संस्कार ही शिष्टाचार व आचरण की जननी
शिष्टाचार अथवा विनम्रतापूर्वक एवं शालीनता पूर्ण आचरण ही वह आभूषण है जो मनुष्य को आदर व सम्मान दिलाता है। शिष्टाचार, व्यवहार का नैतिक मापदंड जिस पर सभ्यता एवं संस्कृति का भवन निर्माण होता है। एक दूसरे के प्रति सदभावना, सहानुभूति व सहयोग आदि शिष्टाचार के मूल आधार है। शिष्टाचार का क्षेत्र बहुत व्यापक है। जहां-जहां भी एक-दूसरे व्यक्ति से संपर्क होता है वहां शिष्टाचार की जरूरत होती है।
किसी व्यक्ति द्वारा किया गया वह व्यवहार जिससे दूसरे व्यक्ति का सामाजिक हृास हो अथवा जो दूसरे व्यक्ति को व्यवहार अप्रिय लगे वह अशिष्टता कहलाता है। अशिष्टता के बारे में वेदों और पुराणों में भी कुछ पंक्तियां कही गई है।
सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात्, अप्रियम सत्यम न ब्रूयात।
अर्थात सत्य बोलो परंतु प्रिय बोलो। कभी भी असत्य नहीं बोलना चाहिए किन्तु अप्रिय सत्य भी अशिष्टता की ही श्रेणी में आता है। इसी क्रम में एक अप्रिय सत्य जो महाभारत के युद्ध में घटना घटित हुई। द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा मारा तो गया परंतु हाथी जिसके कारण द्रोणाचार्य जैसे गुरु को युद्ध तथा अपने जीवन से पराजित होना पड़ा। परंतु आज के युग में न तो द्रोणाचार्य जैसे गुरु और न ही एकलव्य जैसे शिष्य है। आज बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि युवाओं में शिष्टाचार का अभाव है। आज से पचास वर्ष पूर्व सामूहिक परिवार में बच्चा दादा-दादी, नाना-नानी से श्रीराम, कृष्ण, भगत सिंह आदि की कहानी सुनकर बढ़ा होता था तब बच्चे के अंदर वो सभी गुण इन्हीं आदर्शो के होते थे। नैतिकता जीवन का एक सहज व कुदरती आयाम है। यह ऐसी वस्तु नही है जो शिक्षा से धर्म से अथवा गुरु से भेंट स्वरुप सौंपी जा सके। आज के इस भौतिकवादी व आधुनिक युग में शालीनता दुर्लभ गुण बनकर रह गई है। खेल का मैदान हो या समाज, घर परिवार हो अशिष्टता एवं अनाचार की कीमत हमारे परस्पर संबंधों को चुकानी पड़ती है। हमारी संवेदनाओं पर आघात हुआ है।
युवा पीढ़ी में शिष्टाचार की शिक्षा बेहद जरूरी
अशिष्टता अर्थात सदाचार का न होना। अशिष्टता अनैतिकता का मूल कारण है। बच्चा बचपन से ही शिष्टता माता-पिता से सीखता है। लेकिन वर्तमान समय में व्यस्ततापूर्ण जीवनशैली के कारण माता-पिता बच्चों को पर्याप्त समय नही दे पाते है। जिस कारण बच्चा जाने-अंजाने में अशिष्टता का व्यवहार करने लगता है। वह कहते है कि आधुनिक युग संचार का युग है। सूचनाओं के आदान प्रदान का प्रयोग हम इसके लिए करते है। फेसबुक, ट्वीटर, व्हाटस एप जैसी सोशल साइटस पर हर कोई अपना एकाउंट बनाकर प्रयोग करना चाहता है, जिसमें शिष्टाचार नितांत जरुरी है। हमे अपनी प्रोफाइल की फोटो तथा अन्य फोटो में शिष्टता का ध्यान रखना आवश्यक है।
आज के युग में हम नैतिकता की तो बहुत बात करते है। हमारा जीवन नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण होना चाहिए। समाज सभ्य बने यह हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है। समाज में फैली बुराइयों की वजह से हम नैतिक मूल्यों का हनन कर रहे है। जिसका प्रभाव इस पीढ़ी पर तथा आने वाली पीढि़यों पर भी पड़ेगा। अनैतिकता का मुख्य कारण अशिष्टता है। जो कि समाज में अब व्यापक रुप से फैली हुई है। अब से लगभग दो दशक पूर्व पहले समाज में जो शिष्टता थी तथा भाईचारा था। छोटे बड़े की शर्म थी आज वो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अहंकार की वजह से लोगों में शिष्टता समाप्त होती जा रही है। यदि हमे शिष्ट समाज और सभ्य समाज की स्थापना करनी है तो पूर्ण रुप से नैतिक मूल्यों को समझना होगा।
सत्य ही बनाता है संस्कारवान
सत्य ही वह शिक्षा है जो मानवीय गुणों में समायोजित होकर उसे संस्कारवान बनाती है।
माता-पिता के रोकने पर बच्चों में अज्ञानता के कारण अशिष्टता की भावना आ जाती है और बच्चे शिष्टाचार को भूल अशिष्ट हो जाते हैं तथा अनैतिक व्यवहार करने लगते है। इसलिए हमे बच्चों को प्यार से समझाकर उन्हें हित और अहित की बातों से अवगत कराना चाहिए तथा उन्हें शिक्षाप्रद बातों के लिए भी प्रेरित करना चाहिए। और एक माता - पिता की पूर्ण रूप से मह्वपूर्ण जिमेदारी होती है कि वो बच्चो को अच्छी शिक्षा और संस्कार दे ताकि बच्चे अच्छी प्रकार से शिष्टाचार व संस्कारवान बन सके।
शिष्ट या सभ्य पुरुषों का आचरण शिष्टाचार कहलाता है । दूसरों के प्रति अच्छा व्यवहार, घर आने वाले का आदर करना, आवभगत करना, बिना द्वेष और नि:स्वार्थ भाव से किया गया सम्मान शिष्टाचार कहलाता है । ... शिष्टाचार का अंकुर बच्चे के हृदय में बचपन से बोया जाता है । इसका ख्याल माता - पिता को रखना चाहिए क्युकी जिस प्रकार से जैसे शिष्टाचार माता पिता द्वारा सिखाया जाता है उसी पर बच्चे खरे उतरते हैं।
कुछ अन्य मुख्य बातें जिनपर आपका ध्यान होना चाहिए:
सद्भाव कायम करें - जिस तरक्की व नेकी की राह पर चल रहा है वो उस नीति की वजह से ही संपन्न हो पाया है जो किसी को भी मुक्त रूप से ज्ञान उपलब्ध कराती है व किसी को भी किसी प्रतिबन्ध के बिना उसमे और अधिक जानकारी जोड़ने का हक देती है।
सुनहरा उसूल याद रखें - किसी दूसरे व्यक्ति से वैसे ही बर्ताव करे जैसा की आप चाहते है की आप से हो। नए उपयोगकर्ताओ से भी। याद रखे हम सब भी कभी नए थे।
विनम्र रहें - चाहे हालत कुछ भी हो हमेशा विनम्र रहे इससे यह होगा की आपकी बात अंत तक सुनी और समझी जायेगी।
भावों को समझें - यहाँ विकिपीडिया पर हम आपस में वार्ता लिखकर करते है व यह एक अच्छा माध्यम है। पर ध्यान देने वाली बात यह है की शब्द आखिरकार शब्द होते है व कोरे शब्द कई बार असली मंशा व भाव प्रदर्शित नहीं कर पाते या सामने वाले को इसके पीछे की मंशा पर संशय हो सकता है। जितना हो सके खुलकर व सीधे रूप में बात करे। शब्दों के चयन व लिखने के तरीके पे ध्यान दे, ताकि आपके साथी सदस्य पर इसका विपरीत असर न हो।
