मत लो, दाहिने हाथ से लो और दूसरे को कुछ देना हो तो भी दाहिने हाथ से दो.

४. दूसरों की सेवा करो, पर दूसरों की अनावश्यक सेवा मत लो. किसी का भी उपकार मत लो.

५. किसी की वस्तु तुम्हारे देखते, जानते, गिरे या खो जाये तो उसे दे दो. तुम्हारी गिरी हुई वस्तु कोई उठाकर दे तो उसे धन्यवाद दो. आपको कोई धन्यवाद दे तो नम्रता प्रकट करो.

६. किसी को आपका पैर या धक्का लग जाये तो उससे क्षमा माँगो. कोई आपसे क्षमा माँगे तो विनम्रता पूर्वक उत्तर देना चाहिए, अकड़ना नहीं चाहिए. क्षमा माँगने की कोई बात नहीं अथवा आपसे कोई भूल नहीं हुई कहकर उसे क्षमा करना / उसका सम्मान करना चाहिए.

७. अपने रोग, कष्ट, विपत्ति तथा अपने गुण, अपनी वीरता, सफलता की चर्चा अकारण ही दूसरों से मत करो.

८. झूठ मत बोलो, शपथ मत खाओ और न प्रतीक्षा कराने का स्वभाव बनाओ.

९. किसी को गाली मत दो. क्रोध न करो व मुख से अपशब्द मत निकालो.

१०. यदि किसी के यहाँ अतिथि बनो तो उस घर के लोगों को आपके लिये कोई विशेष प्रबन्ध न करना पड़े ऐसा ध्यान रखो. उनके यहाँ जो भोजनादि मिले, उसकी प्रशंसा करके खाओ. वहाँ जो स्थान आपके रहने को नियत हो वहीं रहो. भोजन के समय उनको आपकी प्रतीक्षा न करनी पड़े. आपके उठने- बैठने आदि से वहाँ के लोगों को असुविधा न हो. आनको जो फल, कार्ड, लिफाफे आदि आवश्यक हों, वह स्वयं खरीद लाओ.

११. किसी से कोई वस्तु लो तो उसे सुरक्षित रखो और काम करके तुरंत लौटा दो. जिस दिन कोई वस्तु लौटाने को कहा गया हो तो उससे पहले ही उसे लौटा देना उत्तम होता है.

१२. किसी के घर जाते या आते समय द्वार बंद करना मत भूलो. किसी की कोई वस्तु उठाओ तो उसे फिर से यथास्थान रख देना चाहिए.


कुछ महत्वपूर्ण ध्यान रखने योग्य बातें।

१. बेझिझक एवं निर्भय होकर अपनी बात को स्पष्ट रूप से बोलें.

२. भाषा में मधुरता, शालीनता व आपसी सद्भावना बनी रहे.

३. दूसरों की बात को भी ध्यान से व पूरी तरह से सुनें, सोचें- विचारें और फिर उत्तर दें. धैर्यपूर्वक किसी को सुनना एक बहुत बड़ा सद्गुण है. बातचीत में अधिक सुनने व कम बोलने के इस सद्गुण का विकास करें. सामने देख कर बात करें. बात करते समय संकोच न रखें, न ही डरें.

४. बोलते समय सामने वाले की रूचि का भी ध्यान रखें. सोच- समझ कर, संतुलित रूप से अपनी बात रखें. बात करते हुए अपने हावभाव व शब्दों पर विशेष ध्यान देते हुए बात करें.

५. बातचीत में हार्दिक सद्भाव व आत्मीयता का भाव बना रहे. हँसी-  ज़ाक में भी शालीनता बनाए रखें.

६. उपयुक्त अवसर देखकर ही बोलें. कम बोलें. धीरे बोलें. अपनी बात को संक्षिप्त और अर्थपूर्ण शब्दों में बताएँ. वाक्यों और शब्दों का सही उच्चारण करें.

७. किसी बात की जानकारी न होने पर धैयपूर्वक, प्रश्न पूछकर अपना ज्ञान बढ़ाएँ.

८. सामने वाला बात में रस न ले रहा हो तो बात का विषय बदल देना अच्छा है.

९. पीठ पीछे किसी की निन्दा मत करो और न सुनो. किसी पर व्यंग मत करो.

१०. केवल कथनी द्वारा ही नहीं वरन करनी द्वारा भी अपनी बात को सिद्ध करें.

११. उचित मार्गदर्शन के लिए स्वयं को उस स्थिति में रखकर सोचें. इससे सही निष्कर्ष पर पहुँच सकेंगे. किसी की गलत बात को सुनकर उसे तुरंत ही अपमानित न कर, उस समय मौन रहें. किसी उचित समय पर उसे अलग से नम्रतापूर्वक समझाएं.

१२. दो लोग बात कर रहे हों तो बीच में न बोलें. बिन मांगी सलाह न दें. समूह में बात हो रही हो तो स्वीकृति लेकर अपनी बात संक्षिप्त में कहना शालीनता है.

१३.प्रिय मित्र, भ्राता श्री, आदरणीया बहनजी, प्यारे भाई, पूज्य दादाजी, श्रद्धेय पिताश्री, वन्दनीया माता जी आदि संबोधनों से अपनी बात को प्रारंभ करें.

१४. मीटिंग के बीच से आवश्यक कार्य से बाहर जाना हो तो नम्रता पूर्वक इजाजत लेकर जाएँ. बहस में भी शांत स्वर में बोलो. चिल्लाने मत लगो. दूर बैठे व्यक्ति के पास जाकर बात करो, चिल्लाओ मत.

१५. बात करते समय किसी के पास एकदम सटो मत और न उसके मुख के पास मुख ले जाओ. दो व्यक्ति बात करते हों तो बीच में मत बोलो.

१६. किसी की ओर अंगुली उठाकर मत दिखाओ. किसी का नाम पूछना हो तो आपका शुभ नाम क्या है. इस प्रकार पूछो किसी का परिचय पूछना हो तो, आपका परिचय? कहकर पूछो. किसी को यह मत कहो कि आप भूल करते हैं. कहो कि आपकी बात मैं ठीक नहीं समझ सका.

१७. जहाँ कई व्यक्ति हो वहाँ काना फूसी मत करो. किसी सांकेतिक या ऐसी भाषा में भी मत बोलो जो आपके बोलचाल की सामान्य भाषा नहीं है और जिसे वे लोग नहीं समझते. रोगी के पास तो एकदम काना फूँसी मत करो, चाहे आपकी बात का रोगी से कोई संबंध हो या न हो.

१८. जो है सो आदि आवृत्ति वाक्य का स्वभाव मत डालो .. बिना पूछे राय मत दो.

१९. बहुत से शब्दों का सीधा प्रयोग भद्दा माना जाता है. मूत्र त्याग के लिए लघुशंका, मल त्याग के लिए दीर्घशंका, मृत्यु के लिए परलोकगमन आदि शब्दों का प्रयोग करना चाहिए.


अगर हम सभी स्वंय और स्वंय के बच्चो को इन सभी बातो का पालन करवाए तो हमारा जीवन पूरी तरह से शिष्टाचार से भर जाता है . शिष्टाचार मनुष्य के व्यक्तित्व का दर्पण होता है. शिष्टाचार ही मनुष्य की एक अलग पहचान करवाता है .शिष्टाचारी मनुष्य समाज में हर जगह सम्मान पाता है- चाहे वह गुरुजन के समक्ष हो परिवार में हो, समाज में हो, व्यवसाय में हो अथवा अपनी मित्र-मण्डली में.  शिष्ट व्यवहार मनुष्य को ऊँचाइयों तक ले जाता है.