अपनी पहचान व्यक्त करें - हर बार जब भी आप किसी वार्ता पृष्ठ पर कुछ लिखते है तो अपने हस्ताक्षर ज़रूर छोड़े, पर सिर्फ वार्ताओं पर न की लेखो पर। वो अलग बात है की आप किसी विशेष कारण से अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते हो। पर इससे आपके कहे गए वक्तव्य का भार कम हो सकता है।
समझौते का प्रयास करें - विचारों में मतभेद होना लाज़मी है पर बात बढ़ाने की जगह एक मध्यम रास्ता निकाले और किसी निर्णायक समझौते तक पहुँचे।
तथ्यों पे तर्क करे न की व्यक्तित्व पर - व्यक्ति विशेष को निशाना न बनाये। याद रखे आपका उनके किये गए कार्य से मतभेद हो सकता है पर यह कोई निजी दुश्मनी नहीं है।
बातों का गलत मतलब नहीं निकालें - जो कहा नहीं गया उसे सच ना माने। ज़्यादातर समय जो लिखा गया है वो ही कहा गया है। विभिन पहलुओं की जगह सीधा सोचे।
उचित प्रश्नों की उपेक्षा नहीं करें - सवाल कई तरह के हो सकते है व हो सकता सभी हमें रास नहीं आये या कुछ हमारे खुद के कार्यों की समीक्षा के बारे में हो। याद रखे की उचित प्रश्न जवाब के हक़दार होते हैं।
आपके किये गए संपादन की समीक्षा - अगर कोई अन्य सदस्य आपके द्वारा किये गए संपादन से संतुष्ट नहीं है या उसके खिलाफ है तो वाद-विवाद की जगह तर्कपूर्ण तरीके से यह बात स्पष्ट करे की आपका संपादन सही क्यों है।
अपने विचार रखें - अगर आपके पास किसी विषय के बारे में कोई उत्तर नहीं हो तो उसे स्वीकार करे या अगर आप किसी विषय वस्तु के खिलाफ है तो उसे बताए व वजह साफ़ करे।
सभ्य रहें - चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो हमेशा सभ्य बने रहे। इससे आप सामने वाले का दिल जीत सकते है। हाँ ऐसा करना कई बार मुश्किल हो सकता है वो भी जब वार्ता आपके बारे में या आप की ग़लतियाँ निकालने के लिए हो रही हो। हो सकता है की सामने वाला आप से सभ्य न हो पर आप शालीनता का परिचय दे।
बदतमीजी का जवाब दें पर बदतमीजी से नहीं - ऐसा करने वाले व्यक्ति को बताए की वह क्या गलत कर रहे है व आप इस प्रकार के व्यवहार का जवाब नहीं देंगे व अगर उन्हें आपसे वार्ता जारी रखनी है तो सभ्यता से पेश आये।
क्षमा मांगें - कई बार हम भावना के वश में ऐसी कुछ बाते कर जाते है जिनपर हमें बाद में खेद होता है। अपनी ग़लती स्वीकारें। क्षमा मांगें।
क्षमा करें और भूल जायें - अगर आप किसी को क्षमा कर रहे है तो फिर दिल से उन्हें माफ़ कर दे, व नयी शुरुआत करे। बाद के लिए मन काला नहीं रखे।
अपने पूर्वाग्रहों को समझें - हम में से कोई भी परिपूर्ण नहीं है। अगर आप भी कोई पूर्वाग्रह रखते हो तो उन्हें पहचाने व उनपे काबू रखें।
|||बड़ों का अभिवादन |||
१.बड़ों को कभी तुम मत कहो उन्हें आप कहो और अपने लिए ‘मैं’ का प्रयोग मत करो हम कहो.
२.जो गुरुजन घर में है उन्हें सबेरे उठते ही प्रणाम करो. अपने से बड़े लोग जब मिलें जब उनसे भेंट हो उन्हें प्रणाम करना चाहिए.
३.जहाँ दीपक जलाने पर या मन्दिर में आरती होने पर सायंकाल प्रणाम करने की प्रथा हो वहाँ उस समय भी प्रणाम करना चाहिए.
४. जब किसी नये व्यक्ति से परिचय करया जाय, तब उन्हें प्रणाम करना चाहिए.
५. गुरुजनों को पत्र व्यवहार में भी प्रणाम लिखना चाहिए.
६. प्रणाम करते समय हाथ में कोई वस्तु हो तो उसे बगल में दबाकर या एक ओर रखकर दोनों हाथों से प्रणाम करना चाहिए.
७. चिल्लाकर या पीछे से प्रणाम नहीं करना चाहिए. सामने जाकर शान्ति से प्रणाम करना चाहिए.
८. प्रणाम की उत्तम रीति दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुकाना है. जिस समाज में प्रणाम के समय जो कहने की प्रथा हो, उसी शब्द का व्यवहार करना चाहिए. महात्माओं तथा साधुओं के चरण छूने की प्राचीन प्रथा है.
||| बड़ों का अनुगमन |||
१. अपने से बड़ा कोई पुकारे तो ‘क्या’, ‘ऐं’, ‘हाँ’ नहीं कहना चाहिए . जी हाँ , जी , अथवा आज्ञा कहकर प्रत्युत्तर देना चाहिए .
२.लोगों को बुलाने, पत्र लिखने या चर्चा करने में उनके नाम के आगे ‘श्री’ और अन्त में ‘जी’ अवश्य लगाओ. इसके अतिरिक्त पंडित, सेठ, बाबू, लाला आदि यदि उपाधि हो तो उसे भी लगाओ.
३. अपने से बड़ों की ओर पैर फैलाकर या पीठ करके मत बैठो. उनकी ओर पैर करके मत सोओ.
४. मार्ग में जब गुरुजनों के साथ चलना हो तो उनके आगे या बराबर मत चलो उनके पीछे चलो. उनके पास कुछ सामान हो तो आग्रह करके उसे स्वयं ले लो. कहीं दरवाजे में से जाना हो तो पहले बड़ों को जाने दो. द्वार बंद है तो आगे बढ़कर खोल दो और आवश्यकता हो तो भीतर प्रकाश कर दो. यदि द्वार पर पर्दा हो तो उसे तब तक उठाये रहो, जब तक वे अंदर न चले जायें.
५. सवारी पर बैठते समय बड़ों को पहले बैठने देना चाहिए. कहीं भी बड़ों के आने पर बैठे हो तो खड़े हो जाओ और उनके बैठ जाने पर ही बैठो. उनसे ऊँचे आसान पर नहीं बैठना चाहिए. बराबर भी मत बैठो. नीचे बैठने को जगह हो तो नीचे बैठो. स्वयं सवारी पर हो या ऊँचे चबूतरे आदि स्थान पर और बड़ों से बात करना हो तो नीचे उतर कर बात करो. वे खड़े हों तो उनसे बैठे बैठे बाते नहीं करनी चाहिए
६. जब कोई आदरणीय व्यक्ति अपने यहाँ आएँ तो कुछ दूर आगे बढ़कर उनका स्वागत करें और जब वे जाने लगें तब सवारी या द्वार तक उन्हें पहुँचाना चाहिए.
||| छोटों के प्रति |||
१. बच्चों को, नौकरों को अथवा किसी को भी ‘तू’ मत कहो. ‘तुम’ या ‘आप’ कहो.
२. जब कोई आपको प्रणाम करे तब उसके प्रणाम का उत्तर प्रणाम करके या जैसे उचित हो अवश्य दो.
३. नौकर को भी भोजन तथा विश्राम के लिए उचित समय दो. बीमारी आदि में उसकी सुविधा का ध्यान रखो. किसीको भी कभी नीच मत समझो.
४. आपके द्वारा आपसे जो छोटे हैं, उन्हें असुविधा न हो यह ध्यान रखना चाहिए. छोटों के आग्रह करने पर भी उनसे अपनी सेवा का काम कम से कम लेना चाहिए.