शिष्ट व्यवहार के कारण मनुष्य का कठिन-से-कठिन कार्य भी आसान हो जाता है. शिष्टाचारी चाहे कार्यालय में हो अथवा अन्यत्र कहीं, शीघ्र ही लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन जाता हैं. लोग भी उससे बात करने तथा मित्रता करने आदि में रुचि दिखाते हैं. एक शिष्टाचारी मनुष्य अपने साथ के अनेक लोगों को अपने शिष्टाचार से शिष्टाचारी बना देता शिष्टाचार वह ब्रह्मास्त्र है जो अँधेरे में भी अचूक वार करता है- अर्थात् शिष्टाचार अँधेरे में भी आशा की किरण दिखाने वाला मार्ग है.



ऑनलाइन सेवा

गोस्वामी कॉमन सर्विस सेंटर
Goswami Common Service Center

1. सभी प्रकार के ऑनलाइन आवेदन और LIC किस्त जमा किया जाता है
2. सभी प्रकार के ऑनलाइन बिल जमा किए जाते है
3. रूपए ट्रांसफर किए जाते है
4. पीएम किसान सम्मान निधि योजना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाता है
5. सभी प्रकार से ऑनलाइन फॉर्म भरे जाते है।
6. ऑनलाइन एंप्लायमेंट रजिस्ट्रेशन किया जाता है
7. सभी प्रकार के ऑनलाइन फलेक्सी ओर रिचार्ज किए जाते है
8. कुमाऊं यूनिवर्सिटी की ऑनलाइन डिग्री, माइग्रेशन प्रमाण पत्र के लिए अप्लाई
9. कुमाऊं यूनिवर्सिटी ऑनलाइन एडमिशन
10. आरसीआई ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन
11. सीटेट / UTET ओर NET Exam k लिए अप्लाई
12. उत्तराखंड मुक्त विश्व विद्यालय की डिग्री के लिए अप्लाई
13. एग्जाम फॉर्म और बैक एग्जाम फॉर्म
14. ऑनलाइन एडमिशन फॉर्म
15.ऑनलाइन आधार कार्ड बनाने
16. ऑनलाइन स्कॉलरशिप का फॉर्म फिल
17.ऑनलाइन आरडी जमा करने
18.ऑनलाइन पेन कार्ड सेवा
19.ऑनलाइन लाइफ पेंशनर सर्टिफिकेट(जीवित प्रमाण पत्र)
20. ऑनलाइन मैरिज सर्टिफिकेट
21. ऑनलाइन पहचान पत्र बनवाना आदि।
22. PM श्रम योगी मानधन योजना : मासिक 55 रु जमा करने पर हर महीने मिलेंगे 3000 रु


💐💐कृपया सेवा का अवसर दे।🙏🏻🌷🌷
   
     
       
प्रोo - प्रकाश गोस्वामी ई-डिस्ट्रिक्ट उपयोगकर्ता
            9690663544/7253994805


नोट - सभी प्रकार से ऑनलाइन आवेदन के लिए या रजिस्ट्रेशन के लिए वॉट्सएप सेवा ही उपलब्ध है।

मेल आईडी - prakashgoswami03@gmail.com

Blogs-
www.goswamispecial.blogspot.com

New blogs- https://goswamispecialeducator.blogspot.com

YouTube-
https://youtu.be/7FZQJo_oJMc

https://mobile.twitter.com/Prakash41827790

Sunday, May 24, 2020

The Medical Council of India (MCI)


The Medical Council of India (MCI)

भारतीय चिकित्सा परिषद

भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (Medical Council of India) की स्थापना, भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1933 के अंतर्गत 1934 में की गई थी। इसका मुख्य कार्य चिकित्सा के क्षेत्र में उच्च शिक्षा हेतु तथा भारत व विदेशों की चिकित्सा योग्यता की मान्यता के लिए समान मानकों को स्थापित करना था, अब इसे निरस्त कर दिया गया है।