५. सवारी पर बैठते समय बड़ों को पहले बैठने देना चाहिए. कहीं भी बड़ों के आने पर बैठे हो तो खड़े हो जाओ और उनके बैठ जाने पर ही बैठो. उनसे ऊँचे आसान पर नहीं बैठना चाहिए. बराबर भी मत बैठो. नीचे बैठने को जगह हो तो नीचे बैठो. स्वयं सवारी पर हो या ऊँचे चबूतरे आदि स्थान पर और बड़ों से बात करना हो तो नीचे उतर कर बात करो. वे खड़े हों तो उनसे बैठे बैठे बाते नहीं करनी चाहिए
६. जब कोई आदरणीय व्यक्ति अपने यहाँ आएँ तो कुछ दूर आगे बढ़कर उनका स्वागत करें और जब वे जाने लगें तब सवारी या द्वार तक उन्हें पहुँचाना चाहिए.
||| महिलाओं के प्रति |||
१. अपने से बड़ी स्त्रियों को माता, बराबर वाली को बहिन तथा छोटी को कन्या समझो.
२. बिना जान पहचान के स्त्री से कभी बात करनी ही पड़े तो दृष्टि नीचे करके बात करनी चाहिए. स्त्रियों को घूरना, उनसे हँसी करना उनके प्रति इशारे करना या उनको छूना असभ्यता है, पाप भी है.
३. घर के जिस भाग में स्त्रियाँ रहती हैं, वहाँ बिना सूचना दिये नहीं जाना चाहिए. जहाँ स्त्रियाँ स्नान करती हों, वहाँ नहीं जाना चाहिए. जिस कमरे में कोई स्त्री अकेली हो, सोयी हो, कपड़े पहन रही हो, अपरिचित हो, भोजन कर रही हो, वहाँ भी नहीं जाना चाहिए.
४. गाड़ी, नाव आदि में स्त्रियों को बैठाकर तब बैठना चाहिए. कहीं सवारी में या अन्यत्र जगह की कमी हो और कोई स्त्री वहाँ आये तो उठकर बैठने के लिए स्थान खाली कर देना चाहिए.
||| सर्वसाधारण के प्रति |||
१. यदि किसी के अंग ठीक नहीं नाक या कान या कोई और अंग ठीक नहीं है , अंधा लंगड़ा या कुरूप है अथवा किसी में तुतलानेआदि का कोई स्वभाव है तो उसे चिढ़ाओ मत. उसकी नकल मत करो. कोई स्वयं गिर पड़े या उसकी कोई वस्तु गिर जाये, किसी से कोई भूल हो जाये, तो हँसकर उसे दुखी मत करो. यदि कोई दूसरे प्रान्त का तुम्हारे रहन सहन का पालन नहीं करता है और बोलने के ढंग में भूल करता है. तो उसकी हँसी मत उड़ाओ.
२. कोई रास्ता पूछे तो उसे समझाकर बताओ और संभव हो तो कुछ दूर तक जाकर मार्ग दिखा आओ. कोई चिट्ठी या तार पढ़वाये तो रुक कर पढ़ दो. किसी का भार उससे न उठता हो तो उसके बिना कहे ही उठवा दो. कोई गिर पड़े तो उसे सहायता देकर उठा दो. जिसकी जैसी भी सहायता कर सकते हो, अवश्य करो. किसी की उपेक्षा मत करो.
३. अंधों को अंधा कहने के बदले सूरदास कहना चाहिए. इसी प्रकार किसी में कोई अंग दोष हो तो उसे चिढ़ाना नहीं चाहिए. उसे इस प्रकार बुलाना या पुकारना चाहिए कि उसको बुरा न लगे.
४. किसी भी देश या जाति के झण्डे, राष्ट्रीय गान, धर्म ग्रन्थ अथवा सामान्य महापुरुषों को अपमान कभी मत करो. उनके प्रति आदर प्रकट करो. किसी धर्म पर आक्षेप मत करो.
५. सोये हुए व्यक्ति को जगाना हो तो बहुत धीरे से जगाना चाहिए.
६. किसी से झगड़ा मत करो. कोई किसी बात पर हठ करे व उसकी बातें आपको ठीक न भी लगें, तब भी उसका खण्डन करने का हठ मत करो.
७. मित्रों, पड़ोसियों, परिचतों को भाई, चाचा आदि उचित संबोधनों से पुकारो.
८. दो व्यक्ति झगड़ रहे हों तो उनके झगड़े को बढ़ाने का प्रयास मत करो. दो व्यक्ति परस्पर बातें कर रहे हों तो वहाँ मत आओ और न ही छिपकर उनकी बात सुनने का प्रयास करो. दो आदमी आपस में बैठकर या खड़े होकर बात कर रहे हों तो उनके बीच में मत जाओ.
९. आपने हमें पहचाना. ऐसे प्रश्न करके दूसरों की परीक्ष मत करो. आवश्यकता न हो तो किसी का नाम, गाँव, परिचय मत पूछो और कोई कहीं जा रहा हो तो ‘‘कहाँ जाते हो?” भी मत पूछो.
१०. किसी का पत्र मत पढ़ो और न किसी की कोई गुप्त बात जानने का प्रयास करो.
११. किसी की निन्दा या चुगली मत करो. दूसरों का कोई दोष तुम्हें ज्ञात हो भी जाये तो उसे किसी से मत कहो. किसी ने आपसे दूसरे की निन्दा की हो तो निन्दक का नाम मत बतलाओ.
१२. बिना आवश्यकता के किसी की जाति, आमदनी, वेतन आदि मत पूछो.
१३. कोई अपना परिचित बीमार हो जाय तो उसके पास कई बार जाना चाहिए. वहाँ उतनी ही देर ठहरना चाहिए जिसमें उसे या उसके आस पास के लोगों को कष्ट न हो. उसके रोग की गंभीरता की चर्चा वहाँ नहीं करनी चाहिए और न बिना पूछे औषधि बताने लगना चाहिए.
१४. अपने यहाँ कोई मृत्यु या दुर्घटना हो जाये तो बहुत चिल्लाकर शोक नहीं प्रकट करना चाहिए. किसी परिचित या पड़ोसी के यहाँ मृत्यु या दुर्घटना हो जाये तो वहाँ अवश्य जाना व आश्वासन देना चाहिए.
१५. किसी के घर जाओ तो उसकी वस्तुओं को मत छुओ. वहाँ प्रतीक्षा करनी पड़े तो धैर्य रखो. कोई आपके पास आकर कुछ अधिक देर भी बैठै तो ऐसा भाव मत प्रकट करो कि आप उब गये हैं.
१७. किसी से मिलो तो उसका कम से कम समय लो. केवल आवश्यक बातें ही करो. वहाँ से आना हो तो उसे नम्रतापूर्वक सूचित कर दो. वह अनुरोध करे तो यदि बहुत असुविधा न हो तभी कुछ देर वहाँ रुको.
||| अपने प्रति |||
१. अपने नाम के साथ स्वयं पण्डित, बाबू आदि मत लगाओ.
२. कोई आपको पत्र लिखे तो उसका उत्तर आवश्यक दो. कोई कुछ पूछे तो नम्रतापूर्वक उसे उत्तर दो.
३. कोई कुछ दे तो बायें हाथ से मत लो, दाहिने हाथ से लो और दूसरे को कुछ देना हो तो भी दाहिने हाथ से दो.
४. दूसरों की सेवा करो, पर दूसरों की अनावश्यक सेवा मत लो. किसी का भी उपकार मत लो.
५. किसी की वस्तु तुम्हारे देखते, जानते, गिरे या खो जाये तो उसे दे दो. तुम्हारी गिरी हुई वस्तु कोई उठाकर दे तो उसे धन्यवाद दो. आपको कोई धन्यवाद दे तो नम्रता प्रकट करो.
६. किसी को आपका पैर या धक्का लग जाये तो उससे क्षमा माँगो. कोई आपसे क्षमा माँगे तो विनम्रता पूर्वक उत्तर देना चाहिए, अकड़ना नहीं चाहिए. क्षमा माँगने की कोई बात नहीं अथवा आपसे कोई भूल नहीं हुई कहकर उसे क्षमा करना / उसका सम्मान करना चाहिए.
७. अपने रोग, कष्ट, विपत्ति तथा अपने गुण, अपनी वीरता, सफलता की चर्चा अकारण ही दूसरों से मत करो.