                      भारतीय चिकित्सा परिषद 

संक्षेपाक्षर    -  MCI
स्थापना         -  1933
मुख्यालय       -  नयी दिल्ली
मुख्य अंग       -  Council
सम्बन्धन        -  स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, स्वास्थ एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
जालस्थल   - आधिकारिक जालघर
टिप्पणियाँ   - डॉ जयश्रीबेन मेहता (अध्यक्ष)


भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात मेडिकल कॉलेजों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती रही है। इसलिए यह महसूस किया गया कि देश में चिकित्सा शिक्षा में तेजी से हो रहे विकास और प्रगति के कारण उत्पन्न हुई चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम के प्रावधान पर्याप्त नहीं थे। परिणामस्वरूप, 1956 में पुराने अधिनियम को निरस्त कर दिया गया और एक नया अधिनियम बनाया गया। इस अधिनियम को आगे भी 1964, 1993 और 2001 में संशोधित किया गया।


 उद्देश्य

इस परिषद् के उद्देश्य निम्नानुसार हैं :-

1.चिकित्सक शिक्षा में स्नातक पूर्व और स्नातकोत्तर दोनों स्तर पर एक समान मानकों को बनाए रखना,

2.भारत के या विदेशों के मेडिकल संस्थानों की चिकित्सकीय योग्यता की मान्यता / अमान्यता के लिए सिफारिश करना,

3.मान्यताप्राप्त चिकित्सा योग्यता रखने वाले डॉक्टरों का स्थायी पंजीकरण/ अस्थायी पंजीकरण करना,

4.चिकित्सकीय योग्यता की पारस्परिक मान्यता के मामले में विदेशी देशों के साथ पारस्परिक आदान-प्रदान बनाना।

विवाद

22 अप्रैल 2010 को केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा भारतीय चिकित्सा परिषद के अध्यक्ष केतन देसाई की गिरफ्तारी के बाद भारत के राष्ट्रपति ने 15 मई 2010 को MCI को भंग कर दिया। सीबीआई ने देसाई के परिसरों से 1.5 किलोग्राम सोना और 80 किलो चांदी बरामद की थी। इसके अलावा, अहमदाबाद में देसाई के बैंक लॉकरों से 35 लाख का सोना बरामद किया गया। बी जे मेडिकल कॉलेज में मूत्रविज्ञान के प्रमुख और गुजरात मेडिकल काउंसिल के अध्यक्ष केतन देसाई को सीबीआई ने एक निजी कॉलेज को मान्यता देने के लिए 2 करोड़ की रिश्वत लेने के आरोप में पकड़ा था। उन्हें तुरंत मेडिकल काउंसिल से हटा दिया गया और उनका पंजीकरण रद्द कर दिया गया।

06 जनवरी 2019 को लोकसभा ने भारतीय चिकित्सा परिषद (संशोधन) विधेयक, 2018 पारित कर दिया। विधेयक, प्रख्यात पेशेवरों के एक पैनल को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया चलाने की अनुमति देगा, ताकि चिकित्सा शिक्षा को सर्वोत्तम तरीके से विनियमित किया जा सके। स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने कहा कि इस विधेयक ने एमसीआई और बोर्ड की शक्तियों को बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में निहित कर दिया है। यह बोर्ड परिषद का गठन होने तक अपना काम करेगा। भारतीय चिकित्सा परिषद को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से प्रतिस्थापित करने वाला एक अन्य विधेयक संसद में लंबित है।

एमसीआई ऑनलाइन
एमसीआई ऑनलाइन (MCIOnline)यह पंजीकरण के लिए आवेदनों की ऑनलाइन प्रसंस्करण (चिकित्सा योग्यता में) के लिए और व्यावसायिक प्रमाणपत्रों के लिए भारतीय चिकित्सा परिषद का पोर्टल है। "MCI ऑनलाइन" भारतीय मेडिकल रेजिस्टेंट की ऑनलाइन खोज भी प्रदान करता है।