८. झूठ मत बोलो, शपथ मत खाओ और न प्रतीक्षा कराने का स्वभाव बनाओ.
९. किसी को गाली मत दो. क्रोध न करो व मुख से अपशब्द मत निकालो.
१०. यदि किसी के यहाँ अतिथि बनो तो उस घर के लोगों को आपके लिये कोई विशेष प्रबन्ध न करना पड़े ऐसा ध्यान रखो. उनके यहाँ जो भोजनादि मिले, उसकी प्रशंसा करके खाओ. वहाँ जो स्थान आपके रहने को नियत हो वहीं रहो. भोजन के समय उनको आपकी प्रतीक्षा न करनी पड़े. आपके उठने- बैठने आदि से वहाँ के लोगों को असुविधा न हो. आनको जो फल, कार्ड, लिफाफे आदि आवश्यक हों, वह स्वयं खरीद लाओ.
११. किसी से कोई वस्तु लो तो उसे सुरक्षित रखो और काम करके तुरंत लौटा दो. जिस दिन कोई वस्तु लौटाने को कहा गया हो तो उससे पहले ही उसे लौटा देना उत्तम होता है.
१२. किसी के घर जाते या आते समय द्वार बंद करना मत भूलो. किसी की कोई वस्तु उठाओ तो उसे फिर से यथास्थान रख देना चाहिए.
कुछ महत्वपूर्ण ध्यान रखने योग्य बातें।
१. बेझिझक एवं निर्भय होकर अपनी बात को स्पष्ट रूप से बोलें.
२. भाषा में मधुरता, शालीनता व आपसी सद्भावना बनी रहे.
३. दूसरों की बात को भी ध्यान से व पूरी तरह से सुनें, सोचें- विचारें और फिर उत्तर दें. धैर्यपूर्वक किसी को सुनना एक बहुत बड़ा सद्गुण है. बातचीत में अधिक सुनने व कम बोलने के इस सद्गुण का विकास करें. सामने देख कर बात करें. बात करते समय संकोच न रखें, न ही डरें.
४. बोलते समय सामने वाले की रूचि का भी ध्यान रखें. सोच- समझ कर, संतुलित रूप से अपनी बात रखें. बात करते हुए अपने हावभाव व शब्दों पर विशेष ध्यान देते हुए बात करें.
५. बातचीत में हार्दिक सद्भाव व आत्मीयता का भाव बना रहे. हँसी- ज़ाक में भी शालीनता बनाए रखें.
६. उपयुक्त अवसर देखकर ही बोलें. कम बोलें. धीरे बोलें. अपनी बात को संक्षिप्त और अर्थपूर्ण शब्दों में बताएँ. वाक्यों और शब्दों का सही उच्चारण करें.
७. किसी बात की जानकारी न होने पर धैयपूर्वक, प्रश्न पूछकर अपना ज्ञान बढ़ाएँ.
८. सामने वाला बात में रस न ले रहा हो तो बात का विषय बदल देना अच्छा है.
९. पीठ पीछे किसी की निन्दा मत करो और न सुनो. किसी पर व्यंग मत करो.
१०. केवल कथनी द्वारा ही नहीं वरन करनी द्वारा भी अपनी बात को सिद्ध करें.
११. उचित मार्गदर्शन के लिए स्वयं को उस स्थिति में रखकर सोचें. इससे सही निष्कर्ष पर पहुँच सकेंगे. किसी की गलत बात को सुनकर उसे तुरंत ही अपमानित न कर, उस समय मौन रहें. किसी उचित समय पर उसे अलग से नम्रतापूर्वक समझाएं.
१२. दो लोग बात कर रहे हों तो बीच में न बोलें. बिन मांगी सलाह न दें. समूह में बात हो रही हो तो स्वीकृति लेकर अपनी बात संक्षिप्त में कहना शालीनता है.
१३.प्रिय मित्र, भ्राता श्री, आदरणीया बहनजी, प्यारे भाई, पूज्य दादाजी, श्रद्धेय पिताश्री, वन्दनीया माता जी आदि संबोधनों से अपनी बात को प्रारंभ करें.
१४. मीटिंग के बीच से आवश्यक कार्य से बाहर जाना हो तो नम्रता पूर्वक इजाजत लेकर जाएँ. बहस में भी शांत स्वर में बोलो. चिल्लाने मत लगो. दूर बैठे व्यक्ति के पास जाकर बात करो, चिल्लाओ मत.
१५. बात करते समय किसी के पास एकदम सटो मत और न उसके मुख के पास मुख ले जाओ. दो व्यक्ति बात करते हों तो बीच में मत बोलो.
१६. किसी की ओर अंगुली उठाकर मत दिखाओ. किसी का नाम पूछना हो तो आपका शुभ नाम क्या है. इस प्रकार पूछो किसी का परिचय पूछना हो तो, आपका परिचय? कहकर पूछो. किसी को यह मत कहो कि आप भूल करते हैं. कहो कि आपकी बात मैं ठीक नहीं समझ सका.
१७. जहाँ कई व्यक्ति हो वहाँ काना फूसी मत करो. किसी सांकेतिक या ऐसी भाषा में भी मत बोलो जो आपके बोलचाल की सामान्य भाषा नहीं है और जिसे वे लोग नहीं समझते. रोगी के पास तो एकदम काना फूँसी मत करो, चाहे आपकी बात का रोगी से कोई संबंध हो या न हो.
१८. जो है सो आदि आवृत्ति वाक्य का स्वभाव मत डालो .. बिना पूछे राय मत दो.
१९. बहुत से शब्दों का सीधा प्रयोग भद्दा माना जाता है. मूत्र त्याग के लिए लघुशंका, मल त्याग के लिए दीर्घशंका, मृत्यु के लिए परलोकगमन आदि शब्दों का प्रयोग करना चाहिए.
अगर हम सभी स्वंय और स्वंय के बच्चो को इन सभी बातो का पालन करवाए तो हमारा जीवन पूरी तरह से शिष्टाचार से भर जाता है . शिष्टाचार मनुष्य के व्यक्तित्व का दर्पण होता है. शिष्टाचार ही मनुष्य की एक अलग पहचान करवाता है .शिष्टाचारी मनुष्य समाज में हर जगह सम्मान पाता है- चाहे वह गुरुजन के समक्ष हो परिवार में हो, समाज में हो, व्यवसाय में हो अथवा अपनी मित्र-मण्डली में. शिष्ट व्यवहार मनुष्य को ऊँचाइयों तक ले जाता है.
शिष्ट व्यवहार के कारण मनुष्य का कठिन-से-कठिन कार्य भी आसान हो जाता है. शिष्टाचारी चाहे कार्यालय में हो अथवा अन्यत्र कहीं, शीघ्र ही लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन जाता हैं. लोग भी उससे बात करने तथा मित्रता करने आदि में रुचि दिखाते हैं. एक शिष्टाचारी मनुष्य अपने साथ के अनेक लोगों को अपने शिष्टाचार से शिष्टाचारी बना देता शिष्टाचार वह ब्रह्मास्त्र है जो अँधेरे में भी अचूक वार करता है- अर्थात् शिष्टाचार अँधेरे में भी आशा की किरण दिखाने वाला मार्ग है.
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शिष्टाचार अथवा विनम्रतापूर्वक एवं शालीनता पूर्ण आचरण ही वह आभूषण है जो मनुष्य को आदर व सम्मान दिलाता है। शिष्टाचार, व्यवहार का नैतिक मापदंड जिस पर सभ्यता एवं संस्कृति का भवन निर्माण होता है। एक दूसरे के प्रति सदभावना, सहानुभूति व सहयोग आदि शिष्टाचार के मूल आधार है। शिष्टाचार का क्षेत्र बहुत व्यापक है। जहां-जहां भी एक-दूसरे व्यक्ति से संपर्क होता है वहां शिष्टाचार की जरूरत होती है।
किसी व्यक्ति द्वारा किया गया वह व्यवहार जिससे दूसरे व्यक्ति का सामाजिक हृास हो अथवा जो दूसरे व्यक्ति को व्यवहार अप्रिय लगे वह अशिष्टता कहलाता है। अशिष्टता के बारे में वेदों और पुराणों में भी कुछ पंक्तियां कही गई है।
सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात्, अप्रियम सत्यम न ब्रूयात।
अर्थात सत्य बोलो परंतु प्रिय बोलो। कभी भी असत्य नहीं बोलना चाहिए किन्तु अप्रिय सत्य भी अशिष्टता की ही श्रेणी में आता है। इसी क्रम में एक अप्रिय सत्य जो महाभारत के युद्ध में घटना घटित हुई। द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा मारा तो गया परंतु हाथी जिसके कारण द्रोणाचार्य जैसे गुरु को युद्ध तथा अपने जीवन से पराजित होना पड़ा। परंतु आज के युग में न तो द्रोणाचार्य जैसे गुरु और न ही एकलव्य जैसे शिष्य है। आज बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि युवाओं में शिष्टाचार का अभाव है। आज से पचास वर्ष पूर्व सामूहिक परिवार में बच्चा दादा-दादी, नाना-नानी से श्रीराम, कृष्ण, भगत सिंह आदि की कहानी सुनकर बढ़ा होता था तब बच्चे के अंदर वो सभी गुण इन्हीं आदर्शो के होते थे। नैतिकता जीवन का एक सहज व कुदरती आयाम है। यह ऐसी वस्तु नही है जो शिक्षा से धर्म से अथवा गुरु से भेंट स्वरुप सौंपी जा सके। आज के इस भौतिकवादी व आधुनिक युग में शालीनता दुर्लभ गुण बनकर रह गई है। खेल का मैदान हो या समाज, घर परिवार हो अशिष्टता एवं अनाचार की कीमत हमारे परस्पर संबंधों को चुकानी पड़ती है। हमारी संवेदनाओं पर आघात हुआ है।
युवा पीढ़ी में शिष्टाचार की शिक्षा बेहद जरूरी
अशिष्टता अर्थात सदाचार का न होना। अशिष्टता अनैतिकता का मूल कारण है। बच्चा बचपन से ही शिष्टता माता-पिता से सीखता है। लेकिन वर्तमान समय में व्यस्ततापूर्ण जीवनशैली के कारण माता-पिता बच्चों को पर्याप्त समय नही दे पाते है। जिस कारण बच्चा जाने-अंजाने में अशिष्टता का व्यवहार करने लगता है। वह कहते है कि आधुनिक युग संचार का युग है। सूचनाओं के आदान प्रदान का प्रयोग हम इसके लिए करते है। फेसबुक, ट्वीटर, व्हाटस एप जैसी सोशल साइटस पर हर कोई अपना एकाउंट बनाकर प्रयोग करना चाहता है, जिसमें शिष्टाचार नितांत जरुरी है। हमे अपनी प्रोफाइल की फोटो तथा अन्य फोटो में शिष्टता का ध्यान रखना आवश्यक है।
आज के युग में हम नैतिकता की तो बहुत बात करते है। हमारा जीवन नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण होना चाहिए। समाज सभ्य बने यह हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है। समाज में फैली बुराइयों की वजह से हम नैतिक मूल्यों का हनन कर रहे है। जिसका प्रभाव इस पीढ़ी पर तथा आने वाली पीढि़यों पर भी पड़ेगा। अनैतिकता का मुख्य कारण अशिष्टता है। जो कि समाज में अब व्यापक रुप से फैली हुई है। अब से लगभग दो दशक पूर्व पहले समाज में जो शिष्टता थी तथा भाईचारा था। छोटे बड़े की शर्म थी आज वो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अहंकार की वजह से लोगों में शिष्टता समाप्त होती जा रही है। यदि हमे शिष्ट समाज और सभ्य समाज की स्थापना करनी है तो पूर्ण रुप से नैतिक मूल्यों को समझना होगा।
सत्य ही बनाता है संस्कारवान
सत्य ही वह शिक्षा है जो मानवीय गुणों में समायोजित होकर उसे संस्कारवान बनाती है।
माता-पिता के रोकने पर बच्चों में अज्ञानता के कारण अशिष्टता की भावना आ जाती है और बच्चे शिष्टाचार को भूल अशिष्ट हो जाते हैं तथा अनैतिक व्यवहार करने लगते है। इसलिए हमे बच्चों को प्यार से समझाकर उन्हें हित और अहित की बातों से अवगत कराना चाहिए तथा उन्हें शिक्षाप्रद बातों के लिए भी प्रेरित करना चाहिए। और एक माता - पिता की पूर्ण रूप से मह्वपूर्ण जिमेदारी होती है कि वो बच्चो को अच्छी शिक्षा और संस्कार दे ताकि बच्चे अच्छी प्रकार से शिष्टाचार व संस्कारवान बन सके।
शिष्ट या सभ्य पुरुषों का आचरण शिष्टाचार कहलाता है । दूसरों के प्रति अच्छा व्यवहार, घर आने वाले का आदर करना, आवभगत करना, बिना द्वेष और नि:स्वार्थ भाव से किया गया सम्मान शिष्टाचार कहलाता है । ... शिष्टाचार का अंकुर बच्चे के हृदय में बचपन से बोया जाता है । इसका ख्याल माता - पिता को रखना चाहिए क्युकी जिस प्रकार से जैसे शिष्टाचार माता पिता द्वारा सिखाया जाता है उसी पर बच्चे खरे उतरते हैं।
कुछ अन्य मुख्य बातें जिनपर आपका ध्यान होना चाहिए:
सद्भाव कायम करें - जिस तरक्की व नेकी की राह पर चल रहा है वो उस नीति की वजह से ही संपन्न हो पाया है जो किसी को भी मुक्त रूप से ज्ञान उपलब्ध कराती है व किसी को भी किसी प्रतिबन्ध के बिना उसमे और अधिक जानकारी जोड़ने का हक देती है।
सुनहरा उसूल याद रखें - किसी दूसरे व्यक्ति से वैसे ही बर्ताव करे जैसा की आप चाहते है की आप से हो। नए उपयोगकर्ताओ से भी। याद रखे हम सब भी कभी नए थे।
विनम्र रहें - चाहे हालत कुछ भी हो हमेशा विनम्र रहे इससे यह होगा की आपकी बात अंत तक सुनी और समझी जायेगी।
भावों को समझें - यहाँ विकिपीडिया पर हम आपस में वार्ता लिखकर करते है व यह एक अच्छा माध्यम है। पर ध्यान देने वाली बात यह है की शब्द आखिरकार शब्द होते है व कोरे शब्द कई बार असली मंशा व भाव प्रदर्शित नहीं कर पाते या सामने वाले को इसके पीछे की मंशा पर संशय हो सकता है। जितना हो सके खुलकर व सीधे रूप में बात करे। शब्दों के चयन व लिखने के तरीके पे ध्यान दे, ताकि आपके साथी सदस्य पर इसका विपरीत असर न हो।
अपनी पहचान व्यक्त करें - हर बार जब भी आप किसी वार्ता पृष्ठ पर कुछ लिखते है तो अपने हस्ताक्षर ज़रूर छोड़े, पर सिर्फ वार्ताओं पर न की लेखो पर। वो अलग बात है की आप किसी विशेष कारण से अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते हो। पर इससे आपके कहे गए वक्तव्य का भार कम हो सकता है।