दोस्तों आपको यह आर्टिकल कैसा लगा हमें जरुर बताये. आप अपनी राय, सवाल और सुझाव हमें comments के जरिये जरुर भेजे. अगर आपको यह आर्टिकल उपयोगी लगा हो तो कृपया इसे share करे।
आप E-mail के द्वारा भी अपना सुझाव दे सकते हैं।
 prakashgoswami03@gmail.com

http://Goswamispecial.blogspot.com

My channel -
https://youtu.be/7FZQJo_oJMc

Like, Subscribe Goswami Channel-
https://youtu.be/5Yy8qiRFyfs

https://youtu.be/KgfIuA6T5AE

https://youtu.be/vymy2E4x8zg

https://youtu.be/KgfIuA6T5AE

https://mobile.twitter.com/Prakash41827790

Saturday, May 23, 2020

संस्‍कारी और सुशील बहु गुण


 संस्‍कारी और सुशील बहु गुण



हमारे देश में, महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ-साथ रिश्‍तों और नातों को बनाएं रखने की जिम्‍मेदारी भी आ जाती है। शादी के बाद हर बहु से संस्‍कारी बहु होने की उम्‍मीद की जाती है।

अगर आप 20-25 वर्ष की आयु वाली अवस्‍था में है तो घर-परिवार के लोगों की पूरी कोशिश, आपको सभ्‍य और संस्‍कारी बनने में लग जाती है।

हाल ही में भारतीय परिवेश को ध्‍यान में रखकर एक सर्वे किया गया, और सर्वे में मालूम चला कि संस्‍कारी ब‍हु में क्‍या गुण होते है और कौनसी बातें उन्‍हें संस्‍कारी बनाती है।


1. सिर पर पल्‍ला ढंकना

हर भारतीय बहु से उम्‍मीद की जाती है कि वो सिर पर पल्‍लू रखे। यह एक भारतीय महिला का शिष्टाचार एवं परम धर्म होता है।

2.नरम स्‍वभाव

बहु हमेशा नरम स्‍वभाव की होनी चाहिए। जब वो बोले तो नम्रता उसकी बोली में दिखाई देनी चाहिए।


3. शर्मीली

हमारे यहां शर्म को लड़कियों का प्राकृतिक गहना माना जाता है। इसलिए बहु सदैव शर्मीली होनी चाहिए।

4. मधुर वाणी

हर बहू से यही उम्मीद की जाती है कि उसकी वाणी में मधुर स्वर होना चाहिए। ताकि सामने वाले उसकी वाणी सुनने के लिए उत्सुक हो।

5. शराब न पीएं

शराब पीने वाली लड़कियों को अच्‍छी नज़र से नहीं देखा जाता है और न ही ऐसी बहूओं को परिवार में स्‍वीकार किया जाता है।

6.चिडियां जैसे खाएं -

जो बहुएं कम खाती है उन्‍हें बेहद ही अच्‍छा माना जाता है।


7. रोटी बनाना -

अच्‍छी और संस्‍कारी बहुओं को गोल-गोल रोटियां बनानी जरूर आनी चाहिए।

8. न नहीं बोलती -

अच्‍छी बहु किसी भी काम के लिए न नहीं बोलती हैं।


9. हिंदी सिनेमा

अच्‍छी बहुएं सिर्फ बॉलीवुड मूवीज ही देखती है।


10. पराम्‍पराओं को मानने वाली-

परम्‍पराओं, रूढिवादिता और पुरानी मान्‍यताओं को मानने वाली लड़कियां सबसे अच्‍छी बहु मानी जाती है।

11. अपने परिवार व प्रति प्रेम भाव

एक सुशील और गुणवंती बहू का परम कर्त्तव्य होता है कि अपने परिवार के प्रति प्रेम भावना बनाए रखें। ताकि अपने ससुराल व माके का मान मर्यादा का ख्याल रखे।