समझौते का प्रयास करें - विचारों में मतभेद होना लाज़मी है पर बात बढ़ाने की जगह एक मध्यम रास्ता निकाले और किसी निर्णायक समझौते तक पहुँचे।
तथ्यों पे तर्क करे न की व्यक्तित्व पर - व्यक्ति विशेष को निशाना न बनाये। याद रखे आपका उनके किये गए कार्य से मतभेद हो सकता है पर यह कोई निजी दुश्मनी नहीं है।
बातों का गलत मतलब नहीं निकालें - जो कहा नहीं गया उसे सच ना माने। ज़्यादातर समय जो लिखा गया है वो ही कहा गया है। विभिन पहलुओं की जगह सीधा सोचे।
उचित प्रश्नों की उपेक्षा नहीं करें - सवाल कई तरह के हो सकते है व हो सकता सभी हमें रास नहीं आये या कुछ हमारे खुद के कार्यों की समीक्षा के बारे में हो। याद रखे की उचित प्रश्न जवाब के हक़दार होते हैं।
आपके किये गए संपादन की समीक्षा - अगर कोई अन्य सदस्य आपके द्वारा किये गए संपादन से संतुष्ट नहीं है या उसके खिलाफ है तो वाद-विवाद की जगह तर्कपूर्ण तरीके से यह बात स्पष्ट करे की आपका संपादन सही क्यों है।
अपने विचार रखें - अगर आपके पास किसी विषय के बारे में कोई उत्तर नहीं हो तो उसे स्वीकार करे या अगर आप किसी विषय वस्तु के खिलाफ है तो उसे बताए व वजह साफ़ करे।
सभ्य रहें - चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो हमेशा सभ्य बने रहे। इससे आप सामने वाले का दिल जीत सकते है। हाँ ऐसा करना कई बार मुश्किल हो सकता है वो भी जब वार्ता आपके बारे में या आप की ग़लतियाँ निकालने के लिए हो रही हो। हो सकता है की सामने वाला आप से सभ्य न हो पर आप शालीनता का परिचय दे।
बदतमीजी का जवाब दें पर बदतमीजी से नहीं - ऐसा करने वाले व्यक्ति को बताए की वह क्या गलत कर रहे है व आप इस प्रकार के व्यवहार का जवाब नहीं देंगे व अगर उन्हें आपसे वार्ता जारी रखनी है तो सभ्यता से पेश आये।
क्षमा मांगें - कई बार हम भावना के वश में ऐसी कुछ बाते कर जाते है जिनपर हमें बाद में खेद होता है। अपनी ग़लती स्वीकारें। क्षमा मांगें।
क्षमा करें और भूल जायें - अगर आप किसी को क्षमा कर रहे है तो फिर दिल से उन्हें माफ़ कर दे, व नयी शुरुआत करे। बाद के लिए मन काला नहीं रखे।
अपने पूर्वाग्रहों को समझें - हम में से कोई भी परिपूर्ण नहीं है। अगर आप भी कोई पूर्वाग्रह रखते हो तो उन्हें पहचाने व उनपे काबू रखें।
|||बड़ों का अभिवादन |||
१.बड़ों को कभी तुम मत कहो उन्हें आप कहो और अपने लिए ‘मैं’ का प्रयोग मत करो हम कहो.
२.जो गुरुजन घर में है उन्हें सबेरे उठते ही प्रणाम करो. अपने से बड़े लोग जब मिलें जब उनसे भेंट हो उन्हें प्रणाम करना चाहिए.
३.जहाँ दीपक जलाने पर या मन्दिर में आरती होने पर सायंकाल प्रणाम करने की प्रथा हो वहाँ उस समय भी प्रणाम करना चाहिए.
४. जब किसी नये व्यक्ति से परिचय करया जाय, तब उन्हें प्रणाम करना चाहिए.
५. गुरुजनों को पत्र व्यवहार में भी प्रणाम लिखना चाहिए.
६. प्रणाम करते समय हाथ में कोई वस्तु हो तो उसे बगल में दबाकर या एक ओर रखकर दोनों हाथों से प्रणाम करना चाहिए.
७. चिल्लाकर या पीछे से प्रणाम नहीं करना चाहिए. सामने जाकर शान्ति से प्रणाम करना चाहिए.
८. प्रणाम की उत्तम रीति दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुकाना है. जिस समाज में प्रणाम के समय जो कहने की प्रथा हो, उसी शब्द का व्यवहार करना चाहिए. महात्माओं तथा साधुओं के चरण छूने की प्राचीन प्रथा है.
||| बड़ों का अनुगमन |||
१. अपने से बड़ा कोई पुकारे तो ‘क्या’, ‘ऐं’, ‘हाँ’ नहीं कहना चाहिए . जी हाँ , जी , अथवा आज्ञा कहकर प्रत्युत्तर देना चाहिए .
२.लोगों को बुलाने, पत्र लिखने या चर्चा करने में उनके नाम के आगे ‘श्री’ और अन्त में ‘जी’ अवश्य लगाओ. इसके अतिरिक्त पंडित, सेठ, बाबू, लाला आदि यदि उपाधि हो तो उसे भी लगाओ.
३. अपने से बड़ों की ओर पैर फैलाकर या पीठ करके मत बैठो. उनकी ओर पैर करके मत सोओ.
४. मार्ग में जब गुरुजनों के साथ चलना हो तो उनके आगे या बराबर मत चलो उनके पीछे चलो. उनके पास कुछ सामान हो तो आग्रह करके उसे स्वयं ले लो. कहीं दरवाजे में से जाना हो तो पहले बड़ों को जाने दो. द्वार बंद है तो आगे बढ़कर खोल दो और आवश्यकता हो तो भीतर प्रकाश कर दो. यदि द्वार पर पर्दा हो तो उसे तब तक उठाये रहो, जब तक वे अंदर न चले जायें.
५. सवारी पर बैठते समय बड़ों को पहले बैठने देना चाहिए. कहीं भी बड़ों के आने पर बैठे हो तो खड़े हो जाओ और उनके बैठ जाने पर ही बैठो. उनसे ऊँचे आसान पर नहीं बैठना चाहिए. बराबर भी मत बैठो. नीचे बैठने को जगह हो तो नीचे बैठो. स्वयं सवारी पर हो या ऊँचे चबूतरे आदि स्थान पर और बड़ों से बात करना हो तो नीचे उतर कर बात करो. वे खड़े हों तो उनसे बैठे बैठे बाते नहीं करनी चाहिए
६. जब कोई आदरणीय व्यक्ति अपने यहाँ आएँ तो कुछ दूर आगे बढ़कर उनका स्वागत करें और जब वे जाने लगें तब सवारी या द्वार तक उन्हें पहुँचाना चाहिए.
||| छोटों के प्रति |||
१. बच्चों को, नौकरों को अथवा किसी को भी ‘तू’ मत कहो. ‘तुम’ या ‘आप’ कहो.
२. जब कोई आपको प्रणाम करे तब उसके प्रणाम का उत्तर प्रणाम करके या जैसे उचित हो अवश्य दो.
३. नौकर को भी भोजन तथा विश्राम के लिए उचित समय दो. बीमारी आदि में उसकी सुविधा का ध्यान रखो. किसीको भी कभी नीच मत समझो.
४. आपके द्वारा आपसे जो छोटे हैं, उन्हें असुविधा न हो यह ध्यान रखना चाहिए. छोटों के आग्रह करने पर भी उनसे अपनी सेवा का काम कम से कम लेना चाहिए.
५. सवारी पर बैठते समय बड़ों को पहले बैठने देना चाहिए. कहीं भी बड़ों के आने पर बैठे हो तो खड़े हो जाओ और उनके बैठ जाने पर ही बैठो. उनसे ऊँचे आसान पर नहीं बैठना चाहिए. बराबर भी मत बैठो. नीचे बैठने को जगह हो तो नीचे बैठो. स्वयं सवारी पर हो या ऊँचे चबूतरे आदि स्थान पर और बड़ों से बात करना हो तो नीचे उतर कर बात करो. वे खड़े हों तो उनसे बैठे बैठे बाते नहीं करनी चाहिए
६. जब कोई आदरणीय व्यक्ति अपने यहाँ आएँ तो कुछ दूर आगे बढ़कर उनका स्वागत करें और जब वे जाने लगें तब सवारी या द्वार तक उन्हें पहुँचाना चाहिए.
||| महिलाओं के प्रति |||
१. अपने से बड़ी स्त्रियों को माता, बराबर वाली को बहिन तथा छोटी को कन्या समझो.
२. बिना जान पहचान के स्त्री से कभी बात करनी ही पड़े तो दृष्टि नीचे करके बात करनी चाहिए. स्त्रियों को घूरना, उनसे हँसी करना उनके प्रति इशारे करना या उनको छूना असभ्यता है, पाप भी है.