भारत में अच्‍छी बहुओं की यहीं परिभाषा आदि काल से चली आ रही है। और इन तरीकों से आप एक अच्‍छी बहु बन सकती है।



एक अच्छी बहू बनने के बिंदास टिप्स


जब भी कोई लड़की शादी करके ससुराल जाती है तो उसके मन में कई सवाल होते हैं कि क्या वो उन रिश्तों को और इनकी ज़िम्मेदारियों को अच्छे से निभा पायेगी? इस तरह के न जाने कितने सवाल और मन में कई उलझनें होती हैं। जिनका जवाब आपके प्यार, विश्वास और समझ पर निर्भर करता है। शादी एक ऐसा बंधन है जिसमें जीवन के अंतिम समय तक प्यार और विश्वास क़ायम रहता है । एक औरत चाहे तो अपने रिश्ते को बिगाड़ सकती है और चाहे तो अपनी सूझबूझ से इस रिश्ते को कभी न टूटने वाले पक्के धागे में पिरोकर रख सकती है। हर लड़की चाहती है कि वह एक अच्छी बहू बने, इसके लिए बस मेरे इन टिप्स को अपनाएं और एक प्यारी बहू बन जाएं।


एक अच्छी बहू बनने के लिए ज़रूरी है –

1. सभी रिश्तों को सम्मान दें

सबसे पहले ससुराल में अपने सास-ससुर को माता-पिता की तरह सम्मान दें और देवर-ननद को भाई-बहन जैसा असीम प्रेम और स्नेह दें और जेठ और जेठानी को भाई और भाभी की तरह मान दें।

2. पसंद और न पसंद का विशेष ध्यान रखें

ससुराल में परिवार के प्रत्येक सदस्य की पसंद-नापसंद का विशेष ध्यान रखें और कभी भी शिक़ायत का मौका न दें।

3. पति को समझने का प्रयास करें

आपके पति जिस पर घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ हैं। अगर वह आपके लिए समय न निकाल पा रहे हों तो ग़ुस्से या ज़िद में उन्हें कोई ग़लत बात न कहें। वह आपके अपने हैं और सारी ज़िंदगी आपके ही रहने वाले हैं। उनके साथ समय बिताने के लिए पूरी रात आपकी अपनी है। इसलिए अपनी पति की इज़्ज़त करें, उन्हें ख़ूब प्यार करें व उनकी हर ज़रूरत का पूरा ध्यान रखें ।

4. परिवार को अपनेपन का एहसास करायें

यदि आप अपने पति के साथ कहीं बाहर घूमने जा रही हैं तो घर आते समय सबके लिए कुछ खाने का सामान लेकर आएं। ऐसे में सब को यही लगेगा कि आपको इस परिवार का बहुत ख़याल है ।

5. परिवार की बातों को इधर से उधर कहने से बचें

परिवार में छोटी छोटी नोक झोक और सौ तरह की बातें होना स्वाभाविक हैं, लेकिन इन बातों को पर्दे में रखना बेहद ज़रूर है। कभी भी ससुराल की बातें मायके में और मायके की बातें ससुराल में न करें ताकि आपके परिवार का आप पर विश्वास मज़बूत हो सकें।

6. ससुराल की सभी रीति रिवाज को सीखने का प्रयास करें

एक अच्छी बहू के रूप में घर के सभी रीति-रिवाज़ों को पूरी श्रद्धा से सीखें और उसे निभाने का प्रयास करें। अपनी सास से सभी त्यौहारों को पूजने की विधि और पकवान आदि को बनाने के बारे में भी सीखें।

7. परिवार का दिल जीतने का प्रयास करें

यदि आप खाना बनाने में निपुण हैं तो आप अपने इस हुनर का उपयोग कर परिवार का दिल जीतने का प्रयास करें क्योंकि किसी के दिल जीतने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है इसलिए नए-नए व्यंजन बना कर सब का दिल जीतने की कोशिश करें।