३. घर के जिस भाग में स्त्रियाँ रहती हैं, वहाँ बिना सूचना दिये नहीं जाना चाहिए. जहाँ स्त्रियाँ स्नान करती हों, वहाँ नहीं जाना चाहिए. जिस कमरे में कोई स्त्री अकेली हो, सोयी हो, कपड़े पहन रही हो, अपरिचित हो, भोजन कर रही हो, वहाँ भी नहीं जाना चाहिए.
४. गाड़ी, नाव आदि में स्त्रियों को बैठाकर तब बैठना चाहिए. कहीं सवारी में या अन्यत्र जगह की कमी हो और कोई स्त्री वहाँ आये तो उठकर बैठने के लिए स्थान खाली कर देना चाहिए.
||| सर्वसाधारण के प्रति |||
१. यदि किसी के अंग ठीक नहीं नाक या कान या कोई और अंग ठीक नहीं है , अंधा लंगड़ा या कुरूप है अथवा किसी में तुतलानेआदि का कोई स्वभाव है तो उसे चिढ़ाओ मत. उसकी नकल मत करो. कोई स्वयं गिर पड़े या उसकी कोई वस्तु गिर जाये, किसी से कोई भूल हो जाये, तो हँसकर उसे दुखी मत करो. यदि कोई दूसरे प्रान्त का तुम्हारे रहन सहन का पालन नहीं करता है और बोलने के ढंग में भूल करता है. तो उसकी हँसी मत उड़ाओ.
२. कोई रास्ता पूछे तो उसे समझाकर बताओ और संभव हो तो कुछ दूर तक जाकर मार्ग दिखा आओ. कोई चिट्ठी या तार पढ़वाये तो रुक कर पढ़ दो. किसी का भार उससे न उठता हो तो उसके बिना कहे ही उठवा दो. कोई गिर पड़े तो उसे सहायता देकर उठा दो. जिसकी जैसी भी सहायता कर सकते हो, अवश्य करो. किसी की उपेक्षा मत करो.
३. अंधों को अंधा कहने के बदले सूरदास कहना चाहिए. इसी प्रकार किसी में कोई अंग दोष हो तो उसे चिढ़ाना नहीं चाहिए. उसे इस प्रकार बुलाना या पुकारना चाहिए कि उसको बुरा न लगे.
४. किसी भी देश या जाति के झण्डे, राष्ट्रीय गान, धर्म ग्रन्थ अथवा सामान्य महापुरुषों को अपमान कभी मत करो. उनके प्रति आदर प्रकट करो. किसी धर्म पर आक्षेप मत करो.
५. सोये हुए व्यक्ति को जगाना हो तो बहुत धीरे से जगाना चाहिए.
६. किसी से झगड़ा मत करो. कोई किसी बात पर हठ करे व उसकी बातें आपको ठीक न भी लगें, तब भी उसका खण्डन करने का हठ मत करो.
७. मित्रों, पड़ोसियों, परिचतों को भाई, चाचा आदि उचित संबोधनों से पुकारो.
८. दो व्यक्ति झगड़ रहे हों तो उनके झगड़े को बढ़ाने का प्रयास मत करो. दो व्यक्ति परस्पर बातें कर रहे हों तो वहाँ मत आओ और न ही छिपकर उनकी बात सुनने का प्रयास करो. दो आदमी आपस में बैठकर या खड़े होकर बात कर रहे हों तो उनके बीच में मत जाओ.
९. आपने हमें पहचाना. ऐसे प्रश्न करके दूसरों की परीक्ष मत करो. आवश्यकता न हो तो किसी का नाम, गाँव, परिचय मत पूछो और कोई कहीं जा रहा हो तो ‘‘कहाँ जाते हो?” भी मत पूछो.
१०. किसी का पत्र मत पढ़ो और न किसी की कोई गुप्त बात जानने का प्रयास करो.
११. किसी की निन्दा या चुगली मत करो. दूसरों का कोई दोष तुम्हें ज्ञात हो भी जाये तो उसे किसी से मत कहो. किसी ने आपसे दूसरे की निन्दा की हो तो निन्दक का नाम मत बतलाओ.
१२. बिना आवश्यकता के किसी की जाति, आमदनी, वेतन आदि मत पूछो.
१३. कोई अपना परिचित बीमार हो जाय तो उसके पास कई बार जाना चाहिए. वहाँ उतनी ही देर ठहरना चाहिए जिसमें उसे या उसके आस पास के लोगों को कष्ट न हो. उसके रोग की गंभीरता की चर्चा वहाँ नहीं करनी चाहिए और न बिना पूछे औषधि बताने लगना चाहिए.
१४. अपने यहाँ कोई मृत्यु या दुर्घटना हो जाये तो बहुत चिल्लाकर शोक नहीं प्रकट करना चाहिए. किसी परिचित या पड़ोसी के यहाँ मृत्यु या दुर्घटना हो जाये तो वहाँ अवश्य जाना व आश्वासन देना चाहिए.
१५. किसी के घर जाओ तो उसकी वस्तुओं को मत छुओ. वहाँ प्रतीक्षा करनी पड़े तो धैर्य रखो. कोई आपके पास आकर कुछ अधिक देर भी बैठै तो ऐसा भाव मत प्रकट करो कि आप उब गये हैं.
१७. किसी से मिलो तो उसका कम से कम समय लो. केवल आवश्यक बातें ही करो. वहाँ से आना हो तो उसे नम्रतापूर्वक सूचित कर दो. वह अनुरोध करे तो यदि बहुत असुविधा न हो तभी कुछ देर वहाँ रुको.
||| अपने प्रति |||
१. अपने नाम के साथ स्वयं पण्डित, बाबू आदि मत लगाओ.
२. कोई आपको पत्र लिखे तो उसका उत्तर आवश्यक दो. कोई कुछ पूछे तो नम्रतापूर्वक उसे उत्तर दो.
३. कोई कुछ दे तो बायें हाथ से मत लो, दाहिने हाथ से लो और दूसरे को कुछ देना हो तो भी दाहिने हाथ से दो.
४. दूसरों की सेवा करो, पर दूसरों की अनावश्यक सेवा मत लो. किसी का भी उपकार मत लो.
५. किसी की वस्तु तुम्हारे देखते, जानते, गिरे या खो जाये तो उसे दे दो. तुम्हारी गिरी हुई वस्तु कोई उठाकर दे तो उसे धन्यवाद दो. आपको कोई धन्यवाद दे तो नम्रता प्रकट करो.
६. किसी को आपका पैर या धक्का लग जाये तो उससे क्षमा माँगो. कोई आपसे क्षमा माँगे तो विनम्रता पूर्वक उत्तर देना चाहिए, अकड़ना नहीं चाहिए. क्षमा माँगने की कोई बात नहीं अथवा आपसे कोई भूल नहीं हुई कहकर उसे क्षमा करना / उसका सम्मान करना चाहिए.
७. अपने रोग, कष्ट, विपत्ति तथा अपने गुण, अपनी वीरता, सफलता की चर्चा अकारण ही दूसरों से मत करो.
८. झूठ मत बोलो, शपथ मत खाओ और न प्रतीक्षा कराने का स्वभाव बनाओ.
९. किसी को गाली मत दो. क्रोध न करो व मुख से अपशब्द मत निकालो.
१०. यदि किसी के यहाँ अतिथि बनो तो उस घर के लोगों को आपके लिये कोई विशेष प्रबन्ध न करना पड़े ऐसा ध्यान रखो. उनके यहाँ जो भोजनादि मिले, उसकी प्रशंसा करके खाओ. वहाँ जो स्थान आपके रहने को नियत हो वहीं रहो. भोजन के समय उनको आपकी प्रतीक्षा न करनी पड़े. आपके उठने- बैठने आदि से वहाँ के लोगों को असुविधा न हो. आनको जो फल, कार्ड, लिफाफे आदि आवश्यक हों, वह स्वयं खरीद लाओ.