8. मायके की तारीफ़ बढ़ चढ़ कर ससुराल में न करें

मायके से मिले सामान की तारीफ़ और अमीरी की डींगें न हांकें। अपनी सास को अपनी दोस्त, माँ और हमराज बनाकर रखें और आप भी पूरी ईमानदारी के साथ उनसे ये रिश्ता निभाएं।

9. सास को माँ समझे

यदि आपकी सास कभी आपको डांट दें तो उन्हें पलट कर कभी जवाब न दें। सोचें कि जब आपकी माँ आपको डांटती थी तो आप उनकी डांट को भी प्यार समझती थी तो यदि आपकी सास आपको कुछ समझा रही हैं तो बजाय ग़ुस्सा करने के उनकी बातें ध्यान से सुने, आख़िर वे भी आपकी माँ की तरह आपके भले की ही बात कर रही होती हैं ।

10. सही परिधान पहनें

फ़ैशन के नाम पर कभी भी ऐसा कुछ न पहनें जिसे देखकर घर के बड़े असहज महसूस करें। चाहे वे कुछ भी न कहें लेकिन आप स्वयं अपने परिधानों के प्रति सतर्क रहें ।
मित्रों अगर आप अपने जीवन में छल-कपट से दूर, प्यार और विश्वास के रंग भरेंगी तो आप सबकी पसंदीदा एक अच्छी बहू बन जाएंगी और सब आपको बहुत ज़्यादा प्यार करेंगे।


ऑनलाइन सेवा

गोस्वामी कॉमन सर्विस सेंटर
Goswami Common Service Center

1. सभी प्रकार के ऑनलाइन आवेदन और LIC किस्त जमा किया जाता है
2. सभी प्रकार के ऑनलाइन बिल जमा किए जाते है
3. रूपए ट्रांसफर किए जाते है
4. पीएम किसान सम्मान निधि योजना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाता है
5. सभी प्रकार से ऑनलाइन फॉर्म भरे जाते है।
6. ऑनलाइन एंप्लायमेंट रजिस्ट्रेशन किया जाता है
7. सभी प्रकार के ऑनलाइन फलेक्सी ओर रिचार्ज किए जाते है
8. कुमाऊं यूनिवर्सिटी की ऑनलाइन डिग्री, माइग्रेशन प्रमाण पत्र के लिए अप्लाई
9. कुमाऊं यूनिवर्सिटी ऑनलाइन एडमिशन
10. आरसीआई ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन
11. सीटेट / UTET ओर NET Exam k लिए अप्लाई
12. उत्तराखंड मुक्त विश्व विद्यालय की डिग्री के लिए अप्लाई
13. एग्जाम फॉर्म और बैक एग्जाम फॉर्म
14. ऑनलाइन एडमिशन फॉर्म
15.ऑनलाइन आधार कार्ड बनाने
16. ऑनलाइन स्कॉलरशिप का फॉर्म फिल
17.ऑनलाइन आरडी जमा करने
18.ऑनलाइन पेन कार्ड सेवा
19.ऑनलाइन लाइफ पेंशनर सर्टिफिकेट(जीवित प्रमाण पत्र)
20. ऑनलाइन मैरिज सर्टिफिकेट
21. ऑनलाइन पहचान पत्र बनवाना आदि।

💐💐कृपया सेवा का अवसर दे।🙏🏻🌷🌷
   
     
       
प्रोo - प्रकाश गोस्वामी ई-डिस्ट्रिक्ट उपयोगकर्ता
            9690663544/7253994805


नोट - सभी प्रकार से ऑनलाइन आवेदन के लिए या रजिस्ट्रेशन के लिए वॉट्सएप सेवा ही उपलब्ध है।

मेल आईडी - prakashgoswami03@gmail.com

Blogs-
www.goswamispecial.blogspot.com

YouTube-
https://youtu.be/7FZQJo_oJMc

https://mobile.twitter.com/Prakash41827790