११. किसी से कोई वस्तु लो तो उसे सुरक्षित रखो और काम करके तुरंत लौटा दो. जिस दिन कोई वस्तु लौटाने को कहा गया हो तो उससे पहले ही उसे लौटा देना उत्तम होता है.
१२. किसी के घर जाते या आते समय द्वार बंद करना मत भूलो. किसी की कोई वस्तु उठाओ तो उसे फिर से यथास्थान रख देना चाहिए.
कुछ महत्वपूर्ण ध्यान रखने योग्य बातें।
१. बेझिझक एवं निर्भय होकर अपनी बात को स्पष्ट रूप से बोलें.
२. भाषा में मधुरता, शालीनता व आपसी सद्भावना बनी रहे.
३. दूसरों की बात को भी ध्यान से व पूरी तरह से सुनें, सोचें- विचारें और फिर उत्तर दें. धैर्यपूर्वक किसी को सुनना एक बहुत बड़ा सद्गुण है. बातचीत में अधिक सुनने व कम बोलने के इस सद्गुण का विकास करें. सामने देख कर बात करें. बात करते समय संकोच न रखें, न ही डरें.
४. बोलते समय सामने वाले की रूचि का भी ध्यान रखें. सोच- समझ कर, संतुलित रूप से अपनी बात रखें. बात करते हुए अपने हावभाव व शब्दों पर विशेष ध्यान देते हुए बात करें.
५. बातचीत में हार्दिक सद्भाव व आत्मीयता का भाव बना रहे. हँसी- ज़ाक में भी शालीनता बनाए रखें.
६. उपयुक्त अवसर देखकर ही बोलें. कम बोलें. धीरे बोलें. अपनी बात को संक्षिप्त और अर्थपूर्ण शब्दों में बताएँ. वाक्यों और शब्दों का सही उच्चारण करें.
७. किसी बात की जानकारी न होने पर धैयपूर्वक, प्रश्न पूछकर अपना ज्ञान बढ़ाएँ.
८. सामने वाला बात में रस न ले रहा हो तो बात का विषय बदल देना अच्छा है.
९. पीठ पीछे किसी की निन्दा मत करो और न सुनो. किसी पर व्यंग मत करो.
१०. केवल कथनी द्वारा ही नहीं वरन करनी द्वारा भी अपनी बात को सिद्ध करें.
११. उचित मार्गदर्शन के लिए स्वयं को उस स्थिति में रखकर सोचें. इससे सही निष्कर्ष पर पहुँच सकेंगे. किसी की गलत बात को सुनकर उसे तुरंत ही अपमानित न कर, उस समय मौन रहें. किसी उचित समय पर उसे अलग से नम्रतापूर्वक समझाएं.
१२. दो लोग बात कर रहे हों तो बीच में न बोलें. बिन मांगी सलाह न दें. समूह में बात हो रही हो तो स्वीकृति लेकर अपनी बात संक्षिप्त में कहना शालीनता है.
१३.प्रिय मित्र, भ्राता श्री, आदरणीया बहनजी, प्यारे भाई, पूज्य दादाजी, श्रद्धेय पिताश्री, वन्दनीया माता जी आदि संबोधनों से अपनी बात को प्रारंभ करें.
१४. मीटिंग के बीच से आवश्यक कार्य से बाहर जाना हो तो नम्रता पूर्वक इजाजत लेकर जाएँ. बहस में भी शांत स्वर में बोलो. चिल्लाने मत लगो. दूर बैठे व्यक्ति के पास जाकर बात करो, चिल्लाओ मत.
१५. बात करते समय किसी के पास एकदम सटो मत और न उसके मुख के पास मुख ले जाओ. दो व्यक्ति बात करते हों तो बीच में मत बोलो.
१६. किसी की ओर अंगुली उठाकर मत दिखाओ. किसी का नाम पूछना हो तो आपका शुभ नाम क्या है. इस प्रकार पूछो किसी का परिचय पूछना हो तो, आपका परिचय? कहकर पूछो. किसी को यह मत कहो कि आप भूल करते हैं. कहो कि आपकी बात मैं ठीक नहीं समझ सका.
१७. जहाँ कई व्यक्ति हो वहाँ काना फूसी मत करो. किसी सांकेतिक या ऐसी भाषा में भी मत बोलो जो आपके बोलचाल की सामान्य भाषा नहीं है और जिसे वे लोग नहीं समझते. रोगी के पास तो एकदम काना फूँसी मत करो, चाहे आपकी बात का रोगी से कोई संबंध हो या न हो.
१८. जो है सो आदि आवृत्ति वाक्य का स्वभाव मत डालो .. बिना पूछे राय मत दो.
१९. बहुत से शब्दों का सीधा प्रयोग भद्दा माना जाता है. मूत्र त्याग के लिए लघुशंका, मल त्याग के लिए दीर्घशंका, मृत्यु के लिए परलोकगमन आदि शब्दों का प्रयोग करना चाहिए.
अगर हम सभी स्वंय और स्वंय के बच्चो को इन सभी बातो का पालन करवाए तो हमारा जीवन पूरी तरह से शिष्टाचार से भर जाता है . शिष्टाचार मनुष्य के व्यक्तित्व का दर्पण होता है. शिष्टाचार ही मनुष्य की एक अलग पहचान करवाता है .शिष्टाचारी मनुष्य समाज में हर जगह सम्मान पाता है- चाहे वह गुरुजन के समक्ष हो परिवार में हो, समाज में हो, व्यवसाय में हो अथवा अपनी मित्र-मण्डली में. शिष्ट व्यवहार मनुष्य को ऊँचाइयों तक ले जाता है.
शिष्ट व्यवहार के कारण मनुष्य का कठिन-से-कठिन कार्य भी आसान हो जाता है. शिष्टाचारी चाहे कार्यालय में हो अथवा अन्यत्र कहीं, शीघ्र ही लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन जाता हैं. लोग भी उससे बात करने तथा मित्रता करने आदि में रुचि दिखाते हैं. एक शिष्टाचारी मनुष्य अपने साथ के अनेक लोगों को अपने शिष्टाचार से शिष्टाचारी बना देता शिष्टाचार वह ब्रह्मास्त्र है जो अँधेरे में भी अचूक वार करता है- अर्थात् शिष्टाचार अँधेरे में भी आशा की किरण दिखाने वाला मार्ग है.
ऑनलाइन सेवा
गोस्वामी कॉमन सर्विस सेंटर
Goswami Common Service Center
1. सभी प्रकार के ऑनलाइन आवेदन और LIC किस्त जमा किया जाता है
2. सभी प्रकार के ऑनलाइन बिल जमा किए जाते है
3. रूपए ट्रांसफर किए जाते है
4. पीएम किसान सम्मान निधि योजना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाता है
5. सभी प्रकार से ऑनलाइन फॉर्म भरे जाते है।
6. ऑनलाइन एंप्लायमेंट रजिस्ट्रेशन किया जाता है
7. सभी प्रकार के ऑनलाइन फलेक्सी ओर रिचार्ज किए जाते है
8. कुमाऊं यूनिवर्सिटी की ऑनलाइन डिग्री, माइग्रेशन प्रमाण पत्र के लिए अप्लाई
9. कुमाऊं यूनिवर्सिटी ऑनलाइन एडमिशन
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12. उत्तराखंड मुक्त विश्व विद्यालय की डिग्री के लिए अप्लाई
13. एग्जाम फॉर्म और बैक एग्जाम फॉर्म
14. ऑनलाइन एडमिशन फॉर्म
15.ऑनलाइन आधार कार्ड बनाने
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17.ऑनलाइन आरडी जमा करने
18.ऑनलाइन पेन कार्ड सेवा
19.ऑनलाइन लाइफ पेंशनर सर्टिफिकेट(जीवित प्रमाण पत्र)
20. ऑनलाइन मैरिज सर्टिफिकेट
21. ऑनलाइन पहचान पत्र बनवाना आदि।
22. PM श्रम योगी मानधन योजना : मासिक 55 रु जमा करने पर हर महीने मिलेंगे 3000 रु
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